ईर्ष्या पर उद्धरण
ईर्ष्या दूसरों की उन्नति,
सुख या वैभव से उभरने वाला मानसिक कष्ट है। इसका संबंध मानवीय मनोवृत्ति से है और काव्य में सहज रूप से इसकी प्रवृत्तियों और परिणामों की अभिव्यक्ति होती रही है।
प्रतिभाशाली लोगों की प्रशंसा की जाती है, धनवानों से ईर्ष्या की जाती है, शक्तिशाली लोगों से डर लगता है; लेकिन केवल चरित्र वाले लोगों पर ही भरोसा किया जाता है।
हम आप जैसे लोगों से ईर्ष्या करते हैं, और हम आप जैसा बनना चाहते हैं; हम ऐसा नहीं कर सकते, इसलिए हम तुम्हें नष्ट कर देते हैं।
हम सिर्फ़ उस व्यक्ति से ईर्ष्या कर सकते हैं जिसके पास ऐसा कुछ है जिसे हमारे विचार से हमारे पास होना चाहिए।
मनुष्य एक सीमा तक किसी के उत्कर्ष से ईर्ष्या करता है, उसके परे वह उसके लिए श्रद्धा की वस्तु बन जाता है। और मनुष्य जिसे महान मानता है, उसकी महानता में तनिक भी धक्का लगना वह सहन नहीं कर सकता।
तहसीलदार को डिप्टी कमिश्नर होते देखकर अगर कलेजे से ठँडी साँस निकल जाती है, तो तुरंत नौकरी कर लेना चाहिए—साहित्य रचना वश की बात नहीं है। जो बेलाग ज़िंदगी जी सकते हैं, उनसे ही कुछ नए की उम्मीद कर सकते हैं।
दूसरे की जगह हड़प लेना, हमारी सांस्कृतिक विशेषता है।
एक ख़ास क़िस्म के मरीज़ भी होते हैं, जिन्हें निज का कोई दु:ख नहीं होता, पर जो इसलिए दुखी हैं कि वे देखते हैं दूसरे सुखी हैं—इनका मर्ज़ ला-इलाज़ है।
मैंने प्यार को अपनी ईर्ष्या की हद से मापा।
ईर्ष्या, लोभ, क्रोध एवं कठोर वचन—इन चार सदा बचते रहना ही वस्तुतः धर्म है।
गन्ना चूसना हो तो अपने खेत को छोड़कर बग़ल के खेत से तोड़ता है और दूसरों से कहता है कि देखो, मेरे खेत में कितनी चोरी हो रही है। वह ग़लत नहीं कहता है क्योंकि जिस तरह उसके खेत की बग़ल में किसी दूसरे का खेत है, उसी तरह और के खेत की बग़ल में उसका खेत है और दूसरे की संपत्ति के लिए सभी के मन में सहज प्रेम की भावना है।
मनुष्य को चाहिए कि वह ईर्ष्यारहित, स्त्रियों का रक्षक, संपत्ति का न्यायपूर्वक विभाग करने वाला, प्रियवादी, स्वच्छ तथा स्त्रियों के निकट मीठे वचन बोलने वाला हो, परंतु उनके वश में कभी न हो।
प्रायः समान विद्या वाले लोग एक-दूसरे के यश से ईर्ष्या करते हैं।
कला ईर्ष्यालु प्रेयसी है।
आज्ञा का उल्लंघन सद्गुण केवल तभी हो सकता है जब वह किसी अधिक ऊँचे उद्देश्य के लिए किया जाए और उसमें कटुता, द्वेष या क्रोध न हो।
जिस प्रकार सागर रत्नों की ख़ान है, उसी प्रकार जो शास्त्रों की ख़ान है, उसके गुणों से भी हम संतुष्ट नहीं होते जब हम उससे ईर्ष्या करते हैं।
खिलाड़ी को केवल खिलाड़ी से ईर्ष्या होती है, कवि को केवल कवि से ईर्ष्या होती है।
ईर्ष्या व्यक्तिगत होती है और स्पर्द्धा वस्तुगत।
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एक पौराणिक कथा में, देवी लक्ष्मी ने देवताओं को तब छोड़ दिया जब उन्हें लगा कि उन्होंने लालच और अहंकार से धन पर क़ब्ज़ा कर लिया है। संदेश स्पष्ट है:- चीज़ों को लालच और ईर्ष्या के साथ देखना, अमीर बनने का तरीक़ा नहीं है।
ईर्ष्या एक मानवीय गुण है लेकिन जब यह घृणा में बदल जाती है तब बात अलग है। ऐसे भी लोग हैं जो मुझे साहित्यिक सरदर्द मानते हैं लेकिन मैं उन्हें बच्चों के रूप में देखता हूँ जिन्हें निश्चय ही अपने आध्यात्मिक पिता के ख़िलाफ़ विद्रोह करना चाहिए। उन्हें मेरी हत्या करने का अधिकार है लेकिन उन्हें मेरी हत्या एक ऊँचे स्तर पर करनी चाहिए एक पाठ में।
स्पर्द्धा संसार में गुणी, प्रतिष्ठित और सुखी लोगों की संख्या में कुछ बढ़ती करना चाहती है और ईर्ष्या कमी।
जहाँ भय है वहाँ ईर्ष्या, चिंता, घृणा और हिंसा है।
ग़रीबों में अगर ईर्ष्या और वैर है तो स्वार्थ के लिए या पेट के लिए। ऐसी ईर्ष्या और वंर को मैं क्षम्य समझता हूँ। हमारे मुँह की रोटी कोई छीन ले तो उसके गले में उँगली डालकर निकालना हमारा धर्म हो जाता है। अगर हम छोड़ दें, तो देवता हैं। बड़े आदमियों की ईर्ष्या और वैर केवल आनंद के लिए हैं।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere