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Yashpal

1903 - 1976 | فیروز پور, پنجاب

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नारी प्रकृति के विधान से नहीं, समाज के विधान से भोग्य है। प्रकृति में और समाज में स्त्री और पुरुष अन्योन्याश्रय हैं।

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नारी के जीवन की सार्थकता के लिए पुरुष का आश्रय आवश्यक है और नारी पुरुष का आश्रय भी है।

इतिहास विश्वास की नहीं, विश्लेषण की वस्तु है। इतिहास मनुष्य का अपनी परंपरा में आत्म-विश्लेषण है।

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इतिहास घटनाओं के रूप में अपनी पुनरावृत्ति नहीं करता। परिवर्तन का सत्य ही इतिहास का तत्त्व है परंतु परिवर्तन की इस श्रृंखला में अपने अस्तित्व की रक्षा और विकास के लिए व्यक्ति और समाज का प्रयत्न निरंतर विद्यमान रहा है। वही सब परिवर्तनों की मूल प्रेरक शक्ति है।

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क्या उपयोग है इस धन का? जो खा लिया, जो पी लिया वही मेरा है।

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गति का अर्थ है—एक समय और एक स्थान से दूसरे समय और स्थान में प्रवेश करना, अर्थात् परिवर्तन। यह परिवर्तन ही गति है, गति ही जीवन है! अमरता का अर्थ है—अपरिवर्तन, गतिहीनता।

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कला केवल उपकरण मात्र है, कला जीवन के लिए और उसकी पूर्ति में ही है।

देश का भविष्य नेताओं और मंत्रियों की मुट्ठी में नहीं है, देश की जनता के ही हाथ में है।

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निराशा में शैथिल्य से पशुत्व मत स्वीकार करो।

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मरना तो है ही, अपने मनुष्यत्व और अधिकार के लिए मरो।

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सच को कल्पना से रंगकर उसी जन-समुदाय को सौंप रहा हूँ जो सदा झूठ में ठगा जाकर भी सच के लिए अपनी निष्ठा और उसकी ओर बढ़ने का साहस नहीं छोड़ता।

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आवेग एक वस्तु है, जीवन दूसरी। जीवन जल का पात्र है, आवेग उसमें एक बुदबुदा मात्र। जीवन की सफलता के लिए किसी समय आवेग का दमन आवश्यक हो जाता है, जैसे रोग में पथ्य अरुचिकर होने पर भी उपयोगिता के विचार से ग्रहण किया जाता है।

जन्म का अपराध? यदि वह अपराध है तो उसका मार्जन किस प्रकार सम्भव है? शस्त्र की शक्ति, धन की शक्ति, विद्या की शक्ति, कोई शक्ति जन्म को परिवर्तित नहीं कर सकती। कोई भी उपाय जन्म के अपराध का मार्जन नहीं कर सकता। जन्म के अन्याय का प्रतिकार क्या मनुष्य दैव से ले?

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जो तुम से भय करता है, उससे तुम भी भय करते हो। शक्तिमान का भय सुषुप्त है, शक्तिहीन का जागरित। भय के कारण होने से भय अवश्य होगा। निर्भय वही है जो भय के कारणों से मुक्त है। तुम्हारी शक्ति से यदि दूसरा भयभीत हो तो उसका भयभीत रहना तुम्हारे भय का गुप्त बीज है।

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पराजित होने वाले कभी पूज्य नहीं होते।

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जीवन में एक समय प्रयत्न की असफलता मनुष्य का संपर्ण जीवन नहीं है। जीवन का हम अंत नहीं देख पाते, वह निस्सीम है। वैसे ही मनुष्य का प्रयत्न और चेष्टा भी सीमित क्यों हो? असामर्थ्य स्वीकार करने का अर्थ है, जीवन में प्रयत्नहीन हो जाना, जीवन से उपराम हो जाना।

अपने अतीत का मनन और मंथन हम भविष्य के लिए संकेत पाने के प्रयोजन से करते हैं। वर्तमान में अपने आपको असमर्थ पाकर भी हम अपने अतीत में अपनी क्षमता का परिचय पाते हैं।

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अवसर के देवता का मुख सन्मुख लटके केशों में छिपा रहता है। उसे पहचानना कठिन होता है परंतु उसे वश में किया जा सकता है तो केवल अग्र केशों को पकड़ कर। अवसर के सिर का पिछला भाग केशहीन है। सामने से निकल जाने पर उसे सभी पहचान लेते हैं परंतु गंजे सिर पर हाथ मारने से कुछ हाथ नहीं आता।

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हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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