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Havelock Ellis

1859 - 1939 | دوسرا

کی

باعتبار

साधारण सही दिमाग़ वाले व्यक्तियों में भी वैयक्तिक महक; यौन-आकर्षण तथा विकर्षण का बहुत बड़ा भाग अदा करती है, इसी को कभी-कभी गंध-प्रधानतावाद कहा जाता है।

सभ्यता के हर बड़े केंद्र में सौंदर्य का राष्ट्रीय आदर्श, अद्भुत दिशाओं में पल्लवित होता रहता है और वैदेशिक आदर्शों तथा फ़ैशनों को, देशी आदर्शों तथा फ़ैशनों के मुक़ाबले में तरजीह दी जाती है।

यौन आवेग से प्रभावित होकर सौंदर्य-संबंधी मान्यताएँ बदल जाती हैं। प्रेमी की दृष्टि से बहुत-सी बातें सुंदर होती हैं, जो अप्रेमी की दृष्टि से सुंदर नहीं हैं और प्रेमी जिस हद तक अपने आवेग से विचलित होगा, उसी हद तक उसकी सौंदर्य-संबंधी मान्यताएँ बदल जाएँगी।

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पुरुष; सौंदर्य के अधिकतर विशुद्ध दृष्टिगत गुण के द्वारा ही यौन दृष्टि से प्रभावित होते हैं, पर स्त्रियाँ ऐसी दृष्टिगत छापों से ही अधिकतर प्रभावित होती हैं, जो मौलिक रूप से अधिकतर यौन अनुभूति यानी स्पर्शनुभूति के गुणों को अभिव्यक्त करती हैं।

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सौंदर्य एक ऐश्वर्यशाली शब्द है। वह मन पर पड़ी हुई ऐसी जटिल छापों का मानो समन्वय है, जो एक ही ज्ञानेंद्रिय के ज़रिए से प्राप्त हुई है।

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मैथुन में पुरुष को अधिक कर्मशक्तिवाला हिस्सा और स्त्री को सूक्ष्म कर्म शक्तिवाला भाग अदा करना पड़ता है। इसलिए स्त्री में कर्मशक्ति का होना; प्रेम के सफल होने का कोई सूचक नहीं है, पर पुरुष में कर्मशक्ति उस शक्ति के प्राथमिक गुण के अस्तित्व का सूचक है, जिसकी कि स्त्री यौन-आलिंगन में अपेक्षा करती है।

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रसिक व्यक्ति को आकस्मिक रूप से, या अन्यथा देर-सवेर में यह मालूम हो ही जाता है कि सबसे अतरंग संबंध में अधिकांश लोगों के लिए महक या गंध, बहुत भारी महत्व रखती है।

जानवरों के साथ व्यभिचार; बुद्धिहीन, अल्प-अनुभूतिशील और गंवार किसानों में पाई जाने वाली यौन गड़बड़ी है।

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मनुष्य को प्रकृति में जो भी चीज़ें बहुत सुंदर मालूम होती हैं, वे यौन प्रक्रिया तथा यौन सहजात से संबद्ध हैं या उन पर निर्भर हैं।

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जो भी हो, यह हमेशा सही माना जा सकता है कि साधारणतः बच्चों के बारे में; ज़िम्मेवारी अपरिहार्य रूप से प्रथम स्थान में माता-पिता की, विशेषतः माता की होनी चाहिए।

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मातृत्व को अब केवल जैविक कार्य के रूप में नहीं माना जा सकता, बल्कि वह अब एक शिल्प बन गया है; जिसके लिए प्रबुद्ध और प्रशिक्षित बुद्धि की ज़रूरत है और ऐसी स्त्रियों को माता नहीं बनना चाहिए; जो दिमाग़ और साथ ही शरीर के स्वाभाविक झुकाव के कारण मातृत्व के उपयुक्त हों।

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जिस शिक्षा का कोई भी मूल्य है, वह समान लोगों में ज़िंदगी बिताकर ही प्राप्त की जा सकती है।

स्पर्श प्रेमक्रीड़ा का बहुत प्राथमिक और आदिम स्वरूप है।

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चर्म की नींव पर ही सब प्रकार की इंद्रियानुभूतियाँ विकसित हुई हैं, और चूँकि यौन इंद्रियानुभूति सब तरह की इंद्रियानुभूतियों में प्राचीनतम है; इसलिए यह मुख्यतः तथा अनिवार्य रूप से, साधारण स्पर्शनुभूति का ही एक सुधरा हुआ स्वरूप है।

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स्पर्श ही वास्तविक रूप से प्राथमिक तथा आदिम कामानुभूति है।

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जहाँ तक अभी मालूम हो सका है, आदर्श अवस्था विरले ही किसी सही दिमाग़ और उचित रूप से स्वाभाविक जीवन-यापन करने वाली जाति में पाई जाती है, चाहे हम इसके लिए आज के असभ्य लोगों को देखें या उन प्राचीन सभ्य जातियों को देखें, जिनमें हमारी अपनी जड़ें स्थित हैं।

सामाजिक जीवन में निर्बाध उच्छृंखलता के लिए कोई जगह नहीं है।

यौन-मिलन स्वयं एक बड़ी हद तक विशेष ढंग की चार्मिक प्रतिक्रिया है।

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यह अपेक्षाकृत अच्छा होगा कि बड़े सयाने लोग अनुशासन और नियंत्रण लादनेवाले व्यक्ति बनें, बल्कि जब कठिनाइयाँ आएँ तो पथ-प्रदर्शक और बीच-बचाव करने वाले बनें।

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सदाचार शाश्वत नहीं, बल्कि निरंतर परिवर्तनशील है।

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बाल्यावस्था की तथाकथित विच्युतियाँ; किसी किसी रूप में और किसी किसी मात्रा में बाद के जीवन में भी बनी रहती हैं, क्योंकि जैसा कि जेलिफ़ कहते हैं, 'बहुत थोड़े-से ही लोग वस्तुतः बड़े हो पाते हैं।'

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किसी को भी यह अधिकार नहीं है, और किसी को सलाह ही दी जा सकती है कि वह अपना भला किसी ऐसी कार्य-प्रणाली से करे, जिससे दूसरों का नुक़सान हो।

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हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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