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सभ्यता इस तरह होनी चाहिए कि आदमी को अपने जीवन का अर्थ खोजने के लिए आज़ादी मिले।
मज़े में ख़ुशहाल होकर जीना है, तो डिस्कवर नहीं हो सकते।
जीवन का रहस्य ही अंतिम जिज्ञासा है। यही तो मानवीय प्रज्ञा का सुंदर पहलू है।
जिस सभ्यता में सीधा-सादा आम आदमी भी खोज करने की क्षमता रखता है, वह सभ्यता महान है।
जो भी ज्ञान है; उससे चुनकर मनुष्य जीने के लिए जिस व्यवस्था का निर्माण करता है, उसी को सभ्यता कहते हैं।
राजनीति वाले संस्कृति का निर्माण नहीं कर सकते। शोधक और अन्वेषक संस्कृति निर्माण करते हैं।
आलोचक को दार्शनिक होना पड़ता है। ऐसे दार्शनिक आलोचकों के न होने पर पाठक अनाथ हो जाता है, लेखक अनुशासनहीन हो जाते हैं।
समाज की सभ्यता का अर्थ है—जीवन के व्यवहारों को सरल, सुलभ बनाने वाली भाषा।
हमारी संस्कृति की यह तत्काल ज़रूरत है कि हम अपने आम पाठक की बौद्धिक-मानसिक दशा, अपने अँग्रेज़ी पाठक के व्यक्तित्व की बुनावट और पाठ-प्रक्रिया का अनुसंधान करें और उपायों की खोज करें।
जानना ही संस्कृति है। जानने की उत्सुकता में ही प्राकृतिक विज्ञान, सामाजिक विज्ञान, कला शाखाएँ जैसी ज्ञानशाखाएँ बनी हुई हैं।
किसी के आगे का लेखन करने का मतलब है—अज्ञात की खोज करना।
समकालीन भारतीय यथार्थ, जिसे मैं सभ्यता (सिविलिजेशन) कहता हूँ—से शुरू होकर साहित्य का संस्कृति तक पहुँचना—कथा-साहित्य को पर्याप्तता प्रदान करता है।
जब धर्म, दर्शन, विविध शास्त्र व ललित साहित्य के पुस्तकों को पढ़ने की प्रक्रिया पारिवारिक परिक्षेत्र में आरंभ होगी, तब परिवार में ज्ञान-प्रक्रिया का भी आरंभ होगा। परिवार से ही कवि, लेखक, वैज्ञानिक, कलाकार निर्माण होते हैं।
परंपरा वही होती है, जिसमें व्यक्ति और समाज के भीतर कला, शास्त्र, दर्शन आदि के गहन प्रश्नों के बारे में कौतूहल कार्यरत होता है।
संस्कृति की ताक़त प्रतिभावान और आम आदमी की बौद्धिकता के रेज़ोनन्स पर निर्भर करती है।
अच्छा गद्य-लेखन भावनाओं-विचारों का ऐश नहीं कर सकता। अच्छा गद्य-लेखक बेमज़ा, उबाऊ ज़िंदगी जीता है। जोशीला गद्य-लेखक, झूठी-मूठी काव्यात्मकता वाली और मूल को मतलब में रूपांतरित करने वाली भाषा बनाता है।
भारत की भूमि आध्यात्मिक है। हर एक व्यक्ति आध्यात्मिक है और हवा ऐसी है कि हर एक को कभी न कभी अध्यात्म करना है। इतना कि कोई भी व्यक्ति स्वीकार करता है कि जीवन में अध्यात्म ही अहम है, और बाक़ी सबकुछ बाद में है।
आलोचना साहित्य के विषय के बारे में बोलती है; अंतर्वस्तु के बारे में नहीं, रूप के बारे में तो बिलकुल ही नहीं। समीक्षकों को चाहिए कि बुद्धि की बाजी लगाकर समीक्षा के प्रमेयों की खोज करें।
व्यवस्था ठीक हो तो प्रक्रिया भी ठीक से होती है, लेकिन अव्यवस्था हो तो विचार भटक जाते हैं।
कविता भावना, बुद्धि के स्तर पर रहती है। शारीरिक स्तर पर असर नहीं करती।
समाज की ज्ञानोन्मुखता ही सभ्यता है।
विज्ञान और कला की अपेक्षा, आम आदमी को फिक्शन ज़्यादा निकट का प्रतीत होता है।
जीवन-शैली इस तरह बनानी चाहिए कि हमें डिस्कवरर होना है। इस बात का एक छोटा-सा धागा ही क्यों न हो, अपने तन-मन में होना चाहिए।
जिस समाज में प्रत्येक व्यक्ति का महत्त्व होता है, उस समाज में कथा-साहित्य फलता-फूलता है।
सभ्यता का कथा-साहित्य कालबाह्य हो सकता है, संस्कृति का कथा-साहित्य कभी कालबाह्य नहीं होता—वह अभिजात होता है।
कुतूहल, कल्पनाशक्ति और चेतना, मनुष्य को मनुष्य होने के लक्षण हैं। कुतूहल, कल्पनाशक्ति, चेतना के लक्षणों के कारण मनुष्य खोज करता है।
सभ्यता का अर्थ है—जीने का तरीक़ा, जीने की व्यवस्था।
समाज की भूमि ही व्यक्ति की भूमि होती है।
प्रयोग करना कल्पनाशक्ति का कार्य होता है।
जो उपन्यास ज्ञात को अपनाता है, उसे सभ्यता का उपन्यास कहा जा सकता है।
कौतूहल होना, उत्सुक होना—जीने की सर्वोत्तम स्थिति है।
धारणा का सूझना पर्याप्त नहीं है। उसे सिद्ध करना होता है। सिद्धता के लिए विचारों का अनुशासन अनिवार्य है।
अज्ञात की खोज करने वाले उपन्यास को संस्कृति का उपन्यास कहा जा सकता है। संस्कृति मनुष्य की खोजी वृत्ति से संबंधित है।
अपने काम में डूबने वाला आदमी ख़ूबसूरत होता ही है, और संस्कृति को भी ख़ूबसूरत बना देता है।
अध्यात्म एक स्वतंत्र प्रेरणा है। उसका विकारों के साथ सीधा संबंध नहीं है।
पढ़ना मनुष्य की भूख, प्यास की तरह प्राकृतिक क्रिया नहीं है। पढ़ना कौशल का काम है और उसे कमाना पड़ता है।
अभिरुचि के पैदा होने का मतलब है—परंपरा का पैदा होना।
एकांत में आदमी के विद्रूप होने की चर्चा या संभावना होती है।
ज्ञान को सिर्फ़ संपादित करना नहीं होता, ज्ञान को निर्माण भी करना पड़ता है।
कविता हमें भाषा अर्क़ देती है। भाषा के अर्क़ को जानने के लिए कविता बेहद उपयुक्त साहित्य-रूप है।
श्रेष्ठ कविता सृष्टि, विश्व-जीवन में जो अज्ञात है, ऐसा कुछ तो खोज है। यही कविता की अंतर्वस्तु है।
उत्क्रांति का तत्त्व है, जो समर्थ है वह बचेगा।
जो समाज भाषा के सुख को समझता है, उस समाज में कथा-साहित्य फूलता-फलता है।