सिस्टम पर उद्धरण
'सिस्टम ही ख़राब है'
के आशय और अभिव्यक्ति में शासन-व्यवस्था या विधि-व्यवस्था पर आम-अवाम का असंतोष और आक्रोश दैनिक अनुभवों में प्रकट होता रहता है। कई बार यह कटाक्ष या व्यंग्यात्मक लहज़े में भी प्रकट होता है। ऐसे 'सिस्टम' पर टिप्पणी में कविता की भी मुखर भूमिका रही है।
एम.ए. करने से नौकरी मिलने तक जो काम किया जाता है, उसे रिसर्च कहते हैं।
वर्तमान शिक्षा-पद्धति रास्ते में पड़ी हुई कुतिया है, जिसे कोई भी लात मार सकता है।
प्रजातंत्र में सबसे बड़ा दोष है; तो यह कि इसमें योग्यता को मान्यता नहीं मिलती—लोकप्रियता को मिलती है। हाथ गिने जाते हैं, सिर नहीं तौले जाते।
तबादले की एक बँधी-बँधाई नैतिक पद्धति है। अफ़सर या मंत्री से संबंध होने से तबादले होते हैं। फिर तबादले करने के रेट बँधे हैं। लोककर्म विभाग के रेट ऊँचे हैं, शिक्षा-विभाग के रेट कम हैं—यह एक ईमानदार प्रक्रिया है।
यह ‘मिसफिट्स’ का युग है भाई। जिसे जुआड़ख़ाना चलाना चाहिए, वह मंत्री है। जिसे डाकू होना चाहिए, वह पुलिस अफ़सर है। जिसे दलाल होना चाहिए, वह प्रोफ़ेसर है।जिसे जेल में होना चाहिए, वह मज़िस्ट्रेट है। जिसे कथावाचक होना चाहिए, वह उपकुलपति है। जिसे जहाँ नहीं होना चाहिए, वह ठीक वहीं है।
इस देश में कोई युवक नहीं जानता कि उसका आख़िर होगा क्या? वह यह भी जानता है बी. ए. करने से कुछ होता नहीं है। जब तक फेल होता जाता है, विद्यार्थी कहलाता है—जब पास हो जाएगा तब बेकार कहलाएगा।
विश्वविद्यालयों में तो गुरु-कृपा से ही डिग्री मिलती है। सब जानते हैं, पढ़ने से कुछ नहीं होता। अगर आचार्य की कृपा हो जाए, तो प्रतिद्वंद्वी विद्यार्थी का अँगूठा काटकर वह प्रिय विद्यार्थी को दे देता है। राजा के लड़के और भील के लड़के में जो अंतर तब था, वही अब है।
प्रत्येक व्यक्ति को स्वतंत्रता और बंधन दोनों चाहिए; स्वार्थ तथा परार्थ दोनों की आवश्यकता है, अन्यथा वह जीवन-मुक्त होकर भी किसी को कुछ नहीं दे पाता।
जो भी ज्ञान है; उससे चुनकर मनुष्य जीने के लिए जिस व्यवस्था का निर्माण करता है, उसी को सभ्यता कहते हैं।
संयम-धर्म, पूँजीवादी व्यवस्था पर आधारित था और उत्पादन के फैलाव को रोकता था। संपूर्ण उत्पादन को जानबूझ कर, उच्च वर्ग की शान-शौकत क़ायम रखने के लिए सीमित किया गया था। यह तभी संभव था; जब उत्पादन मशीनरी को यानी सर्वहारा को, सादा जीवन जीने के लिए मज़बूर किया जाता या उन्हें डाँट-डपट कर वैसा करने को बाध्य किया जाता कि जितना ही सादा जीवन उतना ही अच्छा।
जो व्यवस्था कुलवधू को त्रास दे-देकर रंडी के कोठे पर बिठा सकती है, वह मध्यवर्गीय ठगनी को दुर्दांत दस्युनेत्री भी बना सकती है।
जिनका कक्षा में मुँह न खुले, जो विद्यार्थियों को देखकर काँप जावे, उन्हें प्रोफ़ेसर बना देना चाहिए। जो अफ़सर सब जगह नालायक सिद्ध हो गए, उन्हें तरक़्क़ी देकर शिक्षा-विभाग का अफ़सर बनाना चाहिए।
नेताओं और मंत्रियों को नैतिक स्तर की बड़ी चिंता है। यानी जीवन-स्तर चाहे रसलात को चला जाए, नैतिक स्तर हिमालय के शिखर पर चढ़ा रहना चाहिए।
हम्पी जैसा संपन्न और जीवंत शहर कैसे नष्ट हो सकता है, और आज उसका अस्तित्व कैसे ख़त्म हो सकता है? पूरे इतिहास में, किसी भी समाज को टुकड़े-टुकड़े करने का सबसे तेज़ तरीक़ा, कानून-व्यवस्था ख़त्म कर देना था और यह स्थिति किसी नागरिक अंसतोष या युद्ध के कारण सरकारी नियंत्रण ख़त्म होने से आती थी।
स्वेच्छापूर्ति साधना ही जिसका स्वभाव है; ऐसा मनुष्य व्यवस्था की ओर झुके भी तो केवल इसलिए झुक सकता है, क्योंकि उसकी इच्छा अन्य को भी अपनी इच्छापूर्ति का साधन बनाना चाहती है—ऐसे में दंड का ही साम्राज्य हो सकता है, व्यवस्था उभरे भी तो दास-व्यवस्था ही उभरेगी, कोई परस्पर-भाव-जन्य ‘समझौता’ कैसे बनेगा?
