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जैनेंद्र कुमार

1905 - 1988

प्रेमचंदोत्तर युग के समादृत कथाकार, उपन्यासकार और निबंधकार। गद्य में मनोविश्लेषणात्मक परंपरा के प्रवर्तक।

प्रेमचंदोत्तर युग के समादृत कथाकार, उपन्यासकार और निबंधकार। गद्य में मनोविश्लेषणात्मक परंपरा के प्रवर्तक।

जैनेंद्र कुमार के उद्धरण

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धर्म स्त्री पर टिका है, सभ्यता स्त्री पर निर्भर है और फ़ैशन की जड़ भी वही है। बात क्यों बढ़ाओ, एक शब्द में कहो—दुनिया स्त्री पर टिकी है।

स्त्री ही व्यक्ति को बनाती है, घर को—कुटुंब को बनाती है, जाति और देश को भी।

ईसा और बुद्ध के काम के तल को मैं कहीं गहरा मानता हूँ। इतिहास पर इसलिए उसका परिणाम भी गंभीर है। मार्क्स और लेनिन के काम और विचार का स्तर सामाजिक था और उसका तल उपयोगिता का है। मानव-जीवन के परिपूर्ण संस्कार का प्रश्न उसमें नहीं समा जाता है। समाज क्रांति के अभी ही नए-नए सूत्र निकलने लगे हैं और उनकी अपेक्षा में मार्क्सवाद पुराना पड़ता लगता है।

मूल्य आज संपदा और सत्ता के संग्रह का बना हुआ है। धर्म अब वह है जो बताता है कि मूल्य संग्रह नहीं बल्कि अपरिग्रह है। संग्रह में आदमी हर किसी के पास से चीज़ों को अपनी ओर बटोरता है, लेकिन इसमें वह हर किसी के स्नेह को गँवाता भी जाता है। स्नेह को खोकर चीज़ को पा लेना, पाना नहीं गँवाना है। यह दृष्टि धर्म ही देता है और वह भोग की जगह त्याग की प्रतिष्ठा करता है। इसीलिए वह राजनीति और कर्म नीति परिणाम नहीं ला पाएगी जो धर्म नीति से हीन है।

वैज्ञानिक एकांत में विज्ञान की साधना करता है, प्रचार के लिए कुछ नहीं करता। लेकिन लगता है कि जैसे बाक़ी सारी दुनिया उसकी खोज के आविष्कार को पाने को आतुर है। विज्ञान का अन्वेषित सत्य सहज ही जगत का सत्य बन जाता है। धर्म के सत्य पर प्रवचन होते हैं, शास्त्रार्थ होते हैं, फिर भी लगता है कि वह शास्त्र में रह जाता है, मनों में नहीं लिया जाता, क्यों?

परिवार मर्यादाओं से बनता है। परस्पर कर्त्तव्य होते हैं, अनुशासन होता है और उस नियत परंपरा में कुछ जनों की इकाई एक हित के आसपास जुटकर व्यूह में चलती है। उस इकाई के प्रति हर सदस्य अपना आत्मदान करता है, इज़्ज़त ख़ानदान की होती है। हर एक उससे लाभ लेता है और अपना त्याग देता है।

तुम लोग इज़्ज़तों में और पर्दों में रहकर जाने किन-किन व्यर्थताओं को अपने साथ लपेट लेते हो और उनमें गौरव मानते हो। यह सब तुम लोगों की झूठी सभ्यता है, ढकोसला है। फिर कहते हो, हम सच को पाना चाहते हैं। तुम्हारा सच कपड़ों में है, लिबास में है और सच्चाई से डरने में है।

कर्म की प्रवृत्ति के लिए धर्म की स्थिरता ज़रूरी है।

क्षण मरता जाता है कि समय जिए। व्यक्ति को मरते रहना चाहिए कि विराट जी सके।

यह दुनिया एक है। अनेकों ऐसी-ऐसी असंख्य दुनियाओं में से एक है। मैं उस पर का एक नगण्य बिंदु हूँ। फिर अहंकार कैसा!

जीवन दायित्व का खेल है, पग-पग पर समझौता है।

जीवन कुरुक्षेत्र है, वही इसलिए युद्धक्षेत्र और धर्मक्षेत्र भी है। यही जीवन की विचित्रता और जटिलता है कि युद्ध को और धर्म को उसमें साथ-साथ साधना पड़ता है। इस साधन में जीवन का रूप आप ही आप धर्मयुद्ध का हो जाता है।

जो मन नहीं मार सकता, जिसे झुकना और छोटा बनना नहीं आता, जिसे दूसरों की सुविधा और दूसरों को निभाने की दृष्टि से झुकना और राह छोड़ना नहीं आता—वह ज़िंदगी में कभी कुछ नहीं कमा पाता—ज़िंदगी का संतोष भी नहीं।

आपसी व्यवहार में जैसे मौन भी बोलता है, वैसे ही भाषा में शब्द का अभाव भी बोलता है। दो या तीन नुक़्ते डालकर जाने हम कितना नहीं कह जाते।

भाग्य के हाथ में सब कुछ है, लेकिन रुकना कभी श्रेयस्कर हुआ है? साँस रुकती है, उसे मौत कहते हैं, गति रुकती है, तब भी मौत कहते हैं, हवा रुकती है वह भी मौत है, रुकना सदा मौत है। जीवन नाम चलने का है।

मैं अकेला रहूँगा, क्योंकि मैं बँधना चाहता हूँ। बाँधना चाहता हूँ। स्नेह का बंधन ही मेरे लिए हो, क्योंकि वह बाँधकर भी खोलता है।

स्वच्छ और वास्तविक प्रेम इस प्रकार की आधिपत्य आकांक्षा से कुछ संबंध नहीं रखता है। वह 'उस' की प्रसन्नता, उसका सुख, उसके संतोष की ओर सचेष्ट रहता है, उस पर क़ब्ज़ा कर लेना नहीं चाहता।

असीम आवश्यकता नहीं, तृष्णा होती है।

उपाय अंततः वही अधिक सार्थक होगा जिसमें सरकारी प्रशासन से आत्मानुशासन के मूल्य पर अधिक बल हो।

दार्शनिक जिन्हें सिद्धांत कहता है, राजनेता उनमें वहम देखता है। और राजनेता जिसे पद और प्रभुता मानता है, दार्शनिक उसे माया का खेल और फ़रेब मानता है।

जान पड़ता है कि आदमी का रास्ता सीधा और सुगम नहीं है। वह कर्दम-कंटक का है और ठोकर और घाव खा खाकर ही आदमी सीखता और बढ़ता है।

ज़्यादा बोलने से दूरी बढ़ने लग जाती है। घनिष्ठता में शब्द कम होते जाते हैं।

प्रेरणा की हर अभिव्यक्ति में पुरुषार्थ और पराक्रम की आवश्यकता है।

वैषम्य को दूर करना है, वैविध्य को नहीं।

जवानों को सबसे अधिक आकर्षण हमेशा आदर्श का ही होता है। समय पर उनमें से उसके लिए विसर्जन लिया जा सके तो जवान लोग अपने बड़ों को देखकर, फिर अपनी महत्त्वाकांक्षा में बह चलते हैं।।

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युवकों का उत्साह केवल ताप बनकर यदि रह जाए यदि उसमें तप भी मिल जाए, तो वह बहुत निर्माणकारी हो सकता है।

वासना भोगप्रधान है, प्रेम में योग है।

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