ग़ुलामी पर उद्धरण
ग़ुलामी मनुष्य की स्वायत्तता
और स्वाधीनता का संक्रमण करती उसके नैसर्गिक विकास का मार्ग अवरुद्ध करती है। प्रत्येक भाषा-समाज ने दासता, बंदगी, पराधीनता, महकूमी की इस स्थिति की मुख़ालफ़त की है जहाँ कविता ने प्रतिनिधि संवाद का दायित्व निभाया है।
हमारे समाज में नारी की ग़ुलामी के कारण ऐसी भावना व्याप्त हो गई है कि पुरुष केवल 'नर' है और स्त्री केवल 'मादा', जो एक-दूसरे के पास केवल प्रजनन के प्रयोजन से आते हैं। वे और किसी कारण से, किसी और स्तर पर मिल ही नहीं सकते—यह पशु-स्तर की स्थिति है।
घुमक्कड़ी-धर्म छुड़ाने के लिए ही पुरुष ने बहुत से बंधन नारी के रास्ते में लगाए हैं। बुद्ध ने सिर्फ़ पुरुषों के लिए घुमक्कड़ी करने का आदेश नहीं दिया, बल्कि स्त्रियों के लिए भी उनका वही उपदेश था।
ठंडे जल के पात्र के पास रखा हुआ उष्ण जल का पात्र; जैसे अनजानें में ही उसकी शीतलता ले लेता है, उसी प्रकार चुपचाप शिक्षित महिला-समाज ने, पुरुष-समाज की दुर्बलताएँ आत्मसात् कर ली हैं और अब वे उनकी दुरवस्था में ही चरम सफलता की प्रतिच्छाया देखने लगी हैं।
संसार की प्रगति से अनभिज्ञ, अनुभव-शून्य, पिंजरबद्ध पक्षी के समान अधिकार-विहीन, रुग्ण, अज्ञान नारी से फिर शक्ति-संपन्न सृष्टि की आशा की जाती है, जो मृगतृष्णा से तृप्ति के प्रयास के समान ही निष्फल सिद्ध होगी।
स्त्री के लिए एक दुर्वह बंधन घर में है और उससे असह्य दूसरा बाहर—यह न मानना असत्य ही नहीं, अपने प्रति तथा समाज के प्रति अन्याय भी होगा।
उन तमाम हानिकर प्रभुत्वों को हटा देना चाहिए, जो लोगों की न्यायोचित आकाँक्षाओं का दमन करते हैं और उनको बंधनों में जकड़ कर रखने में मदद देते हैं।
मानवीय समाज के शायद अन्य किसी भी समूह के हिस्से में इतनी लंबी ग़ुलामी नहीं आई है, जितनी यह औरत के हिस्से में आई है।
स्वत्वहीन धनिक महिलाओं को यदि सजे हुए खिलौने का सौभाग्य प्राप्त है, तो साधारण श्रेणी की स्त्रियों को क्रीतदासी का दुर्भाग्य।
जब ग़ुलाम इतना सयाना और समझदार हो जाए कि बग़ावत पर आमादा हो जाए तो मालिक को नए सिरे से कल्पनाशील बनना पड़ता है।
किसी भी सक्रिय और ऊर्जावान मस्तिष्क को अगर स्वतंत्रता से वंचित रखा जाएगा, तो वह ग़लत दिशा में विकास करेगा। वह किसी भी तरह सत्ता प्राप्त करने का प्रयास करेगा।
जो मनुष्य सदा बाह्य आचार से ही चालित होता है, उसकी पंगुता वैसी ही होती है जैसी कि प्रत्येक विषय में दास पर निर्भर रहने वाले मालिक की।
अशिक्षा, अज्ञान या पराधीनता; भले ही किसी देश को बेबल बनाए रही हो, पर मनुष्यता की संतान ने अपने स्वत्वों और अधिकारों से वंचित होना कभी मंज़ूर नहीं किया।
जो बंधन पुरुषों की स्वेच्छाचारिता के लिए इतने शिथिल होते हैं कि उन्हें बंधन का अनुभव ही नहीं होता, वे ही बंधन स्त्रियों को परावलंबिनी दासता में इस प्रकार कस देते हैं कि उनकी सारी जीवन-शक्ति शुष्क और जीवन नीरस हो जाता है।
घर-गृहस्थी के प्रति धार्मिक कट्टरता जैसा जुड़ाव, दरअसल बाहरी दुनिया के प्रति शत्रुता का ही दूसरा नाम है—और अनजाने में ही इससे बाहरी दुनिया के नुक़सान के साथ-साथ, घर-गृहस्थी का और उन उद्देश्यों का—जिनके लिए हम जी रहे होते हैं—नुक़सान होने लगता है।
नीग्रो अपनी हीनता से ग़ुलाम है, श्वेत व्यक्ति अपनी श्रेष्ठता से ग़ुलाम है… दोनों ही एक विक्षिप्त उन्मुखीकरण के अनुसार व्यवहार करते हैं।
आचार-संचालित मनुष्य कठपुतली की तरह है।
इतिहास में कभी भी किसी गिलहरी ने; अपने साथी जीवों की समूची प्रजाति को गिनने, बंदी बनाने और नेस्तनाबूद करने की प्रेरणा महसूस नहीं की। ये अपराध अद्वितीय रूप से मनुष्य द्वारा किए जाते हैं।
अपनी असीम विद्या-बुद्धि का भार लिए हुए एक स्त्री, किसी के गृह का अलंकार मात्र बनकर संतुष्ट हो सकेगी—ऐसी आशा दुराशा के अतिरिक्त और क्या हो सकती है।
अपने मूल रूप को जितना अधिक ढाँकने में मनुष्य सफल हुआ है, वह उतना ही सभ्य कहलाया है।
मनुष्य में परावलंबी बनने की जो प्रवृत्ति, शिक्षित माता जागृत करना चाहती हैं—मैं समझता हूँ, उसकी शिक्षा बेकार है।
दीर्घकाल का दासत्व; जैसे जीवन की स्फ़ूर्तिमती स्वच्छंदता नष्ट करके उस बोझिल बना देता है, निरंतर आर्थिक परवशता भी जीवन में उसी प्रकार प्रेरणा-शुन्यता उत्पन्न कर देती है।
वस्तु बना दिया गया मनुष्य, केवल वस्तुओं के संदर्भ में ही जीता-मरता है। ग़ुलाम बनाए गए मनुष्य को केवल मालिक-ग़ुलाम की वर्णमाला में अपने आखर लिखने आते हैं।
अराजकता का इलाज स्वतंत्रता है न कि दासता, वैसे ही जैसे अंधविश्वास का सच्चा इलाज नास्तिकता नहीं, धर्म है।
जिस युग में सूरदास ने अपनी रचना की उसमें नारी पराधीन थी, लेकिन लीलावर्णन के माध्यम से सूर ने उस स्थिति का स्वप्न देखा, जिसमें नारी बंधनों को तोड़कर कुंठारहित तौर पर अपने प्रिय के साथ विचर सकती है।
प्रेम में मोक्ष और बंधन परस्पर विरोधी हैं, क्योंकि प्रेम मोक्ष की भी चरम स्थिति है और बंधन की भी।
क्या मैं अपने ही देश में ग़ुलामी करने के लिए ज़िंदा रहूँ? नहीं, ऐसी ज़िंदगी से मर जाना अच्छा। इससे अच्छी मौत मुमकिन नहीं।
प्रभु वर्ग जनता पर शासन करने के लिए, जनता को सच्चा आचरण नहीं करने देता। यह उसकी विवशता होती है कि वह जनता को अपना शब्द न बोलने दे, उसे अपना चिंतन न करने दे।
ग़ुलाम का न दीन है न धर्म है, ग़ुलाम के न रहीम है, न राम हैं।
जो व्यक्ति स्वयं अपने सम्मान का ख़्याल नहीं करता वह दास ही बन जाता है।
स्वार्थपरता स्वाधीनता नहीं, वरन् स्वाधीनता का अंतराय (बाधक) है।
हम सभी कम या अधिक अभिमतों के दास हैं।
अधीनता नामक वस्तु कितनी बड़ी तथा महिमा से युक्त है—इसे हमने वैष्णव धर्म में देखा है।
यदि हम मातृभाषा की उन्नति नहीं कर सके और हमारा यह सिद्वांत रहे कि अँग्रेज़ी के ज़रिए ही हम अपने ऊँचे विचार प्रकट कर सकते हैं और उनका विकास कर सकते हैं तो इसमें ज़रा भी शक नहीं कि हम सदा के लिए ग़ुलाम बने रहेंगे। जब तक हमारी मातृभाषा में हमारे सारे विचार प्रकट करने की शक्ति नहीं आ जाती और जब तब वैज्ञानिक विषय मातृभाषा में नहीं समझाए जा सकते, तब तक राष्ट्र को नया ज्ञान नहीं मिल सकेगा।
दासता का सबसे बुरा रूप ग्लानि की दासता है, क्योंकि तब लोग अपने में विश्वास खोकर निराशा की ज़ंजीरों में जकड़ जाते हैं।
-
संबंधित विषय : रवींद्रनाथ ठाकुर
जहाँ बहुत सारी ग़ुलामी होती है, वहाँ आज़ाद रचनात्मक विचारों के लिए जगह नहीं होती और केवल विनाश के विचार और प्रतिशोध के फूल वहाँ खिल सकते हैं।
जब कभी मैं किसी को दासता का पक्ष समर्थन करते देखता हूँ तो मेरे मन में स्वयं उसी व्यक्ति पर उसकी परीक्षा किए जाने की प्रबल प्रेरणा होती है।
हमेशा की तरह आज भी लोगों को दो समूहों में वर्गीकृत किया जा सकता है—ग़ुलाम और आज़ाद। वह इंसान जिसके दिन का दो-तिहाई भाग उसका अपना नहीं है वह ग़ुलाम है, चाहे वह राजनेता हो, व्यवसायी हो, अधिकारी हो या कोई विद्वान हो।
बड़े होकर, अपनी सारी मानसिक क्षमताएँ विकसित हो जाने पर किसी के आतंक में जीना पड़े, तभी समझ में आता है कि आतंक किसी कहते हैं।
विडंबना दासों की महिमा है।
हमारा कर्म भी जब संकीर्ण स्वार्थ में ही चक्कर खाता रहता है, तब वही कर्म हमारे लिए भयंकर बंधन हो जाता है।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere