संयम की अवधारणा सर्वहारा के जीवन स्तर को जहाँ का तहाँ रखने की गारंटी है।
संयम-धर्म, पूँजीवादी व्यवस्था पर आधारित था और उत्पादन के फैलाव को रोकता था। संपूर्ण उत्पादन को जानबूझ कर, उच्च वर्ग की शान-शौकत क़ायम रखने के लिए सीमित किया गया था। यह तभी संभव था; जब उत्पादन मशीनरी को यानी सर्वहारा को, सादा जीवन जीने के लिए मज़बूर किया जाता या उन्हें डाँट-डपट कर वैसा करने को बाध्य किया जाता कि जितना ही सादा जीवन उतना ही अच्छा।
सामंतवाद में वधू के घर की जो लूट थी, वह पूँजीवाद में दहेज़ हो गई।
चालबाज़ी का एक तरीक़ा, व्यक्तियों में निजी सफलता की पूंजीवादी भूख पैदा करना है। यह चालबाज़ी कभी सीधे-सीधे अभिजनों द्वारा की जाती है, तो कभी परोक्ष रूप से अंधलोकवादी (पॉपुलिस्ट) नेताओं द्वारा कराई जाती है।
जिस समाज में पूँजी का वर्चस्व हो, वहाँ सिनेमा अनिवार्य रूप से उसकी जकड़बंदियों में ही ज़्यादा फँसा रहता है।
पूँजी की संस्कृति के मूल ही में बसी है हिंसा।
पूँजीवादी व्यवस्था में दो अच्छाइयाँ हैं। अगर अच्छाई शब्द से मानव समाज की बहबूदी समझी जाए, तो पहली अच्छाई है नष्ट करने की प्रवृत्ति—डिस्ट्रक्टिव। इस प्रक्रिया में पूँजीवाद मध्ययुगीन सामंती सामाजिक व्यवस्था, मय उसके धार्मिक विचारधारा के मलवे को साफ़ करता है। दूसरी है रचनात्मक—(कंसट्रक्टिव)। पूँजीवाद औद्योगिक विकास उस सीमा तक ले जाता है, जहाँ से मानवता बड़ी आसानी से सामाजिक विकास के उच्चतम स्तरों पर पदार्पण कर सकती है।
पूँजीवादी समाज में व्यक्ति को अपनी स्थिति-रक्षा का संघर्ष करना ही पड़ता है।
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बुद्धि जो कि अलिप्त, निर्मम, स्व-पर-निरपेक्ष कही जाती है, उसी के क्षेत्र में इतनी आत्म-केंद्रिता का विकास—पूँजीवादी समाज की विशेषता है। फिर साहित्य और कला का क्या कहना।
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बिना विज्ञापन के पूँजीवाद ज़िंदा नहीं रह सकता—साथ ही विज्ञापन इसका स्वप्न है।
पूँजीवाद एक बार सुप्रतिष्ठित हो जाने पर सांस्कृतिक क्षेत्र में सबसे पहले कविता पर हमला करता है।
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पूँजीवादी संस्कृति में किसी और तरह की आशा या संतुष्टि या सुख सिर्फ़ ईर्ष्या करने के लिए है।
‘फ़्रीडम’ (स्वतंत्रता) का अर्थ जो लोग ‘पूँजीवादी की स्वतंत्रता’ लेते हैं—हम उसके विरुद्ध हैं।
पूँजीवाद कवियों को वह विश्व-दृष्टि और विश्व-स्वप्न रखने ही नहीं देता कि जो दृष्टि या जो स्वप्न, जीवन-जगत् की व्याख्या और उसकी विकासमान प्रक्रिया के आभ्यंतरीकरण से उत्पन्न होता है।
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere