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Friedrich Nietzsche

1844 - 1900

کی

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अंतःकरण का दंश मनुष्यों को दंशन सिखाता है।

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विवेक का तक़ाज़ा है कि हम बेपरवाह हों; अवहेलना और उग्रता करने वाले बनें, क्योंकि मानवीय विवेक एक स्त्री के समान है जो योद्धा के अतिरिक्त और किसी को प्रेम नहीं करती।

किसी महान व्यक्ति के अनुयायी प्रायः अपनी आंखें बंद रखते हैं ताकि वे उसका गुणगान अधिक अच्छी रीति से कर सकें।

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आलसी पाठकों से मुझे अत्यंत घृणा है।

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एक समय आत्मा को ईश्वर की पदवी प्राप्त थी, फिर यह मनुष्य बनी और अंत में यह केवल एक बाज़ारू जमघट बनकर रह गई है।

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वह लेखक जो रक्त से लिखता है और कहावतें रचता है; यह नहीं चाहेगा कि लोग केवल उसको पढ़ें, बल्कि यह चाहेगा कि लोग उसे कण्ठस्थ करें।

प्रत्येक मनुष्य जब पढ़ना सीखने की धृष्टता करने लगेगा तो उसको सहन करना एक ऐसी दुर्घटना होगी जिसके फलस्वरूप केवल लेखन-कला ही, बल्कि विचार-शक्ति भी अंततः विकृत और क्षीण हो जाएगी।

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वह जो गगनचुंबी पर्वतों पर चढ़ता है, उसे प्रत्येक शोकांत पर हँसी आती है; चाहे वह कोई शोकांत नाटक हो, और चाहे जीवन की कोई असाधारण घटना।

प्रेम में सदा एक प्रकार का पागलपन होता है, पर इस पागलपन में भी एक प्रखर विवेक है।

हम आदर्श को अपनी कमियों की आँखों से देखते हैं।

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लेखक अगर अपने पाठकों से परिचित हो जाता तो निश्चय ही वह लिखना बंद कर देता। पाठक अगर एक शताब्दी और ऐसे ही बने रहे तो फिर आत्मा स्वयं ही सड़ जाएगी और वहाँ से दुर्गंध फूट निकलेगी।

विश्व की समस्त लिखित सामग्री में से मुझे केवल उतना ही भाग प्रिय है, जितना लेखक ने अपने रक्त से लिखा है। रक्त से लिख, और तब तुझे ज्ञात हो जाएगा कि रक्त आत्मा है।

सुसंस्कृत स्वभाव इस बात को जानकर परेशान होता है कि कोई उसके प्रति आभार मानता है किंतु विकृत स्वभाव यह जानकर परेशान होता है कि वह स्वयं किसी के प्रति आभारी है।

पर्वतों की दो चोटियों के बीच की सीधी रेखा ही वहाँ का सबसे छोटा मार्ग होता है, लेकिन उस पर चलने के लिए अत्यंत लंबी टाँगें होनी चाहिए। कहावतें भी, गिरि-शृंगों के समान गगनचुंबी होती हैं। इनको पढ़ने वाले भी महान् और ऊँचे डील-डौलवाले होने चाहिए।

दूसरे के रक्त को समझ सकना कोई सरल काम नहीं है।

सबसे अधिक शक्तिशालियों के भी क्षण आते हैं जब वे थक जाते हैं।

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हर गुरु का एक ही शिष्य होता है और वह उसके प्रति निष्ठाहीन हो जाता है, क्योंकि उसकी नियति भी गुरुपन है।

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वह प्रेम का अभाव नहीं है जो शादीशुदा ज़िंदगी को अप्रसन्न बनाता है, बल्कि वह मित्रता का अभाव है।

मैं इसलिए उदास नहीं हूँ कि तुमने मुझसे झूठ बोला, मैं इसलिए उदास हूँ; क्योंकि अब आगे से मैं तुम्हारा भरोसा नहीं कर पाऊँगा।

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जो ढोंगी हर समय एक सा ही अभिनय किया करता है, अन्ततः ढोंगी नहीं रहता है।

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वह जो हमारी जान नहीं ले लेता, हमें और मज़बूत बनाता है।

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कभी-कभी लोग सच इसलिए नहीं सुनना चाहते हैं क्योंकि वे नहीं चाहते हैं कि उनका भ्रम चकनाचूर हो जाए।

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आत्महत्या का विचार एक ख़ूबसूरत सांत्वना है जिसके सहारे हम अनेक स्याह रातें गुज़ार लेते हैं।

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जो साँप अपना केंचुल छोड़ सके उसे मरना पड़ता है। ठीक उसी प्रकार वे मस्तिष्क जिन्हें उनकी राय बदलने से रोका जाता है; मस्तिष्क नहीं रह जाते।

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हमेशा की तरह आज भी लोगों को दो समूहों में वर्गीकृत किया जा सकता है—ग़ुलाम और आज़ाद। वह इंसान जिसके दिन का दो-तिहाई भाग उसका अपना नहीं है वह ग़ुलाम है, चाहे वह राजनेता हो, व्यवसायी हो, अधिकारी हो या कोई विद्वान हो।

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जो कोई भी दानव से लड़ता है उसे इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि लड़ाई की प्रक्रिया में कहीं स्वयं वह दानव बन जाए, क्योंकि जब आप किसी खाई को देर तक टकटकी लगाए देखते हैं तो वह खाई भी आपको घूरना आरंभ कर देती है।

शौर्य हास-उपहास का प्रेमी होता है।

हम जितना ऊँचा उड़ेंगे, उतना ही उन लोगों को छोटे नज़र आएँगे जो उड़ नहीं सकते।

तुम्हारा अंतःकरण क्या कहता है तुमसे?―”तुम्हें वह होना चाहिए जो तुम हो।”

इस दुनिया में ऐसी कोई ख़ूबसूरत सतह नहीं है जिसकी भयानक गहराई हो।

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तुम्हारा अपना रास्ता है, मेरा अपना और जहाँ तक सही और एकमात्र रास्ते का सवाल है तो ऐसे किसी रास्ते का अस्तित्व नहीं है।

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हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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