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क़ानून निर्धन को पीसते हैं और धनवान क़ानून पर शासन करते हैं।
देशभक्त व्यक्ति सदैव यही डींग मारता है कि हम चाहें कहीं चले जाए पर सर्वोत्तम देश तो मेरा स्वदेश ही है।
एक दार्शनिक के लिए कितनी भी क्षुद्र परिस्थिति गौण नहीं होती।