संसार के उत्कृष्ट मस्तिष्क वाले संकल्पवान् प्राणी में और एक साधारण मनुष्य में भी जो भेद है, वह मन की शक्तियों के भेद के कारण है।
मानसिक तस्वीर देखना, अपने मस्तिष्क में तस्वीरें बनाने की प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया में आप अपनी मनचाही चीज़ों का आनंद लेते हैं। जब आप कल्पना करते हैं, तो आप उस चीज़ के अपने पास होने के सशक्त विचार और भावनाएँ उत्पन्न करते हैं। फिर आकर्षण का नियम उसी चीज़ को सच करके आपके जीवन में भेज देता है, जिस रूप में आपने उसे अपने मस्तिष्क में देखा था।
विचारों की असीमित आपूर्ति आपके लिए उपलब्ध है। समूचा ज्ञान, आविष्कार और खोजें, ब्रह्मांडीय मस्तिष्क में संभावनाओं के रूप में मौजूद हैं और मानवीय मस्तिष्क द्वारा उन्हें बाहर निकालने का इंतज़ार कर रहीं हैं। हर चीज़ आपकी चेतना में है।
मानसिक श्रेष्ठता, आम मामलों में या किन्हीं ख़ास मामलों में और चरित्र की दृढ़ता—हमेशा अपना डंका बजवाकर रहेंगी।
सैद्धांतिक रूप से यह संभव है कि हम जैसे-जैसे उम्र को मात देना सीख लें, वैसे-वैसे हम अपनी घटती मानसिक क्षमताओं के बारे में भी कुछ कर सकें, लेकिन अभी तक मस्तिष्क को जीतना सबसे मुश्किल काम साबित हुआ है।
अपने दिल का कहा मानो, लेकिन अपने दिमाग़ को साथ लेकर चलो।
आपका मस्तिष्क आपके आस-पास की दुनिया को आकार दे रहा है।
किसी भी सक्रिय और ऊर्जावान मस्तिष्क को अगर स्वतंत्रता से वंचित रखा जाएगा, तो वह ग़लत दिशा में विकास करेगा। वह किसी भी तरह सत्ता प्राप्त करने का प्रयास करेगा।
व्यक्तिगत संपत्ति की शुरुआत उस समय से शुरू हुई जब किसी ने अपना ख़ुद का दिमाग़ रखना शुरू किया।
हिंदू मस्तिष्क का झुकाव; सदा निगमनीय अथवा साधारण सत्य के सहारे विशेष सत्य तक पहुँचने की ओर रहा है, न कि आगमनिक अथवा विशेष सत्य के सहारे साधारण सत्य की ओर।
हमारा मस्तिष्क स्मृति का उपकरण है, उन घटनाओं की स्मृति, जो घटित हो चुकी हैं—हमारा अनुभव इत्यादि यानी स्मृति की पूरी पृष्ठभूमि।
जिसका विश्वास जितना कम है; वह उतना undeveloped (अविकसित) है, बुद्धि उतनी कम तीक्ष्ण हैं।
सत्य का मार्ग खोजने के लिए हमें दिमाग़ की नहीं, बल्कि दिल की ज़रूरत होती है। सच्चा मार्ग खोजने के लिए हमें अपने दिमाग़ की नहीं, बल्कि दिल की राह पर चलना चाहिए।
यथार्थ इंद्रिय चक्षु के पीछे है—वह मस्तिष्क में अवस्थित नाड़ी केंद्र है।
योगी दावा करते हैं कि मनुष्यदेह में जितनी शक्तियाँ हैं, उनमें ओज सब से उत्कृष्ट कोटि की शक्ति है। यह ओज मस्तिष्क में संचित रहता है। जिसके मस्तिष्क में ओज जितने अधिक परिमाण में रहता है, वह उतना ही अधिक बुद्धिमान् और आध्यात्मिक बल से बली होता है।
जिस मस्तिष्क को उसके ख़ुद के नियंत्रण से वंचित रखा जाएगा, वह दूसरों का नियंत्रण प्राप्त करने का प्रयास करके अपनी इच्छाओं को संतुष्ट करेगा।
मस्तिष्क द्वारा किया गया कोई भी अर्थपूर्ण उत्पादन, अपनी एक मौलिकता रखता ही है।
मनुष्य का ज्ञान कितना कालसापेक्ष और स्थितिसापेक्ष है—यह चिंतन के इतिहास से जाना जा सकता है।
मन—जिसमें मस्तिष्क और हृदय समाविष्ट हैं—को पूर्ण संगति में होना चाहिए।
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सीमित लोगों से परिचय हो, ज़िंदगी में ख़ुद के लिए वक़्त हो, बिना मतलब दूसरों की दख़लअंदाज़ी न हो, दिमाग़ शांत रहे तो दिल ख़ुश रहता है।
ब्रह्मचर्य के बिना राजयोग की साधना बड़े ख़तरे की है, क्योंकि उससे अंत में मस्तिष्क में विषम विकार पैदा हो सकता है।
मस्तिष्क के हज़ारों नेत्र होते हैं, और हृदय का एक, परंतु प्रेम के समाप्त होते ही संपूर्ण जीवन का प्रकाश समाप्त हो जाता है।
मस्तिष्क में आया हुआ विचार मनुष्य के चरित्र का आरंभ है।
जीवन कंटकमय है एवं योवन निरर्थक। और प्रेमी का रुष्ट हो जाना मस्तिष्क में पागलपन का सा काम करता है।
भाषा मानव मस्तिष्क की वह शस्त्रशाला है जिसमें अतीत की सफलताओं के जयस्मारक और भावी सफलताओं के लिए अस्त्र-शस्त्र, एक सिक्के के दो पहलुओं की तरह साथ-साथ रहते हैं।
दिमाग़ तो वास्तव में बीमार हो नहीं सकता, संज्ञानात्मक आयाम ही सही या ग़लत; वैध या अवैध हो सकता है, लेकिन बीमार नहीं हो सकता। जो चीज़ बीमार हो सकती है, रोगी हो सकती है—वह मानसिकता है।
बुद्धि से किया गया कोई भी काम आसानी से नहीं टूटता, जबकि प्यार आसानी से टूट कर बिखर जाता है।
मस्तिष्क—वह यंत्र जिससे हम सोचते हैं कि हम सोचते हैं।
तुम्हारे ज्ञान की क़ीमत तुम्हारे कामों से होगी। सैंकड़ों किताबें दिमाग़ में भर लेने से कुछ लाभ मिल सकता है किंतु उसकी तुलना में काम की क़ीमत कई गुना ज़्यादा है। दिमाग़ में भरे हुए ज्ञान की क़ीमत उसके अनुसार किए गए काम के बराबर ही है। बाक़ी का सब ज्ञान दिमाग़ के लिए व्यर्थ का बोझ है।
बहुत उदरस्थ करने के बजाए, थोड़ा कंठस्थ करना ज़्यादा अच्छा है।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere