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विश्लेषण पर उद्धरण

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आलोचक का धर्म साहित्यिक नेतागिरी करना नहीं है, वरन् जीवन का मर्मज्ञ बनना और उसी विशेषता की सहायता से कला-समीक्षा करना भी है।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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समीक्षा की संस्कृति मनुष्य के सांस्कृति विकास, बल्कि उसकी संस्कृति और विकास के साथ अनिवार्य रूप से जुड़ी हुई चेष्टा है।

कुँवर नारायण
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हर अच्छी कविता की तरह सूर की कविता भी, श्रद्धा से अधिक समझ की माँग करती है।

मैनेजर पांडेय
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हिंदी साहित्य में महात्मा सूरदास को तो बहुत सम्मान मिला है, लेकिन महाकवि सूरदास के महत्त्व की व्याख्या करने वाला आलोचनात्मक विवेक विरल ही है।

मैनेजर पांडेय
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एक कृति की विवेचना और मूल्यांकन का मतलब यदि उसके ‘कथ्य’ की व्याख्या ही हो, तो एक कलाकृति का सौंदर्य पक्ष या तो बिल्कुल सपाट हो जाएगा या बिल्कुल रूढ़।

कुँवर नारायण
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मुक्तिबोध की ही तरह शमशेर की कविताओं को भी आत्मसात् करने के लिए उनके राजनीतिक विचारों को ही नहीं; उनके साहित्यिक आदर्शों और मान्यताओं को समझना पहली ज़रूरत है, अन्यथा हम उस प्रतिभा को ही गौण मानेंगे जो उन्हें अनेक कवियों से बिल्कुल अलग करती है।

कुँवर नारायण
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एक लेखक के सही मूल्यांकन के लिए ज़रूरी है कि हम युग के महत्त्वपूर्ण प्रश्नों पर उसके विचार जान सकें, उस बुनियादी दृष्टिकोण को समझ सकें—जिस पर वास्तव में एक व्यक्ति का मूल्य निर्भर करता है।

कुँवर नारायण
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भरत मुनि का रस-सिद्धांत कला के सिद्धांतों का ही नहीं, मनुष्य के मनोभावों का भी विस्तृत विश्लेषण और वर्गीकरण है।

कुँवर नारायण
  • संबंधित विषय : कला
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विचार का क्रिया से वैज्ञानिक विवेचन, और अनुसंधान द्वारा उद्घाटित परिस्थितियों और तथ्यों के मर्मस्पर्शी पक्ष का मूर्त और सजीव चित्रण भी—उसका इस रूप में प्रत्यक्षीकरण भी कि वह हमारे किसी भाव का आलंबन हो सके—कवियों का काम और उच्च काव्य का एक लक्षण होगा।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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कबीर जब तक अपने रंग में मस्त होकर जीवन का ज्ञान सुनाता है, तभी तक वह कलाकार है। पर जब वह हमें अपने बौद्धिक दार्शनिक निर्गुणवाद के प्रति आस्था रखने के लिए आग्रह करता-सा दिख पड़ता है, वहीं वह कला का दृष्टिकोण छोड़कर दार्शनिक दृष्टिकोण के क्षेत्र में उत्तर आता है—जिसके अलग नियम हैं और मूल्यांकन के अलग स्टैंडर्ड हैं।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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अच्छी समीक्षा का काम केवल सरलीकरणों और आसान समीकरणों में विचरण करना भर नहीं—एक ऐसे विवेक का परिचय देना भी है, जो विभिन्न रचनाओं या रचनाओं की विभिन्नताओं के बीच बारीक फ़र्क़ कर सके।

कुँवर नारायण
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समीक्षा की दुनिया सिद्धांतों और विचारों की है; जिनके सहारे वह एक साहित्यिक कृति का आकलन करती है, जबकि रचनात्मक साहित्य स्वभावतः जीवन-परक हुए बिना, अपनी प्रामाणिकता और विश्वसनीय सिद्ध नहीं कर सकता।

कुँवर नारायण
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समीक्षा जब भी यह विवेक खो देगी कि एक साहित्यिक रचना सबसे पहले एक कलाकृति है, महज़ एक कार्यक्रम नहीं—समीक्षा की साख कमज़ोर पड़ जाएगी।

कुँवर नारायण
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जीवन का सर्वेक्षण, विवेचन, निरीक्षण, विचार, विश्लेषण, समीक्षा आदि उसकी अपनी ज़रूरतों का संश्लिष्ट हिस्सा हैं।

कुँवर नारायण
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हिंदी पत्रिकाओं में पुस्तक-समीक्षा आमतौर पर उस साहित्यिक बेगार की तरह है, जो किसी भी लेखक से लिया जा सकता है और जिसमें ज़्यादातार वे नौसिखिए पकड़े जाते हैं, जो साहित्य के नाम पर अपनी दिमाग़ी भड़ास निकालना चाहते हैं; क्योंकि उन्हीं के पास वह मुफ़्त समय होता है, जो बड़े-बड़े लेखकों के पास नहीं होता।

कुँवर नारायण
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किसी साहित्य का वास्तविक विश्लेषण हम तब तक नहीं कर सकते; जब तक कि हम उन गतिमान सामाजिक शक्तियों को नहीं समझते, जिन्होंने मनोवैज्ञानिक-सांस्कृतिक धरातल पर आत्मप्रकटीकरण किया है।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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किसी साहित्यिक ने अपनी कृति दुनिया के सामने रखी, तो उसका नाप-तौल उसके आकार से नहीं किया जाएगा। किसने कितना लिखा, इस पर से उसकी क़ीमत नहीं नापी जाएगी; बल्कि उसने जीवन को कितना रस दिया, उस पर से उसकी परीक्षा, पहचान होगी।

विनोबा भावे
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इतिहास विश्वास की नहीं, विश्लेषण की वस्तु है। इतिहास मनुष्य का अपनी परंपरा में आत्म-विश्लेषण है।

यशपाल
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तू स्वयं अपना उच्च न्यायालय है। अपनी रचना का मूल्यांकन केवल तू ही कर सकता है।

अलेक्सांद्र पूश्किन
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कैमरे के आविष्कार से उन पेंटिंग्स को देखने का तरीक़ा भी बदला, जो कैमरे के आविष्कार से बहुत पहले बनाई गई थीं।

जॉन बर्जर
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महान से महान समीक्षक जब काव्य-सृजन की मानव-भूमिका से कट जाता है, तब वह एक बहुत बड़ा ख़तरा उठाता है।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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आलोचक का कार्य केवल गुण-दोष विवेचन ही नहीं है, वरन् साहित्य का नेतृत्व करना भी है।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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हमारी सृजन-प्रतिभा; जीवन-प्रसंग की उद्भावना से लेकर तो अंतिम संपादन तक, अपनी मूल्यांकनकारी शक्ति का उपयोग करती रहती है।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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कलात्मक चिंतन के बिना समीक्षा-कार्य नहीं चल सकता। उसी प्रकार वास्तविक जीवन-ज्ञान और जीवन-चिंतन के बिना, उसका मानव-विवेक और कलात्मक विवेक (ये दोनों, एक तरह से पृथक् और दूसरी तरह से अभिन्न हैं) नहीं हो सकता।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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किसी वस्तु को लक्ष्य करके, उसका स्वरूप निर्देशक विश्लेषण ही है—युक्ति।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र
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समीक्षा में समीक्षक की इच्छा-शक्ति की भी लीला होती है।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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जो लोग साहित्य के केवल सौंदर्यात्मक-मनोवैज्ञानिक पक्ष को चरम मानकर चलते हैं, वे समूची मानव-सत्ता के प्रति दिलचस्पी रख सकने के अपराधी तो हैं ही, साहित्य के मूलभूत तत्त्व, उनके मानवीय अभिप्राय तथा मानव-विकास में उनके ऐतिहासिक योगदान, अर्थात्, दूसरे शब्दों में, साहित्य के स्वरूप का विश्लेषण तथा मूल्यांकन कर पाने के भी अपराधी हैं।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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मैं समझता हूँ कि किसी भी साहित्य का ठीक-ठाक विश्लेषण तब तक नहीं हो सकता, जब तक हम उस युग की मूल गतिमान सामाजिक शक्तियों से बननेवाले सांस्कृतिक इतिहास को, ठीक-ठाक जान लें।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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कर्म ही से बौद्धिक विश्लेषण-शक्ति बढ़ती है, इसमें संदेह नहीं।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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यदि हम परंपरा का नकारात्मक मूल्यांकन भी करते हैं, तो भी यह स्वीकार करना कठिन है कि दृष्टिकोणों और मूल्यों को बदलने और संरचनात्मक बाधाओं को हटाने से, अपने आप ही पर्याप्त उन्नति तथा वृद्धि हो जाएगी।

श्यामाचरण दुबे
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सही इलाज का नुस्ख़ा वास्तविकता के कठोर विश्लेषण पर निर्भर करता है।

न्गुगी वा थ्योंगो
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जो लोग केवल ऊपरी तौर पर साहित्य का ऐतिहासिक विहंगावलोकन अथवा समाजशास्त्रीय निरीक्षण कर चुकने में ही अपनी इति-कर्तव्यता समझते हैं, वे भी एकपक्षीय अतिरेक करते हैं।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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बौद्धिक विश्लेषण-शक्ति भावनानुभूति से एकरस और एकरूप होकर जहाँ काम करती है, वहाँ भावना की अथाह गंभीरता के साथ ही साथ, विश्लेषित भाव, तथा संश्लेषित भाव-दृश्य, सभी कुछ एक साथ प्राप्त होते हैं।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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परंपराएँ स्वयं ही समय-समय पर अपना मूल्यांकन कर अपनी दिशा बदलती हैं।

श्यामाचरण दुबे

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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