कलावान् गुणीजन भी जहाँ पर वास्तव में गुणी होते हैं; वहाँ पर वे तपस्वी होते हैं, वहाँ यथेच्छाचार नहीं चल सकता, वहाँ चित्त की साधना और संयम—है ही है।
शुद्ध बनने का अर्थ है मन से, वचन से और काया से निर्विकार बनना, राग-द्वेषादि से रहित होना।
परित्राण का अर्थ यह है कि व्यर्थता और असफलता से अपनी रक्षा करना, अपने भीतर सत्यरूपी जो रत्न छिपा हुआ है, उसका उद्धार करना।
असंयम को अमंगल जानकर छोड़ने में जिनके मन में विद्रोह जागता है, उनसे वह कहना चाहता है कि उसे असुंदर जानकर अपनी इच्छा से छोड़ दो।
असंगति जब हमारे मन के ऊपरी स्वर पर आघात करती है; तब हमको कौतुक जान पड़ता है, गहरे स्तर पर आघात करती है तो हमको दुःख होता है।
दूसरे कवियों के शब्दप्रयोगों को देखकर; जो काव्यप्रणयन किया जाता है, भला उसमें कहाँ आनंद मिलेगा?
श्री अरविंद का वचन है: ‘सम होना या'नी अनंत हो जाना।’ असम होना ही क्षुद्र होना है और सम होते ही विराट को पाने का अधिकार मिल जाता है।
आठ बातों से मनुष्य शिक्षित कहलाता है: हर समय हँसने वाला न हो, सतत इंद्रिय-निग्रही हो, मर्मान्तक वचन न कहता हो, सुशील हो, दुराचारी न हो, रसलोलुप न हो, सत्य में रत हो, क्रोधी न हो, शांत हो—वह शिक्षित है।
ख़ुद के प्रति समर्पण ही सच्ची शक्ति है—वह शक्ति जो भीतर से आती है।
मन की अस्थिरता के कारण शरीर भी पूरी तरह अस्थिर हो जाता है।
जो वीर दुर्जय संग्राम में लाखों योद्धाओं को जीतता है, यदि वह एक अपनी आत्मा को जीत ले, तो यह उसकी सर्वश्रेष्ठ विजय है।
-
संबंधित विषय : आत्मविश्वासऔर 2 अन्य
हमें जो चाहिए सो मिलता है, यह पुराना नियम है। जो खोजे सो पावे। धर्म की आकांक्षा होना बड़ी कठिन बात है। इसे हम साधारणतः जितना सरल समझते हैं, वह उतनी सरल नहीं है। फिर हम यह तो भूल ही जाते हैं कि कथाएँ सुनना या पुस्तकें पढ़ना धर्म नहीं है। धर्म तो एक सतत युद्ध है। स्वयं अपनी प्रकृति का दमन करते रहना, जब तक उस पर विजय प्राप्त न हो जाए, तब तक निरंतर लड़ते रहना—इसी का नाम धर्म है।
पाँच इंद्रियों, क्रोध, मान, माया, लोभ और सबसे अधिक दुर्जय अपनी आत्मा को जीतना चाहिए। एक आत्मा के जीत लेने पर सब कुछ जीत लिया जाता है।
हममें मन के निग्रह की शक्ति बहुत थोड़ी है।
अत्यंत भूखा मनुष्य यदि कंठनली में चित्त का संयम कर सके, तो उसकी भूख शांत हो जाती है।
जीवन की अवधि अत्यंत अल्प है और यह झक्की तथा कपटी मनुष्यों की बातों में बिताने के लिए नहीं है।
दुर्बल और क्षीण चित्त के लिए, भावों का खाद्य कुपथ्य जैसा हो जाता है।
-
संबंधित विषय : रवींद्रनाथ ठाकुर
जब कोई अपनी समस्त शक्तियों का संयम करता है, तब वह अपनी देह के भीतर के प्राण का ही संयम करता है। जब कोई ध्यान करता है, तो भी समझना चाहिए कि वह प्राण का ही संयम कर रहा है।
यथार्थ नम्रता सात्त्विकता के तेज़ से उज्ज्वल होती है, त्याग और संयम की कठोर शक्ति से दृढ़-प्रतिष्ठित होती है।
