रस सिद्धांतवाले काइयाँ आचार्य के पास जब शोध छात्राएँ आती हैं, तब वह तुलसीदास के हवाले से जानता है कि प्रभु 'उमा-रमन' के बाद ही 'करुणायतन' होते हैं।
विश्वविद्यालयों में तो गुरु-कृपा से ही डिग्री मिलती है। सब जानते हैं, पढ़ने से कुछ नहीं होता। अगर आचार्य की कृपा हो जाए, तो प्रतिद्वंद्वी विद्यार्थी का अँगूठा काटकर वह प्रिय विद्यार्थी को दे देता है। राजा के लड़के और भील के लड़के में जो अंतर तब था, वही अब है।
कोई-कोई सनकी राजा ऐसे होते थे कि अपने नौकर को कोड़ों से ख़ूब पीटते थे, मगर उनकी चिकित्सा के लिए डॉक्टर तैयार रखते थे। अपनी सरकार भी सनकी ज़मींदार है। शिक्षक को ख़ूब कष्ट होने देगी, मगर कल्याण-निधि ज़रूर खोल देगी।
जिस समाज में धन के साथ पाप का समझौता ही प्रतिष्ठा का कारण है, वहाँ समाज का गुरु अवहेलना का पात्र हो, यह आश्चर्य की बात तो नहीं है—दु:ख की अवश्य है। और वह इस देश के दुर्भाग्य पर है, जो एक बार किसी समय अपने ज्ञान के आलोक से संसार को चकाचौंध करके, अब धीरे-धीरे अंधकार ही पसंद करता जा रहा है।
गुरु के उपदेश से तो मंदबुद्धि व्यक्ति भी शास्त्रों का अध्ययन कर सकते हैं, लेकिन काव्य तो किसी प्रतिभाशाली को कभी-कभी ही (सदा-सर्वदा नहीं) स्फुरित होता है।
शिक्षक सोचता है और छात्रों के बारे में सोचा जाता है।
शिक्षक अपनी मर्ज़ी का मालिक है, वह अपनी मर्ज़ी चलाता है और छात्रों को उसकी मर्ज़ी के मुताबिक चलना पड़ता है।
छात्र ज्यों-ज्यों स्वयं को विश्व में और विश्व के साथ रख कर देखने से उत्पन्न होने वाली समस्याओं का सामना करते हैं, त्यों-त्यों उन्हें उत्तरोत्तर अधिक चुनौती मिलती है और वे उसका सामना करना अपना कर्तव्य समझने लगते हैं।
शिक्षक अनुशासन लागू करता है और छात्र अनुशासित होते हैं।
शिक्षक बोलता है और छात्र सुनते हैं—चुपचाप।
शिक्षक की दीनता का बखान करने, उस पर दया दिखाने और उसे उपदेश देने के साथ, राष्ट्र-निर्माता वग़ैरह बनाने के लिए पाँच सितंबर 'शिक्षक दिवस' ही काफ़ी है।
शिक्षक सब कुछ जानता है और छात्र कुछ भी नहीं जानते।
उत्कृष्ट शिष्य को दी गई शिक्षक की कला अधिक गुणवती है जैसे मेघ का जल समुद्र की सीपी में पड़ने पर मोती बन जाता है।
शिक्षक कर्म करता है और छात्र उसके कर्म के जरिए सक्रिय होने के भ्रम में रहते हैं।
बैंकीय शिक्षा; छात्रों की सृजनात्मक शक्ति को न्यूनतम कर देती है या समाप्त कर देती है, और झट से विश्वास कर लेने की प्रवृत्ति को बढ़ाती है।
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स्कूल जाने से ही किसी को छात्र नहीं कहते, और मंत्र लेने से ही किसी को शिष्य नहीं कहते। हृदय को शिक्षक या गुरु के आदेश पालन के लिए सर्वदा उन्मुक्त रखना चाहिए।
शिक्षक में व्यक्तित्व न हो, तो किसी तरह की शिक्षा संभव नहीं हो सकती।
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कर्म ही सबसे बड़ा शिक्षक है।
शिक्षक अधिगम की प्रक्रिया का कर्ता होता है और छात्र महज अधिगम की वस्तुएँ।
शिक्षक अपने पेशेवर अधिकार को ज्ञान का अधिकार समझता है (स्वयं को अपने विषय का अधिकारी विद्वान समझता है), और उस अधिकार को छात्रों की स्वतंत्रता के विरुद्ध इस्तेमाल करता है।
शिक्षक पढ़ाता है और छात्र पढ़ाए जाते हैं।
धीरे चलना एक पुरानी बात लगने लगी है। शिक्षकों के लिए भी यह कठिन हो गया है कि वे धीरे-धीरे समझाएँ और ताबड़तोड़ रोज़ नया पाठ न पूरा करें। वे कहते हैं उन्हें हर हफ़्ते परीक्षा लेनी है, फिर धीरे कैसे चलें।
शिक्षक पाठ्यक्रम बनाता है और छात्रों को (जिनसे पाठ्यक्रम बनाते समय कोई सलाह नहीं ली जाती) वही पढ़ना पड़ता है।
अक़्सर ऐसा होता है कि शिक्षक और राजनेता बोलते हैं, तो उनकी बातें लोगों की समझ में नहीं आतीं। कारण यह है कि उनकी भाषा उन मनुष्यों की ठोस स्थिति से सुर नहीं मिला पाती, जिन्हें वे संबोधित करते हैं।
शिक्षक दिवस तो इसलिए चल रहा है ज़बरदस्ती कि डॉ. राधाकृष्णन राष्ट्रपति रहे। अगर वे सिर्फ़ महान् अध्यापक मात्र रहते, तो शिक्षक दिवस नहीं मनाया जाता।
गुरुजनों की कठोर अक्षरों वाली वाणियों से फटकारे जाने पर भी मनुष्य महत्त्व को प्राप्त करते हैं। बिना खरादी हुई मणियाँ भी राजाओं के मुकुट में कभी धारण नहीं की जाती।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere