जॉन ग्रे के उद्धरण
जब नकारात्मक भावनाओं का दमन किया जाता है, तो सकारात्मक भावनाओं का भी दमन हो जाता है और प्रेम मर जाता है।
पुरुष रबर बैंड जैसे होते हैं, यह समझे बिना महिलाएँ बड़ी आसानी से पुरुषों की प्रतिक्रियाओं की ग़लत व्याख्या कर सकती हैं। एक आम दुविधा तब उत्पन्न होती है, जब वह कहती है 'चलो बात करते हैं,' लेकिन यह सुनते ही वह तुरंत भावनात्मक दूरी बढ़ा लेता है।
जब महिलाएँ समस्याओं के बारे में बोलती हैं, तो आम तौर पर पुरुष प्रतिरोध करते हैं। पुरुष को लगता है कि महिला उसके सामने अपनी समस्याओं का दुखड़ा इसलिए रो रही है, क्योंकि वह उसे ज़िम्मेदार ठहरा रही है।
जब कोई पुरुष किसी महिला से प्रेम करता है, तो समय-समय पर उसे ख़ुद को दूर खींचने की ज़रूरत होती है और उसके बाद ही वह उसके ज़्यादा क़रीब आ सकता है।
महिला का दुखड़ा सुनना, पुरुष के लिए कई बार इतना ज़्यादा मुश्किल या दूभर होता है। जब वह किसी चीज़ पर निराश या दु:खी होती है; तो पुरुष को ऐसा महसूस होता है, जैसे वह असफल हो गया हो।
आजकल तलाक़ बहुत आम हैं, इसलिए यह और भी ज़्यादा महत्त्वपूर्ण है कि पुरुष आश्वासन देने का ध्यान रखें। जिस तरह छोटे परिवर्तन करके; पुरुष महिलाओं का समर्थन कर सकते हैं, उसी तरह महिलाओं को भी करना चाहिए।
किसी भी रिश्ते की शुरुआत में महिला अपने मनपसंद पुरुष को आँख के हल्क़े इशारे से बता देती है कि तुम मुझे सुखी बना सकते हो। यह इशारा करके वह दरअसल उनका संबंध शुरू करती है। यह निगाह पुरुष को क़रीब आने के लिए प्रोत्साहित करती है। इससे पुरुष के मन से संबंध बनाने का डर दूर हो जाता है, और वह आगे क़दम उठाता है। दुर्भाग्य से; जब एक बार रिश्ता जुड़ जाता है और समस्याएँ सामने आने लगती हैं, तो महिला यह भूल जाती है कि वह संदेश अब भी पुरुष के लिए कितना महत्त्वपूर्ण है, इसलिए वह इसे भेजने की उपेक्षा कर देती है।
जब किसी महिला को अहसास होता है कि वह सचमुच प्रेम पाने की हक़दार है, तो वह एक दरवाज़ा खोल रही है; ताकि पुरुष उसे प्रेम दे सके, लेकिन जब विवाह में दस बरस तक महिला ही प्रेम देती रहती है और उसे बदले में कुछ नहीं मिलता, तब जाकर उसे यह अहसास होता है कि वह ज़्यादा की हक़दार है।
जब ग़लतफ़हमियाँ पैदा हों, तो याद रखें कि हम अलग भाषाएँ बोलते हैं; पार्टनर की बात का असली अर्थ क्या है या वह सचमुच क्या कहना चाहता है, उसका अनुवाद करने में थोड़ा समय लगाएँ। इसके लिए निश्चित रूप से अभ्यास की ज़रूरत होती है, लेकिन यह इतना महत्त्वपूर्ण काम है कि आपको इसे करना चाहिए।
जब कोई पुरुष किसी महिला से प्रेम करता है, तो वह प्रेम और संतुष्टि से दमकने लगती है।
कुछ समय तक अंतरंगता की भूख संतुष्ट होने के बाद, अब पुरुष को स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता की भूख महसूस होने लगती है।
जब कोई पुरुष तनाव में होता है, तो वह सिर्फ़ एक ही समस्या पर अपना ध्यान केंद्रित करता है और बाक़ी समस्याओं को भूल जाता है। दूसरी तरफ़; जब कोई महिला तनाव में होती है, तो वह अपनी समस्याओं को फैला लेती है और उनके बोझ से दबी हुई महसूस करती है।
कोई भी महिला इस नकारात्मक और ग़लत धारणा के प्रति विशेष रूप से अति संवेदनशील होती है कि वह प्रेम पाने के योग्य नहीं है। यदि बचपन में उसने बुरा बर्ताव देखा है या वह स्वयं इसका शिकार हो चुकी है, तो प्रेम पाने के योग्य नहीं होने के अहसास के प्रति वह और भी अधिक संवेदनशील होती है। इससे उसके लिए अपना महत्त्व तय करना कठिन हो जाता है। महत्त्वहीन होने का यह अहसास अचेतन मन में छिपा होता है, जिससे यह डर उत्पन्न होता है कि उसे अन्य लोगों की ज़रूरत होगी। उसके मन के एक कोने में कहीं यह कल्पना पैदा होती है कि उसे समर्थन नहीं मिलेगा।
संबंधों में पुरुषों और महिलाओं की अपनी-अपनी लय और चक्र होते हैं। पुरुष दूर जाते हैं और फिर क़रीब आते हैं, जबकि महिलाओं में ख़ुद को और दूसरों को प्रेम करने की सामर्थ्य ऊपर उठती और नीचे गिरती रहती है।
महिलाओं के लिए न सिर्फ़ दूसरों की आवश्यकता दुविधाजनक होती है, बल्कि निराश होना या परित्याग होना खास तौर पर दर्द भरा होता है—सबसे छोटे तरीक़ों से भी। दूसरों पर निर्भर होना और फिर नज़रअंदाज़ किया जाना, भुला दिया जाना या ख़ारिज किया जाना, किसी महिला के लिए आसान नहीं होता। दूसरों की ज़रूरत महिला को संवेदनशील और असुरक्षित स्थिति में रख देती है। नज़रअंदाज़ किए जाने या निराश किए जाने से उसे ज़्यादा चोट पहुँचती है, क्योंकि इससे उसके अंदर की यह ग़लत धारणा पुष्ट होती है कि वह महत्त्वहीन है।
जब पुरुष और महिलाएँ अपनी भिन्नताओं को समझ लेते हैं; उनका सम्मान करते हैं और उन्हें स्वीकार कर लेते हैं, तो प्रेम को पल्लवित और विकसित होने का मौक़ा मिल जाता है।
पुरुष रबर बैंड जैसे होते हैं। जब वे ख़ुद को दूर खींच लेते हैं, तो रबर बैंड की तरह उनके दूर जाने की भी एक सीमा होती है। उस सीमा पर पहुँचने के बाद, वे रबर बैंड जितनी ही तेज़ी से लौट आते हैं। पुरुषों के अंतरंगता चक्र को समझने के लिए, रबर बैंड की तुलना आदर्श है। यह चक्र है क़रीब आना, ख़ुद को दूर खींचना और फिर दोबारा क़रीब आना।
जब किसी महिला की लहर ऊपर उठती है, तो उसे महसूस होता है जैसे वह प्रचुर प्रेम दे सकती है, लेकिन जब यह गिरती है, तो वह आंतरिक खोखलापन महसूस करती है और उस ख़ाली जगह को सामने वाले के प्रेम से भरने की ज़रूरत होती है। नीचे आने का यह समय भावनात्मक घरेलू सफ़ाई का समय होता है।
महिलाएँ सहज बोध से जानती हैं कि अगर उनका पार्टनर उनके दर्द को सुनकर समझ ले; तो वह ऐसे परिवर्तन कर लेगा, जो वह कर सकता है।
अपने पार्टनर के साथ जुड़ने के बाद, पुरुष कुछ हद तक ख़ुद को खो देता है।
हमारे बच्चे बेहतर संसार के हक़दार हैं।
पुरुषों और महिलाओं; दोनों को अपनी परवाह के जो तरीक़े पसंद हैं, उन्हें अपोज़िट सेक्स पर लागू न करें, क्योंकि उन्हें दूसरा तरीक़ा पसंद होता है। इसके बजाय उन्हें यह सीखना चाहिए कि उनके पार्टनर उनसे अलग किस तरह से सोचते, महसूस करते और प्रतिक्रिया करते हैं।