सीखने के कर्म से स्वतः ही एक असाधारण अनुशासन का जन्म होता है, और आत्मसंयम के एक आंतरिक बोध के लिए अनुशासन आवश्यक है।
आप नकारात्मक चीज़ों पर ध्यान केंद्रित करके दुनिया की मदद नहीं कर सकते हैं। जब आप दुनिया में होने वाली नकारात्मक घटनाओं पर ध्यान केंद्रित करते हैं, तो आप न सिर्फ़ उन्हें बढ़ाते हैं, बल्कि अपनी ज़िंदगी में आने वाली नकारात्मक चीज़ों को भी बढ़ा लेते हैं।
संसार में शक्ति के जितने विकास देखे जाते हैं, सभी प्राण के संयम से उत्पन्न होते हैं।
जो अपने कर्त्तव्यों का पालन नहीं करता, उसे 'स्वत्व' की दुहाई देने तक का कोई स्वत्व नहीं, और जो अपने कर्तव्य की ओर पूरी और पक्की दृष्टि रखेगा, उसके स्वत्व को कोई बड़ी से बड़ी निरंकुश शक्ति भी नहीं छीन सकती।
-
संबंधित विषय : आत्मविश्वासऔर 1 अन्य
प्रवृत्ति के प्रबल हो जाने से ही त्याग और भोग का सामंजस्य टूट जाता है।
जब तक पूर्ण भक्ति का उदय न हो जाए, तब तक शास्त्र कथित नियमों के अनुसार जीवन यापन करना चाहिए।
जो लोग ख़ुद को जीवन के प्रति समर्पित कर देते हैं, उन्हें कोई चिंता नहीं होती और वे शांति का जीवन जीते हैं, जबकि पूरी दुनिया मुसीबतों पर मुसीबतों से जूझ रही होती है।
आंतरिक और बाह्य शुद्धि, संतोष, तपस्या, अध्ययन और ईश्वर की उपासना ही नियम हैं।
अगर आप छोटे-छोटे काम ठीक से नहीं कर सकते, तो आप बड़े काम भी कभी सही तरह से नहीं कर पाएँगे। और अगर संयोग से आपका दिन ख़राब बीतता है, तो भी जब आप घर आएँगे; तो आपको बना हुआ बिस्तर मिलेगा, जिसे आपने बनाया था और एक बना हुआ बिस्तर आपको प्रोत्साहन देता है कि कल बेहतर होगा।
मन—जिसमें मस्तिष्क और हृदय समाविष्ट हैं—को पूर्ण संगति में होना चाहिए।
जिस प्रकार कला अपने आभ्यंतर नियमों के कठोर अनुशासन के बिना अपंग या विकृत होती है; अथवा अभाव बनकर रहती है, उसी प्रकार व्यक्ति-स्वातंत्र्य अपनी अंतरात्मा के कठोर नियमों के अनुशासन के बिना—निरर्थक और विकृत हो जाता है, खोखला हो जाता है।
आत्म-संयम अर्थात् आत्मानुशासन ही कलात्मक सौंदर्य को सुंदर एवं व्यवस्था को सुव्यवस्थित और आनंददायक बनाता है।
जिन कामों को हम अपने-आप कर सकते हैं, उन सबको अलग छोड़कर केवल दूसरों पर अभियोग लगाना और सदा-सर्वदा कर्महीन उत्तेजना में दिन बिताना—इसे मैं राष्ट्रीय कर्तव्य नहीं समझता।
जो कुछ भी आप देखते या महसूस करते हैं; जैसे कोई किताब, उसे उठाएँ। पहले उस पर मन को एकाग्र करें, फिर उस ज्ञान पर जो किताब के रूप में मौजूद है, फिर उस अहंकार पर जो किताब को देख रहा है और इसी तरह आगे बढ़ते रहें। इस अभ्यास से सभी इंद्रियों पर विजय प्राप्त हो जाएगी।
ध्यान के लिए वस्तुतः सर्वोच्च ढंग की संवेदनशीलता चाहिए तथा प्रचण्ड मौन की एक गुणवत्ता चाहिए—ऐसा मौन जो प्रेरित, अनुशासित या साधा हुआ नहीं हो।
अगर आप रोज़ सुबह अपना बिस्तर ठीक करते हैं, तो आपके दिन का पहला काम पूरा हो जाता है। इससे आपको गर्व की छोटी-सी भावना पैदा होगी और इससे आपको एक और काम करने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा और फिर दूसरा और फिर एक और। दिन के अंत तक पूरा किया गया वह एक काम, कई कामों में बदल जाएगा। अपना बिस्तर ठीक करना इस तथ्य की भी पुष्टि करेगा कि जीवन में छोटी-छोटी चीज़ें भी मायने रखती हैं।
-
संबंधित विषय : आत्मविश्वासऔर 2 अन्य
आप बिना किसी पुस्तक को पढ़े या बिना साधु—संतों और विद्वानों को सुने अपने मन का अवलोकन कर सकते हैं।
-
संबंधित विषय : आत्म-चिंतनऔर 2 अन्य
याद रखिए, हर दिन की शुरुआत एक काम पूरा करने के साथ कीजिए। जीवन में अपनी मदद करने के लिए किसी को खोजिए। सबका सम्मान कीजिए। जान लीजिए कि जीवन अनुकूल नहीं होता है और आप अक्सर नाकाम होंगे। हालाँकि अगर आप कुछ जोख़िम उठाते हैं, सबसे कठिन समय में भी आगे बढ़ते हैं, दबंगों का मुक़ाबला करते हैं, दबे-कुचलों को ऊपर उठाते हैं और कभी हार नहीं मानते हैं, तो आप अपने जीवन को और शायद दुनिया को भी, बेहतर बनाने के लिए बदलाव कर सकते हैं!
मनुष्य वृहत् मंगल-सृष्टि तपस्या द्वारा ही करता है।
ख़ुद से झूठ बोलना बंद कर दीजिए तो आपके सामने सच का अगाध सागर होगा और आपके लिए मुक्ति के द्वार खुल जाएँगे।
-
संबंधित विषय : आत्म-सम्मानऔर 1 अन्य
दुःख ही साधना है, तपस्या है। उसी की निष्पत्ति है आनंद, मुक्ति-लाभ, ईश्वर-ज्ञान।
ब्रह्मचर्य के बिना और किसी भी उपाय से आध्यात्मिक शक्ति नहीं आ सकती।
धारणा शक्ति प्रतिभा के प्रकाश की अनुगामी होती है और धारणा शक्ति का अनुगमन करने वाली निपुणता आदि मानसिक शक्तियाँ होती हैं।
जो अंत:प्रकृति को वशीभूत कर सकते हैं, सारा जगत् उनके वशीभूत हो जाता है। वह उनका दास हो जाता है।
मैं सामान्य उसको समझता हूँ, जिसमें अपने भीतर के असामान्य के उग्र आदेश का पालन करने का मनोबल न हो।
-
संबंधित विषय : गजानन माधव मुक्तिबोधऔर 1 अन्य
उपाय अंततः वही अधिक सार्थक होगा जिसमें सरकारी प्रशासन से आत्मानुशासन के मूल्य पर अधिक बल हो।
महान कार्य अपने कर्त्ता को संयमी होने का संदेश भेजते हैं।
तुम यहाँ हो,पूरी तरह जीने के लिए, प्यार देने और पाने के लिए—पूरी तरह।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
संबंधित विषय
- आकांक्षा
- आत्म
- आत्म-अनुशासन
- आत्म-चिंतन
- आत्मज्ञान
- आत्म-तत्व
- आत्मविश्वास
- आत्म-सम्मान
- आत्म-संयम
- आनंद
- आलसी
- ईमानदार
- उम्मीद
- एकाग्र
- क्रोध
- कला
- कलाकार
- गजानन माधव मुक्तिबोध
- चेतना
- ज्ञान
- जीवन
- जीवन शैली
- दुख
- देह
- दिमाग़
- दिल
- ध्यान
- धर्म
- धैर्य
- नक़ल
- निष्काम
- पवित्रता
- भक्ति
- भूख
- भलाई
- मनुष्य
- महात्मा गांधी
- यथार्थ
- योग
- रवींद्रनाथ ठाकुर
- व्यक्तिगत
- व्यवस्था
- वीर
- शक्ति
- सुख
- संघर्ष
- सृजन
- समर्पण
- सरकार
- स्वतंत्रता
- संवेदना
- सीखना
- सौंदर्य