धर्म का अर्थ ही सामंजस्य है। यह सामंजस्य सौंदर्य की भी रक्षा करता है; मंगल की भी रक्षा करता है, एवं सौंदर्य और मंगल का भेद समाप्त कर, दोनों को ही एक आनंदमय संपूर्णता प्रदान करता है।
यदि सरकार सहिष्णु होती है, तो जनता बुरे मार्गों से दूर रहती है। यदि सरकार की तरफ़ से अनावश्यक हस्तक्षेप होता है, तो लोग शासन को नियमों का उलंघन करने लगते हैं।
सरकार से भ्रष्टाचार की शिकायत करोगे तो, भ्रष्टाचार बंद नहीं करेगी—कमेटी बिठाएगी। अन्नाभाव की शिकायत करोगे, तो अन्न पैदा नहीं कराएगी—अन्न कमेटी बिठाएगी। सरकारी काम ऐसा ही होता है।
व्यवस्था ठीक हो तो प्रक्रिया भी ठीक से होती है, लेकिन अव्यवस्था हो तो विचार भटक जाते हैं।
कुछ दिन पहले इस देश में यह शोर मचा था कि अपढ़ आदमी बिना सींग-पूँछ का जानवर होता है। उस हल्ले में अपढ़ आदमियों के बहुत-से लड़कों ने देहात में हल और कुदालें छोड़ दीं और स्कूलों पर हमला बोल दिया।
हर बड़ा सिस्टम अपने दुश्मनों के आकार को घटाकर, आंतरिक आलोचक बना लेता है और उन्हें अपनी अंत:वृत्त में रखकर निर्णय करता है और विरोधों, उनके प्रतिरोध में से कुछ को सामान्य, तार्किक और न्यायोचित तथा कुछ को असामान्य, पागलपन और अवैध क़रार देता है।
धार्मिक उपदेशकों और सत्ताधारियों की मिलीभगत से ही जेलों, फांसियों, कोड़ों और इन सिद्धांतों का निर्माण हुआ है।
समितियाँ बनाना, उनके द्वारा जाँच किया जाना, रिपोर्ट बनाना, उस पर संसद में बहस होना। फिर उस रिपोर्ट का पहले की असंख्य रिपोर्टों के ढेर में डाल दिया जाना, लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए ज़रूरी है। जितनी ज़रूरी जाँच है, उतना ही ज़रूरी यह है कि उस पर अमल न किया जाए।
गुरुकुलों, ऋषि-मुनियों, शिक्षा की पवित्रता, आदर्श आदि की बात करना पाखंड है। जो यथार्थ है, वह यह है कि शिक्षा के क्षेत्र में पढ़ने और पढ़ानेवाले आमतौर पर भ्रष्ट हैं। अपवाद ज़रूर है, अनुपात भी कम है, पर वस्तुस्थिति यही है।
'यूनिवर्सिटी' या 'विश्वविद्यालय' की अवधारणा शाब्दिक स्तर पर भी यह चेतावनी देती है कि शिक्षा के वैचारिक संसार की भौगोलिक सीमाएँ तय करना बेमानी है।
पुलिस अफ़सर का प्रेम ख़तरनाक होता है। लोकप्रिय पुलिस अफ़सर एक मुसीबत है।
किसी देश का आर्थिक विकास निर्भर करता है, उसके जन सामान्य की खपत की योग्यता पर। यह अर्थशास्त्र का मामूली-सा सिद्धांत है।
तुम्हारे विचार बहुत ऊँचें हैं पर कुल मिलाकर उससे यही साबित होता है कि तुम गधे हो।
प्राचीन समाज-व्यवस्था में चाहे आदमी जिस जाति का हो, लेकिन उस जाति को छिपाता नहीं था। उस जाति का होने में भी अपने-आपमें एक सम्मान अनुभव करता था। आज वह मनुष्य ज्यादा उपेक्षित, पीड़ित, दलित और पतित मान लिया गया है।
पुनर्जन्म के सिद्धांत की ईजाद दीवानी की अदालतों में हुई है, ताकि वादी और प्रतिवादी इस अफ़सोस को लेकर न मरें कि उनका मुक़दमा अधूरा ही पड़ा रहा। इसके सहारे वे सोचते हुए चैन से मर सकते हैं कि मुक़दमे का फ़ैसला सुनने के लिए अभी अगला जन्म तो पड़ा ही है।
