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Elias Canetti

1905 - 1994 | دوسرا

کی

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मनुष्य किसी भी चीज़ से उतना नहीं डरता जितना कि अज्ञात के स्पर्श से।

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हर निर्णय मुक्ति प्रदान करता है, तब भी जब वह विनाश की ओर ले जाए। अन्यथा, क्यों इतने सारे लोग आँखें खोलकर सीधा चलते हुए अपने दुर्भाग्य में दाख़िल होते?

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सफलता वह जगह है जो एक व्यक्ति अख़बार में घेरता है।

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वे तमाम चीज़ें जिन्हें हम भूल जाते हैं, सपनों में मदद के लिए चिल्लाती हैं।

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लोगों का भविष्य उनके नामों की वजह से आसान हो जाता है।

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सफलता एक दिन की निर्लज्जता है।

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सुंदरता में हमेशा कुछ सुदूर होता है।

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कुछ मत समझाओ। उसे वहाँ रखो। बोलो। जाओ।

इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि कोई विचार कितना नया है : फ़र्क़ इस बात से पड़ता है कि वह कितना नया बन पाता है।

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दूसरों के साथ सामंजस्य बिठाने का पहला असर यह होता है कि हम उबाऊ बन जाते हैं।

सीखना, अनदेखा करने की कला है।

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वे शासक जो युद्ध छेड़ना चाहते हैं, वे इस बात से भली-भाँति परिचित हैं कि उन्हें पहला पीड़ित जुटाना या गढ़ना होगा।

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इसमें कोई शक नहीं कि मनुष्य के अध्ययन की अभी शुरुआत भर हुई है, साथ ही उसका अंत नज़र आने लगा है।

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शराबियों के भ्रम हमें यह देखने का मौक़ा देते हैं कि भीड़ किसी व्यक्ति के दिमाग़ में कैसे दिखती है।

पुनः विस्मय का अनुभव करो।

अनंत काल में हर चीज़ बस शुरू हो रही होती है।

कुछ भी मत समझाओ। अपनी बात को रखो। कहो। और चले जाओ।

सीखना, कुछ बातों को नज़रअंदाज़ करने की कला है।

दूसरों की उपस्थिति का मृत हो जाना ही बुढ़ापा है और कुछ नहीं।

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सब कुछ इस पर निर्भर करता है कि हम ख़ुद को किससे जोड़कर देखते हैं।

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अपनी ज़िंदगी लिखते वक़्त हर पन्ने पर ऐसी बात होनी चाहिए जो नई हो।

दूसरों के अनुसार ख़ुद को ढ़ालने से सबसे पहले इंसान उबाऊ हो जाता है।

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ग़लत धारणाओं को छोड़ने में समय लगता है। अचानक से ऐसा होने पर वे मन में सड़ने लगती हैं।

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एक भीड़ तब तक रहती है जब तक उसके पास कोई अधूरा लक्ष्य होता है।

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महान विचारों को फिर से कहना ज़रूरी है, बिना यह जाने कि वे पहले से कहे जा चुके हैं।

मनुष्य को सबसे अधिक डर अनजान के स्पर्श से लगता है।

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मृत्यु एक घोटाले जैसी है। मशीन चलती रहती है और हम सब बंधक बन जाते हैं।

जो मृत्यु के प्रति जुनूनी है, उसे वह एक अपराधबोध में डाल देती है।

शब्द बूढ़े नहीं होते, केवल लोग बूढ़े हो जाते हैं, यदि वे बार-बार वही शब्द इस्तेमाल करते हैं।

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जिन बातों को हम भूल जाते हैं वे स्वप्न में हमसे मदद की भीख माँगती हैं।

लिखने की प्रक्रिया में एक अनंतता है। यह चाहे हर रात रुक जाए, यह एक सतत प्रक्रिया है।

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समझना, जैसा हम समझते हैं, वह ग़लतफ़हमी है।

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पाँच मिनट में पृथ्वी एक रेगिस्तान बन जाएगी, और तुम किताबों से चिपके रहते हो।

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सफलता केवल तालियों को सुनती है। बाक़ी सबके लिए वह बहरी है।

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दुनिया में दुःख इसलिए है क्योंकि हम भविष्य की ओर बहुत कम देखते हैं।

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जो कुछ भी हमारी स्मृति में अंकित होता जाता है उसमें आशा का एक कण छुपा होता है, चाहे वह निराशा से ही क्यूँ भरा हुआ हो।

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मैं अपने मृतकों की यादों से इतना भरा हूँ कि अब और किसी की मृत्यु के लिए मेरे पास कोई जगह नहीं बची।

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हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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