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नृत्य पर उद्धरण

नृत्य को मानवीय अभिव्यक्तियों

का रसमय प्रदर्शन कहा गया है। भारतीय सांस्कृतिक अवधारणा में तो सृष्टि की रचना और संहार तक से नृत्य का योग किया गया है। प्रस्तुत चयन में नृत्य से अभिभूत कविताओं का संकलन किया गया है।

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हल्ली नृत्य, गायन, रासलीला आदि देखने से, राग से चंचल एवं अश्रुपूर्ण नेत्रों से चंद्रमंडल को देखने से रति में वृद्धि होती है।

वात्स्यायन
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अकारण और अंतहीन : संगीत, लय और नृत्य।

जूलिया क्रिस्तेवा
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जब तुम टूट जाओ, तो नाचो। नाचो अगर तुमने पट्टी फाड़ दी है—लड़ाई के बीच में नाचो।

रूमी
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तब तक नाचो, जब तक तुम ख़ुद को चकनाचूर कर दो।

रूमी
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जिस प्रकार हर रंग और रेखा चित्र नहीं है, हर ध्वनि संगीत नहीं है, शरीर की हर भाव-भंगिमा नृत्य नहीं है, वस्तु की हर आकृति शिल्प नहीं है, हर शब्द साहित्य नहीं है—उसी प्रकार हर ध्वनि, हर मुद्रा, हर रंग रेखा और हर आकृति से प्राप्त होने वाला आनन्द कला का आनन्द नहीं है।

विजयदान देथा
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समाज में गीत-वाद्य, नाट्य- नृत्य का भी महत्त्वपूर्ण स्थान है, ये बड़ी मनोहर और उपयोगी कलाएँ हैं। पर हैं तभी, जब इन के साथ संस्कृति का निवास-स्थान पवित्र संस्कृत अंतःकरण हो। केवल 'कला' तो 'काल' बन जाती है।

हनुमान प्रसाद पोद्दार
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जिस प्रकार नर्तकी रंगशाला के दर्शकों को नृत्य दिखाकर नृत्य से निवृत्त हो जाती है, उसी प्रकार प्रकृति भी पुरुष को आत्मा का साक्षात्कार कराके निवृत्त हो जाती है।

ईश्वर कृष्ण
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भक्ति के साथ नृत्य-कला का विकास हुआ।

नामवर सिंह
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कबीर जैसा आदमी 'नाच रे मन मद नाच' कहते हुए नाचता हुआ-सा दिखाई पड़ता है।

नामवर सिंह
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नृत्य एक क्षैतिज इच्छा की लंबवत अभिव्यक्ति है।

जॉर्ज बर्नार्ड शॉ

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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