त्याग के और ज़िंदगी से इनकार करने के ख़याल लोगों में उस वक़्त पैदा होते हैं, जब राजनीतिक या आर्थिक मायूसी का उन्हें सामना करना पड़ता है।
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कुव्यवस्था से चिपके रहने के कारण उसे व्यवस्था का सहज अंग मानने की आदत पड़ जाती है और संवेदना—जो सृजन की बुनियादी शर्त है—भोथरी पड़ने लगती है।
ये अदालतें लोगों के भले के लिए नहीं हैं। जिन्हें अपनी सत्ता कायम रखनी है, वे अदालतों के ज़रिए लोगों को बस में रखते हैं।
क़स्बे अब शहर बन गए हैं पर महानगरों के पास आने की जगह और दूर चले गए हैं, भले नई संचार व्यवस्था यह दावा करते नहीं थकती कि उसने भौगोलिक और सामाजिक दूरियाँ मिटा दी हैं।
रुप्पन बाबू अठारह साल के थे। वे स्थानीय कॉलिज की दसवीं कक्षा में पढ़ते थे। पढ़ने से और ख़ासतौर से दसवीं कक्षा में पढ़ने से, उन्हें बहुत प्रेम था; इसलिए वे उसमें पिछले तीन साल से पढ़ रहे थे।
व्यवस्था या पद्धति के विरुद्ध झगड़ना शोभा देता है, पर व्यवस्थापक के विरुद्ध झगड़ा करना तो अपने विरुद्ध झगड़ने के समान है।
अराजक देश में अलंकृत मनुष्य प्रसन्न अश्वों और रथों पर चढ़कर नहीं चल सकते।
हमारी शिक्षा की दूध पीने की छोटी बोतल लगभग ख़ाली है, और स्वास्थ्य-विज्ञान हताश होकर अपना अँगूठा चूस रहा है।
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अराजक देश में दूर की यात्रा करने वाले वणिक बहुत सी पण्य-सामग्री लेकर कुशलपूर्वक मार्गों में नहीं चल सकते।
अराजक देश में बाण चलाने का अभ्यास करने वाले योद्धाओं का टंकारघोष नहीं सुनाई पड़ता।
जो जनता का विश्वास खो दे, उसके लिए शिक्षा-विभाग कचरे की टोकरी है। जो सामान बेकार होता जाए उसे इसमें फेंकते जाना चाहिए।
प्रगतिशील देशों के सामने एक ही आदर्श है—अमरीका। अमरीका जैसा बनना ही उनका उद्देश्य है। लेकिन अमरीका में भी कुछ लोगों को संभवतः मालूम है कि वह व्यवस्था ज़हरीली है।
भारत में वर्ग-संघर्ष न होने का कारण यह है कि अपने वर्ग-चरित्र का सबने त्याग कर दिया है, और वर्तमान व्यवस्था में सबके निहित स्वार्थ फँसे हुए हैं।
अराजक देश में योग और क्षेम का नाश हो जाता है। अराजक राष्ट्र की सेना शत्रुओं से युद्ध नहीं करती।
पुलिस की लीला अपरम्पार है।
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बहुत सारी समस्याएँ थीं, जहाँ भी देखो दुष्टता अपना सिर उठा रही थी।
दरख़्वास्त को किसी भी समय ख़ारिज कराया जा सकता है।
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संबंधित विषय : राग दरबारीऔर 1 अन्य
अराजक देश में जितेंद्रिय पुरुष माला, मिष्ठान और दक्षिणा से देवताओं की पूजा नहीं कर सकते।
आदमी का जब करम फूटता है तभी उसे थाना-कचहरी का मुँह देखना पड़ता है।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
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