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प्रेम पर सवैया

प्रेम के बारे में जहाँ

यह कहा जाता हो कि प्रेम में तो आम व्यक्ति भी कवि-शाइर हो जाता है, वहाँ प्रेम का सर्वप्रमुख काव्य-विषय होना अत्यंत नैसर्गिक है। सात सौ से अधिक काव्य-अभिव्यक्तियों का यह व्यापक और विशिष्ट चयन प्रेम के इर्द-गिर्द इतराती कविताओं से किया गया है। इनमें प्रेम के विविध पक्षों को पढ़ा-परखा जा सकता है।

सुदामा चरित

नरोत्तमदास

अपने नहिं होत पराए पिया

ठाकुर बुंदेलखंडी

रोज न आइयै जौ मन मोहन

ठाकुर बुंदेलखंडी

रस ही रस में रसबाद कछू

चंद्रशेखर वाजपेयी

गइ आइ दसो दिसि ते

गुरु गोविंद सिंह

कोयल कूक तैं हूक हिये

बिड़दसिंह माधव

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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