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जब नकारात्मक भावनाओं का दमन किया जाता है, तो सकारात्मक भावनाओं का भी दमन हो जाता है और प्रेम मर जाता है।
जब किसी महिला को अहसास होता है कि वह सचमुच प्रेम पाने की हक़दार है, तो वह एक दरवाज़ा खोल रही है; ताकि पुरुष उसे प्रेम दे सके, लेकिन जब विवाह में दस बरस तक महिला ही प्रेम देती रहती है और उसे बदले में कुछ नहीं मिलता, तब जाकर उसे यह अहसास होता है कि वह ज़्यादा की हक़दार है।
पुरुष रबर बैंड जैसे होते हैं, यह समझे बिना महिलाएँ बड़ी आसानी से पुरुषों की प्रतिक्रियाओं की ग़लत व्याख्या कर सकती हैं। एक आम दुविधा तब उत्पन्न होती है, जब वह कहती है 'चलो बात करते हैं,' लेकिन यह सुनते ही वह तुरंत भावनात्मक दूरी बढ़ा लेता है।
महिला का दुखड़ा सुनना, पुरुष के लिए कई बार इतना ज़्यादा मुश्किल या दूभर होता है। जब वह किसी चीज़ पर निराश या दु:खी होती है; तो पुरुष को ऐसा महसूस होता है, जैसे वह असफल हो गया हो।
जब कोई पुरुष किसी महिला से प्रेम करता है, तो समय-समय पर उसे ख़ुद को दूर खींचने की ज़रूरत होती है और उसके बाद ही वह उसके ज़्यादा क़रीब आ सकता है।
अगर किसी महिला को दु:ख में सहारा न मिले, तो वह सचमुच सुखी नहीं रह सकती।
जब महिलाएँ समस्याओं के बारे में बोलती हैं, तो आम तौर पर पुरुष प्रतिरोध करते हैं। पुरुष को लगता है कि महिला उसके सामने अपनी समस्याओं का दुखड़ा इसलिए रो रही है, क्योंकि वह उसे ज़िम्मेदार ठहरा रही है।
आजकल तलाक़ बहुत आम हैं, इसलिए यह और भी ज़्यादा महत्त्वपूर्ण है कि पुरुष आश्वासन देने का ध्यान रखें। जिस तरह छोटे परिवर्तन करके; पुरुष महिलाओं का समर्थन कर सकते हैं, उसी तरह महिलाओं को भी करना चाहिए।
किसी भी रिश्ते की शुरुआत में महिला अपने मनपसंद पुरुष को आँख के हल्क़े इशारे से बता देती है कि तुम मुझे सुखी बना सकते हो। यह इशारा करके वह दरअसल उनका संबंध शुरू करती है। यह निगाह पुरुष को क़रीब आने के लिए प्रोत्साहित करती है। इससे पुरुष के मन से संबंध बनाने का डर दूर हो जाता है, और वह आगे क़दम उठाता है। दुर्भाग्य से; जब एक बार रिश्ता जुड़ जाता है और समस्याएँ सामने आने लगती हैं, तो महिला यह भूल जाती है कि वह संदेश अब भी पुरुष के लिए कितना महत्त्वपूर्ण है, इसलिए वह इसे भेजने की उपेक्षा कर देती है।
संबंधों में पुरुषों और महिलाओं की अपनी-अपनी लय और चक्र होते हैं। पुरुष दूर जाते हैं और फिर क़रीब आते हैं, जबकि महिलाओं में ख़ुद को और दूसरों को प्रेम करने की सामर्थ्य ऊपर उठती और नीचे गिरती रहती है।
प्यार की शुरुआत बसंत की तरह होती है। हमें ऐसा महसूस होता है कि हम हमेशा सुखी रहेंगे। हम अपने पार्टनर से बेइंतहा प्यार करते हैं और कल्पना भी नहीं कर सकते कि कभी ऐसा दिन भी आएगा, जब हम उससे प्यार नहीं करेंगे। यह मासूमियत का समय है। प्रेम अमर लगता है। यह जादुई समय होता है, जब हर चीज़ आदर्श दिखती है और बिना प्रयास के अच्छी तरह काम करती है। हमारा पार्टनर हमें आदर्श नज़र आता है। हम बिना प्रयास के एक लय में रहते हैं और अपनी ख़ुशक़िस्मती पर आनंदित होते हैं।
