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लालच पर उद्धरण

लालच किसी पदार्थ, विशेषतः

धन आदि प्राप्त करने की तीव्र इच्छा है जिसमें एक लोलुपता की भावना अंतर्निहित होती है। इस चयन में लालच विषय पर अभिव्यक्त कविताओं को शामिल किया गया है।

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किसान को—जैसा कि ‘गोदान’ पढ़नेवाले और दो बीघा ज़मीन' जैसी फ़िल्में देखनेवाले पहले से ही जानते हैं—ज़मीन ज़्यादा प्यारी होती है। यही नहीं, उसे अपनी ज़मीन के मुक़ाबले दूसरे की ज़मीन बहुत प्यारी होती है और वह मौक़ा मिलते ही अपने पड़ोसी के खेत के प्रति लालायित हो उठता है। निश्चय ही इसके पीछे साम्राज्यवादी विस्तार की नहीं, सहज प्रेम की भावना है जिसके सहारे वह बैठता अपने खेत की मेड़ पर है, पर जानवर अपने पड़ोसी के खेत में चराता है।

श्रीलाल शुक्ल
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लोग, लोभ, काम, क्रोध, अज्ञान, हर्ष अथवा बालोचित चपलता के कारण धर्म के विरुद्ध कार्य करते तथा श्रेष्ठ पुरुषों का अपमान कर बैठते हैं।

वेदव्यास
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गाँधीवाद, समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता की जो बात की जाती है, वह ख़ास अर्थ नहीं रखती। मूल है, जो भी हाथ पड़ जाए, सत्ता पा लेना।

हरिशंकर परसाई
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मेरे काम-क्रोधादि नहीं गए, चिल्लाने से वे कभी नहीं जाते। नहीं गए कहकर ऐसा कर्म, ऐसी चिंता का अभ्यास कर लेना चाहिए, जिसमें काम-क्रोधादि की गंध भी नहीं रहे—मन जिससे उन सबको भूल जाए।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र
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स्वर्ग की तृष्णा मनुष्य के मनुष्य होने की ललक है।

मिलान कुंदेरा
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साहित्य में बंधुत्य से अच्छा धंधा हो जाता।

हरिशंकर परसाई
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मनुष्य का असंयम और उसकी बढ़ी हुई विलास-लालसा ही, समय-समय पर मनुष्य-जाति के पतन का कारण बनती रही है।

महादेवी वर्मा
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सरकार का विरोध करना भी, सरकार से लाभ लेने और उसमें संरक्षण प्राप्त करने की एक तरक़ीब है। लेखक अब 'बेचारा' रह गया है, भोला। वह जानता है कि सरकार का विरोध करने से कभी-कभी समर्थन से अधिक फ़ायदे मिलते हैं।

हरिशंकर परसाई
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चोरी के माल के साथ पकड़ा हुआ चोर अब कह ही क्या सकता है?

कालिदास
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अनशन पवित्र क्रिया है, किसी भी माँग पर हो सकता है। दूसरे की बीवी हड़पने के लिए भी आदमी अनशन कर सकता है। नैतिक प्रभाव और जनपत का दबाव पड़े, तो दूसरे की बीवी मिल सकती है। कुल मामला अच्छा ‘इशू’ बनाने का है।

हरिशंकर परसाई
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संसार के अधिकांश आदमियों की आँखों में कुछ ऐसा रोग-सा है कि उन्हें मनुष्यता की अपेक्षा सोने की परख अच्छी आती है।

हरिशंकर परसाई
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किसी पद को प्राप्त करने की चिंता के स्थान पर, अपने को उस पद के योग्य बनाने की चिंता करो। अपनी प्रसिद्धि होने के विषय में चिंता करने के बजाए, अपने को प्रसिद्धि प्राप्त करने के योग्य बनाओ।

कन्फ्यूशियस
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जो लोग स्वार्थवश, व्यर्थ की प्रशंसा और ख़ुशामद करके वाणी का दुरुपयोग करते हैं—वे सरस्वती का गला घोंटते हैं।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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धन के लोभ से युक्त युवती नायिका, नायक के गुणों, रूप (सौंदर्य) तथा औचित्य की परवाह करके—अनेक सौतों के होते हुए भी धनी पति को वरण कर ले।

वात्स्यायन
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अपने संबंध और जाति की ऊँचाई का तुम्हें घमंड नहीं करना चाहिए, क्योंकि अंत में तुम्हारे कर्मों पर ही तुम्हारा भविष्य निर्भर करता है।

ज़रथुस्त्र
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लोभ जिसमें है, फिर उसमें अन्य अवगुण क्या चाहिए? जो कुटिल है, उसे और पातक करने की क्या आवश्यकता है? सत्यवक्ता को तप का क्या प्रयोजन है? जिसका मन शुद्ध है, उसे तीर्थ करने से क्या अधिक फल होगा? जो सज्जन हैं, उन्हें मित्र और कुटुंब की क्या कमी है? यशस्वी पुरुषों के लिए यश से बढ़ कर क्या भूषण है।

भर्तृहरि
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सूर्य के उदय-अस्त होने से दिन-दिन आयुष्य घटती जाती है, अनेक कार्यों के भार के कारण व्यापार में व्यतीत काल जाना नहीं जाता; और जन्म, वृद्धापन, विपत्ति तथा मृत्यु देखकर भी त्रास नहीं होता, इससे यह निश्चित हुआ कि मोहमयी प्रमादरूपी मदिरा पीकर जगत् मतवाला हो रहा है।

भर्तृहरि
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लालच तथा लोभ को अपने अंदर मत आने दो। लोभी मनुष्य संसारिक सुख और आध्यात्मिक वैभव प्राप्त नहीं कर पाता।

ज़रथुस्त्र
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हर हिंदुस्तानी की यही हालत है। दो पैसे की जहाँ किफ़ायत हो, वह उधर ही मुँह मारता है।

श्रीलाल शुक्ल
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कर्म-भावना-प्रधान उत्साह ही सच्चा उत्साह है। फल-भावना-प्रधान उत्साह तो लोभ ही का एक प्रच्छन्न रूप है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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कामना करने वाले मनुष्य की एक कामना जब पूर्ण हो जाती है तो दूसरी कामना उपस्थित हो जाती है। तृष्णा बाण के समान तीक्ष्ण प्रहार करती है।

वेदव्यास
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एक पक्का गाना चल रहा है, जिसके बोल हैं—‘प्रभु मैं सत्ता कैसे पाऊँ। इसे कोई भैरवी में गाता है, कोई विहाग में, कोई जयजयवंती में। बाक़ी गाँधीवाद, समाजवाद और धर्म-निरपेक्षता तो साज हैं। गाँधीवाद तबला है, सामजवाद सारंगी और धर्मनिरपेक्षता हारमोनियम। मगर गाने के बोल वही हैं—'प्रभु, मैं सत्ता कैसे पाऊँ।'

हरिशंकर परसाई
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क्रोध प्रीति का नाश करता है, मान विनय का नाश करता है, माया मित्रता को समाप्त कर देती है और लोभ सभी सद्गुणों का नाश कर देता है।

महावीर
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उन्हें देखकर इस फ़िलासफ़ी का पता चलता था कि अपनी सीमा के आस-पास जहाँ भी ख़ाली ज़मीन मिले, वहीं आँख बचाकर दो-चार हाथ ज़मीन घेर लेनी चाहिए।

श्रीलाल शुक्ल
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एक पौराणिक कथा में, देवी लक्ष्मी ने देवताओं को तब छोड़ दिया जब उन्हें लगा कि उन्होंने लालच और अहंकार से धन पर क़ब्ज़ा कर लिया है। संदेश स्पष्ट है:- चीज़ों को लालच और ईर्ष्या के साथ देखना, अमीर बनने का तरीक़ा नहीं है।

अशदीन डॉक्टर
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मन का सूतक है लोभ, जिह्वा का सूतक है झूठ।

गुरु नानक
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तृष्णा सबसे बढ़कर पापिष्ठ तथा नित्य उद्वेग करने वाली बताई गई है। उसके द्वारा प्रायः अधर्म ही होता है।वह अत्यंत भयंकर पाप बंधन में डालने वाली है।

वेदव्यास
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स्वार्थबुद्धि की आत्मतुष्टि का अभिप्राय ही है लोभ, और यह लोभ ही है आसक्ति। जो निर्लोभ है, वही है अनासक्त।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र
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यदि आप पुरस्कार चाहते हैं, तो आपको दंड भी भुगतना होगा। दंड से बचने का एकमात्र उपाय, पुरस्कार का त्याग करना है।

स्वामी विवेकानन्द
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राजनीतिक लाभ मिलता हो, तो राजनीतिक सूरमा अपनी धर्मपत्नी से पेमेंट पर किसी से बलात्कार हल्ला कर सकता है कि अमुक जाति के आदमी ने मेरी पतिव्रता को भ्रष्ट किया।

हरिशंकर परसाई
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निरंतर मायके में रहने वाली, जिसके संतान पैदा होकर मर जाते हो, जो गोष्ठियों में निरंतर भाग लेती हो, जो पुरुष के साथ मेल-जोल बढ़ाने वाली हो, नट या अभिनेताओं की पत्नियाँ, बाल-विधवा स्त्री, दरिद्र होकर वैभव की इच्छा करने वाली, जिसके बहुत से देवर हों, जो अपने रूप एवं सौंदर्य के अभिमान में पति को हीन समझती हो, अपने कला-कौशल पर अभिमान करती हो और पति की मूर्खता से क्षुब्ध हो, जो लोभ से पति से उद्विग्न होकर दूसरे को चाहती हो—ये स्त्रियाँ सहज सिद्ध हो जाती हैं।

वात्स्यायन

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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