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Guru Nanak

1469 - 1539 | دوسرا, پنجاب

کی

باعتبار

जो मनुष्य रूखे वचन, कटु बोलता रहे तो उसका तन और मन दोनों फीके हो जाते हैं, मनुष्य के अंदर से प्रेम ख़त्म हो जाता है।

जो मानव अहंत्व और ममत्व की भावना को मन से दूर कर देता है, वह अपनी दुविधा को मिटाकर ईश्वर का ही रूप बन जाता है।

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अति डाह में घना दुःख है, मन, वचन, कर्म—तीनों हो जाते है भ्रष्ट।

सतिगुरु जीव को मुक्ति प्रदान करता है और परमात्मा के ध्यान में लगाता है। इस प्रकार हरिपद को जानकर जीव प्रतिष्ठा प्राप्त करते हैं।

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जो मनुष्य गुरु की कृपा से परमात्मा का नाम सिमरन की विद्या प्राप्त करता है, सीखता है, वह उस विद्या को पढ़-पढ़ कर जगत में आदर हासिल करता है, नामामृत को पाकर वह अंतर्मन में प्रकाश अनुभव करता है। उसका आत्मिक जीवन रौशन हो जाता है, उसके मन से अज्ञानता का अँधेरा दूर हो जाता है। उस मनुष्य को आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल मिल जाता नाता।

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कोई मनुष्य जितना किसी विद्या को लिखना-पढ़ना जानता है, उतना ही उसे अपनी विद्या पर घमंड होता है। इसलिए ईश्वर के दर पर स्वीकार होने के लिए विद्या ज़रूरी नहीं है।

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दिल का दरबान बने; दिल रखे सन्मार्ग पर, वही दरवेश है।

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स्वामी है नित्य, उसका न्याय भी नित्य है, भाषा है उसकी अनंत प्रेम।

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ये शरीर स्वयं को अमर जानकर सुख भोगने में ही लगा रहता है, यह नहीं समझता कि यह जगत एक खेल ही है।

किसी ने लोगों को आकर्षित करने के लिए धर्म के कई चिह्न धारण किए हुए हैं और कोई अपने शरीर को कष्ट दे रहा है। उसके लिए भी यही कहना ठीक है कि हे भाई! अपने किए कर्मो का दुःख सहन कर। ये वेष धारण करने, शरीर को दुःख देने आदि भी ईश्वर के दर पर स्वीकार नहीं हो सकते।

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यदि इंद्रिय-निग्रह दुकान हो, धैर्य सुनार बने, मनुष्य की अपनी बुद्धि अहरन हो, उस मति अहरन पर ज्ञान का हथौड़ा चोट करे। यदि अकाल-पुरख का भय धौंकनी हो, मेहनत आग हो, प्रेम कुठाली हो, तो हे भाई! उस कुठाली में अकाल-पुरख के नाम-अमृत को गलाया जाए, क्योंकि ऐसी ही सच्ची टकसाल में गुरु का शब्द गढ़ा जा सकता है। ये कार्य-व्यवहार उन्हीं मनुष्यों के ही हैं, जिन पर कृपा-दृष्टि होती है

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जगत रूपी छल की ओर से वासना से दूर होकर; जगत की वास्तविकता की समझ तभी आती है जब उस वास्तविकता का मालिक ईश्वर, मनुष्य के हृदय में बस जाता है।

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यदि अहं भाव करता हूँ तो हे ईश्वर! तू प्राप्त नहीं होता और यदि तू प्राप्त हो जाता है तो अहं-भाव नहीं रह पाता।

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अंधा वही है जो कुटिल कर्म करता है, उसका हृदय तो है, मगर ज्ञान की आँखें नहीं।

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जिन मनष्यों के हृदय में वास्तविक मालिक प्रभु बसा हुआ है; उनके सारे दुःखों का इलाज वह स्वयं बन जाता है, क्योंकि वह सभी विकारों को हृदय में से धोकर निकाल देता है, जहाँ वह बस रहा है।

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अगर कपड़े को लहू लग जाए, तो कपड़ा (चोला) अपवित्र हो जाता है और नमाज़ नहीं हो सकती, परंतु जो लोग मनुष्यों का लहू पीते है; ज़ोर-ज़बरदस्ती करके हराम की कमाई खाते हैं, उनका मन कैसे पवित्र रह सकता है?

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कर्म-फल से मिलता है शरीर, मुक्ति मिलती है प्रभु के प्रसाद से।

जो अमृत रूपी मदिरा का व्यापारी होता है, वह तुच्छ सांसारिक मद से क्यों प्रेम करे?

बाहर भटकते हुए जीव को गुरु द्वारा ही हृदय-महल में वापस लाया जा सकता है, और मिलाने वाला प्रभु स्वयं ही मिला देता है।

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अगर पढ़ा-लिखा मनुष्य कुकर्मी हो जाए, तो यह देखकर अनपढ़ मनुष्य को यह सोचकर घबराना नहीं चाहिए कि पढ़े-लिखे का ये हाल तो अनपढ़ का क्या बनेगा, क्योंकि अगर अनपढ़ मनुष्य नेक है तो उसे दंड नहीं मिलता।

काया काग़ज़ है, मन परवाना है।

प्रभु ने कहीं पुरुष बना दिए तो कहीं नारियाँ—ये सारे भी छल रूप हैं, जो इस पति-पत्नी वाले संबंध के छल से भ्रमित होकर नष्ट हो रहें।

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एक ही मार्ग है, भय और भोलापन मन में बसाओ।

सच्चा योगी वही है, जो प्रभु-मिलन की युक्ति को समझता है और जो गुरु की कृपा से एक ईश्वर को जानता है।

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गुर के शब्द द्वारा जो मन मर कर जीवे, उसे मिलेगा मोक्ष-द्वार।

कुमार्गी मनुष्य को सही मार्ग पर ले जाने के लिए, माया-मोह में अंधे हुए मन को शारीरिक रोगों के द्वारा सज़ा मिलती है।

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जाति या नाम के आधार पर यदि कोई जीव अपने आप को अच्छा कहलवाए, तो वह अच्छा नहीं बन जाता।

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सच्चे नाम के बिना सारा आडंबर मात्र विनाश।

चौरासी लाख योनियों में सुमेर पर्वत समान, मानव शरीर सर्वोच्च है।

योगी है अंधा, जनता नहीं योग की युक्ति, तीनों ही पतन के बंधु।

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सत्य संतोष का शरीर हो, सातों समुद्र निर्मल नीर से भरे हों।

जिस मनुष्य पर प्रभु की कृपा दृष्टि होती है, उस मनुष्य को गुरु द्वारा दिन-रात प्रभु-नाम लाभ मिलता रहता है।

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सत्य तभी जाना जा सकता है जब जीव गुरु से सच्ची शिक्षा लेकर; उस शिक्षा पर चलते हुए सब जीवों पर दया करता है और ज़रूरतमंदों को कुछ दान देता है।

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जिस मानव शरीर में परमात्मा का सदा-स्थिर रहने वाला नाम नहीं बसता, वह शरीर किसी काम नहीं आता—वह शरीर व्यर्थ ही हुआ समझो।

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अंधी प्रजा, ज्ञान से विहीन है और मृतक की भाँति चुपचाप अन्याय सहती है।

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जो अंधा स्वयं करता है मार्ग-निर्देश, वह सभी साथियों की लुटिया डुबोएगा।

गुरमुखों की संगति की इनायत से फिर जहाँ भी जा कर बैठें, वहीं मलाई की बात की जा सकती है और कुकर्मों/बरे विचारों से विमुख होकर, आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल पीया जा सकता है।

यती कहलवाने वाले जीवन की युक्ति को नहीं समझते और व्यर्थ ही घर-बार छोड़ देते हैं।

योगी भटक रहे बारह पंथों में, सन्यासी छः चार में।

हे प्रभु! मेरे अंदर दूसरों का ज़ुल्म सहने का स्वभाव और धैर्य पैदा कर, यही मेरे लिए दुधारू गाय है, ताकि मेरा मन बहुत शांत अवस्था में रहता हुआ शांति का दूध पी सके।

यदि शरीर के झुकने से कोई विनम्र बनता हो; तो शिकारी जो मृग का शिकार करता है, झुककर दुहरा हो जाता है।

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जगत की असल, प्रभु की समझ तभी आती है, जब मनुष्य ईश्वरीय जीवन जीने की युक्ति जान लेता है।

वे बड़भागी है; कर रखा है सत्य, जिन्होंने उर में धारण।

यह शरीर साँस के रहते तक नाम सिमरन के योग्य है। यदि अब प्रभु के गुण अपने अंदर ना बसाए, तो ये शरीर किस काम का? अंत में इसने नष्ट होकर राख का ढेर बन जाता है।

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जब तक मनुष्य परमात्मा के साथ साँझ नहीं डालता, उसकी उपासना नहीं करता, उसका मनुष्य जन्म व्यर्थ है।

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अगर हाथ-पाँव या शरीर मैला हो जाए, तो पानी से धोने पर वह मैल उतर जाती है। अगर कोई कपड़ा, मूत्र आदि से गंदा हो जाए तो साबुन लगाकर उसको धो लेते हैं। पर यदि मनुष्य की बुद्धि पापों से मलिन हो जाए, तो वह पाप अकाल-पुरख के नाम से प्रेम करके ही धोया जा सकता है।

प्रेम और सेवा के बल पर दूसरों को अपना बनाया जा सकता है।

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मधुकर की भाँति निर्लिप्त रहकर देखोगे, सर्वस्थान में मिलेगा प्रभु सारंगपाणि।

कुबुद्धि मनुष्य के अंदर मरासणि भाव डोमनी है। हिंसा कसाइन है। परनिंदा अंदर की भगिन है, और क्रोध चांडाल है जिसने जीव के शांत स्वभाव को ठग रखा है। यदि ये चारों भीतर ही बैठी हों, तो बाहर चौका स्वच्छ रखने के लिए लकीरें खींचने का क्या लाभ?

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अहम् भाव दूर करके गुरु के दर पर जाएँ तो ही हृदय को पवित्र करने की सूझ मिलती है।

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