पुरुष स्वचालित रूप से अंतरंगता और स्वतंत्रता की आवश्यकताओं के बीच झूलते रहते हैं।
जब महिला अपने विचार बताती है, तो वह स्वाभाविक रूप से पुरुष को बोलने के लिए प्रोत्साहित करती है, लेकिन जब पुरुष महसूस करता है कि उसके बोलने की माँग की जा रही है, तो उसका दिमाग़ खाली हो जाता है।
महिला की बात सुनना किसी पुरुष के लिए मुश्किल होता है; क्योंकि वह ग़लती से तार्किक क्रम की उम्मीद करता है, जबकि महिला एक समस्या से दूसरी समस्या पर बिना किसी क्रम के कूदती रहती है।
जब कोई पुरुष दूर जा रहा है; वह समय उससे बात करने या उसके ज़्यादा क़रीब जाने की कोशिश करने का नहीं है, उसे दूर जाने दें। कुछ समय बाद वह लौट आएगा। जब वह लौटेगा, तो वह प्रेम और उत्साह से भरा हुआ होगा और इस तरह काम करेगा, मानो कुछ हुआ ही न हो। तब आप उससे जी भरकर बातें कर सकती हैं।
मैंने बहुत-सी महिलाओं को इस बारे में आश्वस्त किया है कि बेहतर संबंध पाने के लिए उन्हें ज़्यादा प्रेम या सहायता देने की ज़रूरत नहीं है। उलटे, अगर वे कम देने
लगेंगी, तो उनका पार्टनर दरअसल उन्हें ज़्यादा देने लगेगा।
अगर किसी महिला को उसके पिता ने छोड़ दिया था या उसकी माँ को उसके पति ने छोड़ दिया था, तो वह इस मामले में और भी ज़्यादा संवेदनशील होगी कि पुरुष कहीं उसे छोड़कर न चला जाए।
पुरुषों को प्रेरणा और शक्ति तब मिलती है, जब उन्हें महसूस होता है कि महिलाओं को उनकी ज़रूरत है। महिलाएँ तब प्रेरित और शक्तिशाली होती हैं, जब उन्हें महसूस होता है कि उनसे प्रेम किया जा रहा है।
अपनी क्षमता को साबित करने का अवसर मिलने पर पुरुष अपने सर्वश्रेष्ठ स्वरूप को व्यक्त करता है। जब उसे महसूस होता है कि वह सफल नहीं हो सकता, तभी वह अपने पुराने स्वार्थपूर्ण तरीक़ों की ओर लौटता है।
बचपन में कई पुरुषों के सफल रोल मॉडल नहीं होते। उनके लिए प्रेम को क़ायम रखना, शादी करना और परिवार पालना उतना ही मुश्किल होता है, जितना किसी प्रशिक्षण के बिना जम्बो जेट उड़ाना। वह विमान को हवा में उड़ाने में तो कामयाब हो सकता है, लेकिन वह यक़ीनन दुर्घटनाग्रस्त हो जाएगा। जब आप विमान को कई बार दुर्घटनाग्रस्त कर देते हैं (या अगर आपने अपने पिता को दुर्घटनाग्रस्त होते देखा हो), तो इसके बाद उड़ान भरते रहना मुश्किल होता है। यह समझना आसान है कि संबंधों के अच्छे प्रशिक्षण मैन्युअल के बिना, कई स्त्री-पुरुष संबंधों में हार क्यों मान लेते हैं।
लक्ष्य-केंद्रित होने के बजाए महिलाएँ संबंध-केंद्रित होती हैं। वे अपनी अच्छाई, प्रेम और परवाह व्यक्त करने से ज़्यादा सरोकार रखती हैं।
संबंधों में महिलाओं की सबसे बड़ी शिकायत यह रहती है—मुझे यह महसूस ही नहीं होता कि सामने वाले ने मेरी पूरी बात सुनी है।
महिलाएँ यह समझ ही नहीं पाई हैं कि परेशान होने पर पुरुषों को अकेले रहने या चुप रहने की सचमुच ज़रूरत होती है।
अगर आप महिला हैं, तो मेरा सुझाव है कि आप अगले सप्ताह किसी पुरुष को किसी तरह की बिन माँगी सलाह न दें या किसी तरह से आलोचना न करें। आपके जीवन के पुरुष न सिर्फ़ इसकी क़द्र करेंगे, बल्कि वे आप पर ज़्यादा ध्यान भी देंगे व प्रतिक्रियाशील होंगे।
ख़ुद की दर्द भरी भावनाओं को भुलाने के लिए, महिला दूसरों की समस्याओं में भावनात्मक रूप से शामिल हो सकती है।
अगर पुरुष को यह यह लगने लगे कि किसी को उसकी ज़रूरत नहीं है, तो यह अहसास उसके लिए धीमी मृत्यु के समान होता है।
जब कोई पुरुष महिला की आवश्यकताओं को नज़रअंदाज़ करता रहता है, तो ऐसा लगता है जैसे दोनों सोए हुए हैं। जब वह जागती है और उसे अपनी ज़रूरतें याद आती हैं, तो वह भी जागता है और महिला को ज़्यादा देना चाहता है।
जब कोई महिला तनाव में होती है; तो वह तुरंत अपनी समस्याओं का समाधान नहीं चाहती, बल्कि वह तो अपनी भावनाएँ व्यक्त करके और सामने वाले की समझ भरी प्रतिक्रिया से राहत पाना चाहती है।
ज़्यादातर पुरुषों को पता नहीं होता कि किसी महिला के लिए यह अहसास कितना महत्त्वपूर्ण होता है कि उसके पास किसी परवाह करने वाले का समर्थन है।
अपनी भावनाओं को पूरी तरह से अभिव्यक्त करने के लिए महिलाएँ आम तौर पर अतिशयोक्तियों, अलंकारों, सामान्यीकरण और इसी तरह की दूसरी स्वतंत्रताओं का भरपूर इस्तेमाल करती हैं।
पुरुष को पहले ख़ुद को बहुत दूर खींचने की ज़रूरत होती है, जिसके बाद ही वह बोलना और खुलना सीख सकता है, लेकिन तब भी महिला को पहले काफ़ी समय तक बोलना होगा। जब महिला अपनी बात सुनने के लिए पुरुष की तारीफ़ करती है, तो वह धीरे-धीरे ज़्यादा बोलने लगेगा।
महिलाओं के 'स्व' का अहसास, उनकी भावनाओं और उनके संबंधों की गुणवत्ता से परिभाषित होता है।
जब कोई महिला विचलित होती है, पस्त होती है, दुविधाग्रस्त होती है, थकी होती है या निराश होती है, तो उसे सबसे ज़्यादा ज़रूरत सिर्फ़ प्रेमपूर्ण साथी की होती है।
जब कोई पुरुष ख़ामोश होता है, तो महिला के लिए सबसे बुरे परिदृश्य की कल्पना करना आसान होता है।
किसी पुरुष के लिए महिला के दबाव पर बोलना मुश्किल होता है। महिला उससे सवाल पूछकर अनजाने में ही उसकी बत्तियाँ बुझा देती है, या उसे बिदका देती है।
महिलाओं के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि जब पुरुष बोलना बंद कर देता है, तो वह सही व्याख्या कैसे करे या उसे समर्थन कैसे दे।
महिलाओं के लिए यह समझना अनिवार्य है कि अगर वे लगातार अंतरंगता पर ज़ोर देती हैं या दूर खिंचने की इस प्रक्रिया में अपने अंतरंग पुरुष पार्टनर के 'पीछे भागती' हैं, तो वह लगभग हमेशा ख़ुद् को दूर ले जाने की कोशिश करेगा; उसे कभी प्रेम की जोशीली हसरत महसूस करने का मौक़ा ही नहीं मिलेगा।
पुरुष महिला के प्रतिरोध को ज़्यादा अच्छी तरह सँभाल सकता है, अगर वह यह समझ ले कि उसके समाधानों को अस्वीकार नहीं किया जा रहा है, बल्कि उसकी टाइमिंग और संवाद शैली को अस्वीकार किया जा रहा है।
जिस तरह हम भूख लगने का निर्णय नहीं लेते हैं, उसी तरह पुरुष भी दूर जाने का निर्णय नहीं लेता है। यह स्वचालित और सहज बोध से उत्पन्न होने वाली आकांक्षा है।