हमारे अतीत की भावनाएँ केवल तभी नहीं उभरती हैं, जब हमारा प्रेम प्रसंग शुरू होता है। यह बाक़ी समय भी होता है, जब हम सचमुच अच्छा, ख़ुश या प्रेमपूर्ण महसूस कर रहे हों। इन सकारात्मक समय में दंपति बिना कारण लड़ते दिख सकते हैं, जबकि उन्हें ख़ुश होना चाहिए।
जब ग़लतफ़हमियाँ पैदा हों, तो याद रखें कि हम अलग भाषाएँ बोलते हैं; पार्टनर की बात का असली अर्थ क्या है या वह सचमुच क्या कहना चाहता है, उसका अनुवाद करने में थोड़ा समय लगाएँ। इसके लिए निश्चित रूप से अभ्यास की ज़रूरत होती है, लेकिन यह इतना महत्त्वपूर्ण काम है कि आपको इसे करना चाहिए।
जब कोई पुरुष किसी महिला से प्रेम करता है, तो वह प्रेम और संतुष्टि से दमकने लगती है।
महिला को सम्मान और पुरुष को सराहना की ज़रूरत होती है।
जब कोई पुरुष तनाव में होता है, तो वह सिर्फ़ एक ही समस्या पर अपना ध्यान केंद्रित करता है और बाक़ी समस्याओं को भूल जाता है। दूसरी तरफ़; जब कोई महिला तनाव में होती है, तो वह अपनी समस्याओं को फैला लेती है और उनके बोझ से दबी हुई महसूस करती है।
कुछ समय तक अंतरंगता की भूख संतुष्ट होने के बाद, अब पुरुष को स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता की भूख महसूस होने लगती है।
कोई भी महिला इस नकारात्मक और ग़लत धारणा के प्रति विशेष रूप से अति संवेदनशील होती है कि वह प्रेम पाने के योग्य नहीं है। यदि बचपन में उसने बुरा बर्ताव देखा है या वह स्वयं इसका शिकार हो चुकी है, तो प्रेम पाने के योग्य नहीं होने के अहसास के प्रति वह और भी अधिक संवेदनशील होती है। इससे उसके लिए अपना महत्त्व तय करना कठिन हो जाता है। महत्त्वहीन होने का यह अहसास अचेतन मन में छिपा होता है, जिससे यह डर उत्पन्न होता है कि उसे अन्य लोगों की ज़रूरत होगी। उसके मन के एक कोने में कहीं यह कल्पना पैदा होती है कि उसे समर्थन नहीं मिलेगा।
दंपतियों को बहस नहीं करनी चाहिए। जब दो लोगों में सेक्स का संबंध न हो, तो बहस या वाद-विवाद करते समय विरक्त और तटस्थ रहना ज़्यादा आसान होता है। लेकिन पति-पत्नी भावनात्मक रूप से और ख़ास तौर पर शारीरिक रूप से जुड़े होते हैं, इसलिए जब वे बहस करते हैं, तो वे आसानी से चीज़ों को बहुत व्यक्तिगत रूप से ले सकते हैं और लेते भी हैं। बुनियादी सलाह : कभी बहस मत करो। इसकी बजाय किसी भी मसले के सभी पहलुओं पर चर्चा करें। आप जो चाहते हैं, उसके लिए ज़ोर दें, लेकिन कभी बहस न करें।
महिलाओं के लिए न सिर्फ़ दूसरों की आवश्यकता दुविधाजनक होती है, बल्कि निराश होना या परित्याग होना खास तौर पर दर्द भरा होता है—सबसे छोटे तरीक़ों से भी। दूसरों पर निर्भर होना और फिर नज़रअंदाज़ किया जाना, भुला दिया जाना या ख़ारिज किया जाना, किसी महिला के लिए आसान नहीं होता। दूसरों की ज़रूरत महिला को संवेदनशील और असुरक्षित स्थिति में रख देती है। नज़रअंदाज़ किए जाने या निराश किए जाने से उसे ज़्यादा चोट पहुँचती है, क्योंकि इससे उसके अंदर की यह ग़लत धारणा पुष्ट होती है कि वह महत्त्वहीन है।
जब पुरुष और महिलाएँ अपनी भिन्नताओं को समझ लेते हैं; उनका सम्मान करते हैं और उन्हें स्वीकार कर लेते हैं, तो प्रेम को पल्लवित और विकसित होने का मौक़ा मिल जाता है।
कोई पुरुष क्यों बात नहीं कर रहा है, इस बारे में महिलाओं में गलत मान्यताएँ व्याप्त रहती हैं। कोई हैरानी नहीं कि महिलाएँ पुरुषों से कुंठित होती हैं।
पुरुष स्वतंत्र होने के अधिकार के लिए तर्क देते हैं, जबकि महिलाएँ नाराज़ होने के अधिकार के लिए तर्क देती हैं। पुरुष कभी-कभी दूरी चाहते हैं, जबकि महिलाएँ चाहती हैं कि उन्हें समझा जाए।
महिला की बात सुनना किसी पुरुष के लिए मुश्किल होता है; क्योंकि वह ग़लती से तार्किक क्रम की उम्मीद करता है, जबकि महिला एक समस्या से दूसरी समस्या पर बिना किसी क्रम के कूदती रहती है।
पुरुष स्वचालित रूप से अंतरंगता और स्वतंत्रता की आवश्यकताओं के बीच झूलते रहते हैं।
जब महिला अपने विचार बताती है, तो वह स्वाभाविक रूप से पुरुष को बोलने के लिए प्रोत्साहित करती है, लेकिन जब पुरुष महसूस करता है कि उसके बोलने की माँग की जा रही है, तो उसका दिमाग़ खाली हो जाता है।
मैंने बहुत-सी महिलाओं को इस बारे में आश्वस्त किया है कि बेहतर संबंध पाने के लिए उन्हें ज़्यादा प्रेम या सहायता देने की ज़रूरत नहीं है। उलटे, अगर वे कम देने
लगेंगी, तो उनका पार्टनर दरअसल उन्हें ज़्यादा देने लगेगा।
अगर किसी महिला को उसके पिता ने छोड़ दिया था या उसकी माँ को उसके पति ने छोड़ दिया था, तो वह इस मामले में और भी ज़्यादा संवेदनशील होगी कि पुरुष कहीं उसे छोड़कर न चला जाए।
लक्ष्य-केंद्रित होने के बजाए महिलाएँ संबंध-केंद्रित होती हैं। वे अपनी अच्छाई, प्रेम और परवाह व्यक्त करने से ज़्यादा सरोकार रखती हैं।
जब कोई पुरुष दूर जा रहा है; वह समय उससे बात करने या उसके ज़्यादा क़रीब जाने की कोशिश करने का नहीं है, उसे दूर जाने दें। कुछ समय बाद वह लौट आएगा। जब वह लौटेगा, तो वह प्रेम और उत्साह से भरा हुआ होगा और इस तरह काम करेगा, मानो कुछ हुआ ही न हो। तब आप उससे जी भरकर बातें कर सकती हैं।
निश्चित रूप से रोज़मर्रा की ज़िंदगी के घरेलू काम करने में; पुरुष को महिला की समान भागीदारी की भी ज़रूरत होती है, लेकिन यदि पुरुष की क़द्र नहीं की जाती है, तो महिला का योगदान उसके लिए लगभग निरर्थक और पूरी तरह महत्त्वहीन होता है।
पुरुषों में बहस करने की प्रवृत्ति सबसे ज़्यादा तब होती है, जब उन्होंने कोई ग़लती कर दी हो या उन्होंने उस महिला को विचलित कर दिया हो, जिससे वे प्रेम करते हैं।
जब आप किसी ऐसे व्यक्ति के साथ होते हैं, जिस पर आप अपने डरों को प्रक्षेपित न कर रहे हों, तो आप ऊपर उठने वाली भावनाओं की प्रोसेसिंग कर सकते हैं, लेकिन अगर आप केवल अपने पार्टनर के साथ हैं, तो आप कुंद महसूस कर सकते हैं।
अपनी क्षमता को साबित करने का अवसर मिलने पर पुरुष अपने सर्वश्रेष्ठ स्वरूप को व्यक्त करता है। जब उसे महसूस होता है कि वह सफल नहीं हो सकता, तभी वह अपने पुराने स्वार्थपूर्ण तरीक़ों की ओर लौटता है।
बचपन में कई पुरुषों के सफल रोल मॉडल नहीं होते। उनके लिए प्रेम को क़ायम रखना, शादी करना और परिवार पालना उतना ही मुश्किल होता है, जितना किसी प्रशिक्षण के बिना जम्बो जेट उड़ाना। वह विमान को हवा में उड़ाने में तो कामयाब हो सकता है, लेकिन वह यक़ीनन दुर्घटनाग्रस्त हो जाएगा। जब आप विमान को कई बार दुर्घटनाग्रस्त कर देते हैं (या अगर आपने अपने पिता को दुर्घटनाग्रस्त होते देखा हो), तो इसके बाद उड़ान भरते रहना मुश्किल होता है। यह समझना आसान है कि संबंधों के अच्छे प्रशिक्षण मैन्युअल के बिना, कई स्त्री-पुरुष संबंधों में हार क्यों मान लेते हैं।
