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हमेशा पुरानी पीढ़ी नई पीढ़ी से निराश रही है। नई पीढ़ी भी पुरानी पीढ़ी बनकर निराश होती रही है।
कविता तो एक जीवन को तोड़कर सकल जीवन बनाती है। और जीवन टूटता है, वह कवि का है।
कोई कवि सहज और स्वस्थ रहे तो समझ लीजिए, कुछ क़सर है।
कविता अगर बनती जाएगी तो कवि नष्ट होता जाएगा।
शब्दों की शक्तियों का जितना ही अधिक बोध होगा अर्थबोध उतना ही सुगम्य होगा। इसके लिए पुरातन साहित्य का अनुशीलन तो करना ही चाहिए, समाज का व्यापक अनुभव भी प्राप्त करना चाहिए।
कवि जब पाठक की स्थिति में होता है, तब उसकी स्थिति रचना-काल से भिन्न होती है।
हिंदी का रचनाकार इतने-इतने बंधनों में जकड़ा हुआ है कि हम निर्बंध रचना की उम्मीद कर भी नहीं सकते।
समाज की गति के संचालन का कार्य जो शक्ति करती है, वह मुख्यतः प्रतिबंधक नियमों पर बल देती है।
प्रौढ़-वय का शासक अपने को वैसा ही क्रांतिकारी समझता रहता है, जैसा कभी युवावस्था में वह था।
कवि में जिस प्रकार विधायक कल्पना की आवश्यकता है, उसी प्रकार पाठक में ग्राहक कल्पना की आवश्यकता होती है।
वर्तमान समाज अनेक आदर्शों का रंगमंच बन गया है।
जनभाषा पर कुछ भी कहने के पहले यह भी ध्यान रखना चाहिए कि वह बहता नीर है। केवल सामाजिक संबंधों से ही उसे जाना और पहचाना जा सकता है और विवेकपूर्ण संतुलन से ही उसे काव्य का समर्थ माध्यम बनाया जा सकता है।
यदि मन में शिथिलता, श्रांति या शून्यता हो तो काव्यानुशीलन न करना चाहिए।
किसी भी प्रकार की संकीर्णता काव्य-सौंदर्य को अपहित कर लेती है।
अपनी रचना का पाठक बनकर कवि स्वयं तारतम्य की खोज करने लगता है।
चिंता और उद्विग्नता भी काव्य-सौंदर्य को परिच्छिन्न करती है।
किसी भी काव्य का अध्ययन करने से पहले आत्म-परीक्षा कर लेनी चाहिए।
किसी कवि के प्रति विशेष श्रद्धा दूसरे कवि का स्वरूप-बोध नहीं होने देती।
कभी-कभी विचार-विशेष से आग्रह से भी काव्य समझने में बाधा खड़ी होती है।
पाठक की ग्राहक कल्पना का विकास प्रत्यभिज्ञा के आश्रय से होता है। जिसकी निरीक्षण शक्ति जितनी विकसित होगी उसकी भावना का भी परिपाक तदनुकूल ही होगा।
ज्ञान, इच्छा और क्रिया जैसे और लोगों में है; वैसे ही रचनाकार और आलोचक में भी।
पूर्व-धारणाओं से काव्यार्थ-बोध में प्रायः बाधा उपस्थित होती है।
काव्य-पाठ करने के पहले मन को प्रत्येक बाहरी प्रभाव से मुक्त कर लेना चाहिए।
काव्यार्थ के लिए नियमित रूप से काव्य का पाठ और मनन करना चाहिए।
रचनाकार को पाठकों की आवश्यकता होती है, जिसके निर्माण में उसके समर्थक बराबर योग देते हैं। यह प्रलोभन उपेक्षणीय नहीं है।
भाषा समाज में समकालिकता की सीमाओं के भीतर समबोध द्वारा प्राप्त होती है।
हिंदी में कबीर अकेले ऐसे कवि हैं, जो अपने ही कथ्य के कारण महत्त्वपूर्ण हैं।
वस्तुतः आधुनिकता उस नए चरित्र को उभारती है जो समवर्ती जीवन में मिलता है।
समाजिक उत्तरदायित्व आदर्श-भेद से अर्थ-भेद का व्यंजक पाया जाता है।
समवर्ती अनुभव अपनी अनंतता और व्यापकता में बाह्यतः लक्षणीय नहीं प्रतीत होते।
शब्दों का व्याकरण से भी ऊपर सामाजिक संदर्भ होता है, जिसका अनुसंधान हर रचनाकार को अलग-अलग करना पड़ता है।
समबोध ज्ञान या अनुभव की उस अवस्था में पुष्ट होता है जो प्रत्येक मन में कल्पना, सूझ या निश्चय के रूप में उदित होता है।
यदि मन पर किसी विशेष प्रकार के भावों अथवा विचारों के छाप पड़ चुकी हो तो भी काव्य का पाठ अनुपयुक्त है।
जब कोई अपनी समझ दूसरे को जताने की इच्छा करता है, तब आकार-इंगित-चेष्टा के बाद माध्यम उसका समर्थ सहायक बनता है; वह है भाषा।
कविता द्वारा पेश किया गया चित्र या चरित्र जिस क्षेत्र या वर्ग का होगा यदि उसका निरूपण यथातथ्य न हुआ तो कविता निराधार हो जाएगी।