पुरुष रबर बैंड जैसे होते हैं। जब वे ख़ुद को दूर खींच लेते हैं, तो रबर बैंड की तरह उनके दूर जाने की भी एक सीमा होती है। उस सीमा पर पहुँचने के बाद, वे रबर बैंड जितनी ही तेज़ी से लौट आते हैं। पुरुषों के अंतरंगता चक्र को समझने के लिए, रबर बैंड की तुलना आदर्श है। यह चक्र है क़रीब आना, ख़ुद को दूर खींचना और फिर दोबारा क़रीब आना।
अगर पुरुष सुने जाने की महिला की आवश्यकता का समर्थन करता है, तो महिला पुरुष की स्वतंत्र होने की आवश्यकता का समर्थन कर सकती है।
जब कोई पुरुष ख़ुद को दूर खींचता है, तो महिला को अपनी सहेलियों से ज़्यादा समर्थन हासिल करना चाहिए।
पुरुषों को प्रेरणा और शक्ति तब मिलती है, जब उन्हें महसूस होता है कि महिलाओं को उनकी ज़रूरत है। महिलाएँ तब प्रेरित और शक्तिशाली होती हैं, जब उन्हें महसूस होता है कि उनसे प्रेम किया जा रहा है।
प्रेमपूर्ण संबंधों का एक विरोधाभास यह है कि जब सब कुछ अच्छा चल रहा होता है और हमें यह महसूस होता है कि सामने वाला हमसे प्रेम करता है, तो हम अचानक पाते हैं कि हम अपने पार्टनर से भावनात्मक दूरी बनाने लगे हैं या उन पर अप्रिय तरीक़ों से प्रतिक्रिया करते हैं।
जब किसी महिला की लहर ऊपर उठती है, तो उसे महसूस होता है जैसे वह प्रचुर प्रेम दे सकती है, लेकिन जब यह गिरती है, तो वह आंतरिक खोखलापन महसूस करती है और उस ख़ाली जगह को सामने वाले के प्रेम से भरने की ज़रूरत होती है। नीचे आने का यह समय भावनात्मक घरेलू सफ़ाई का समय होता है।
महिलाएँ सहज बोध से जानती हैं कि अगर उनका पार्टनर उनके दर्द को सुनकर समझ ले; तो वह ऐसे परिवर्तन कर लेगा, जो वह कर सकता है।
अपने पार्टनर के साथ जुड़ने के बाद, पुरुष कुछ हद तक ख़ुद को खो देता है।
महिला को याद रखना चाहिए कि पुरुष जब छोटी-छोटी चीज़ें करना भूल जाता है, तो इसका यह मतलब नहीं है कि वह उससे प्यार नहीं करता।
हमारे बच्चे बेहतर संसार के हक़दार हैं।
हमारे प्रेम के पूरे ग्रीष्म काल में हमें यह महसूस होता है कि हमारा पार्टनर उतना आदर्श नहीं है, जितना हमने सोचा था और हमें अपने संबंध पर काम करना होगा। न सिर्फ़ हमारा पार्टनर दूसरे ग्रह से आया है, बल्कि वह एक ऐसा इंसान भी है, जो ग़लतियाँ करता है और जिसमें कई दोष भी हैं।
महिला को पुरुष के सहज बोध की प्रवृत्ति को स्वीकार करना चाहिए कि वह अपनी सारी ऊर्जा एक बड़ी चीज़ पर केंद्रित करता है, और छोटी-छोटी चीज़ों को महत्त्व नहीं देता।
महिला को यह पता ही नहीं होता कि उसके अविश्वास से पुरुष को कितनी चोट पहुँचती है।
बरसों तक हमने अपनी दर्द भरी भावनाओं का दमन किया है। फिर एक दिन हम प्रेम करने लगते हैं और प्रेम हमें इतना सुरक्षित महसूस कराता है कि हम खुल जाते हैं और अपनी भावनाओं के बारे में जागरूक हो जाते हैं। प्रेम हमें खोलता है और हम अपने दर्द को महसूस करने लगते हैं।