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Prayag Shukla

1940 | کولکاتا, مغربی بنگال

کی

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आदमी का मन कभी-कभी 'अकेलेपन' का अनुभव भले करे, लेकिन अपनी शारीरिक उपस्थिति में कोई चीज़ कभी 'अकेली' नहीं होती।

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भारतीय कला में प्रकृति-द्रश्यों या प्रकृति उपकरणों की उपस्थिति की अपनी विशिष्ट भूमिका रही है।

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देखने के साथ सोचना जुड़ा हुआ है। हम जो कुछ भी देखते हैं, उस पर किसी-न-किसी रूप में सोचते ज़रूर हैं।

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पिकासो की ग्राफ़िक-कृतियों में से कई ऐसी हैं, जिनमें चित्रित आकृतियाँ 'काल्पनिक' हैं, लेकिन इनमें मानवीय-स्थितियाँ या अनुभव इस तरह एकत्र हुए हैं कि काल के गर्त में बिला गए हज़ारहा लोगों का 'प्रतिनिधित्व' करने में वे समर्थ हैं।

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पूरा देखना वही होता है, जिसमें हम किसी वस्तु के इर्द-गिर्द की सारी चीज़ें देखते हैं।

कला की दुनिया में रूपांतरण का अपना महत्त्व है।

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समीक्षा या समीक्षात्मक कसौटियाँ, अपने आप में विचार का काम भी करती हैं।

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सभी कलाओं में चित्रकला और मूर्तिशिल्प ही ऐसे कला-उपन्यास हैं, जिनके पास रचना-सामग्री की विपुलता है।

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मूर्तिशिल्प में 'कायांतरण' अधिक प्रत्यक्ष होता है, चित्र के मुक़ाबले वह त्रि-आयामी भी होता है और यथार्थ जीवन में चलने-फिरनेवाली चीज़ों के समकक्ष भी। इसलिए उसके प्रति आकर्षण भी एक अलग तरह का होता है।

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मेज़ पर एक ही गिलास रखा हो, तो क्या वह अकेला होता है? उसके साथ मेज़ होती है; कमरे की दीवारें होती हैं और वह रोशनी होती है, जिसमें हम उसे देखते हैं।

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स्मृति का एक बड़ा आधार देखना भी है।

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यह देखने का ही वरदान है कि हम कुछ चुन भी सकते हैं। देखेंगे नहीं, तो अपने लिए सार्थक चीज़ें चुन भी नहीं सकेंगे।

कवि और कलाकार ही तथाकथित 'अनुपयोगी' चीज़ें नहीं देखते—सब देखते हैं।

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कला में तो प्रकृति भी रूपांतरित ही होगी और कला में प्रकृति का यह रूपांतरण ही तो, जीवन-प्रकृति के नए अर्थ और आयाम हमें सौंपता है।

होनरी कार्तिए-ब्रेसों उन छायाकारों में प्रमुख हैं, जिनके कारण छायांकन (फ़ोटोग्राफ़ी) को कला का दर्जा हासिल हुआ है।

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प्रकृति और कला का संबंध निश्चय ही बहुत गहरा है, और प्रकृति के सब तरह के रूप-गुण, जाने कब से कला में भी अपनी अभिव्यक्ति पाते रहे हैं और कई तरह से दर्ज होते रहे हैं।

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आज देखने को लेकर समस्या यह है कि हमने देखने को दो खानों में बाँट दिया है—उपयोगी और अनुपयोगी। जबकि देखना बराबर उपयोगी ही होता है।

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वस्तु-जगत जहाँ व्यवस्थित है, वहीं वह अराजक भी कम नहीं है।

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आधुनिकता का एक अर्थ निश्चय ही खोज भी है—निरा पुनराविष्कार ही नहीं।

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हमारे यहाँ लोकजीवन में वनस्पति-रंगों का ही चलन रहा है, और ये रंग भी अपने स्वभाव में जलरंगों के ही निकट हैं।

सभी कलाओं में केवल चित्र और मूर्तिशिल्प के माध्यम ऐसे हैं, जिनको कृतियों को हमें प्रायः खड़े रहकर ही देखना होता है।

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कला जड़-चेतन के बीच भी एक पुल बनाती है, और जड़ को भी अपनी ओर से एक चेतना प्रदान करती है।

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पिकासो के लिए कोई भी रचना-सामग्री और कोई भी विषय, कला के बाहर का विषय नहीं है।

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कला या कलाकृति की महत्ता इस बात में भी है कि एक बार 'अंतिम रूप' पा जाने पर वह बराबर नए अर्थ 'खोलती' रहती है।

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देखना, विस्मय और औत्सुक्य से भी जुड़ा है। जाने कितनी चीज़ें ऐसी हैं जिन्हें हम सैकड़ों बार देख चुके होते हैं, लेकिन किसी क्षण-विशेष में उन्हें एक नई उत्सुकता से देखते हैं।

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जगदीश स्वामीनाथन का एक कथन याद आता है, जो एक भेंटवार्ता में उन्होंने दर्ज कराया था, कि 'कला वह आईना है, जिसमें प्रकृति अपना चेहरा कभी नहीं देख सकती।'

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किसी भी समाज में कुछ चीज़ों की स्मृति, अनजाने भी इकट्ठा और सक्रिय होती है।

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कार्तिए-ब्रेसों मानते हैं कि एक छायाचित्र पहले से नियोजित नहीं होना चाहिए।

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अपने आप में एक जादू है जीवन।

कला में आकार कहाँ से आते हैं? कुछ ‘देखने’ से ही तो। बचपन में हम बादलों की ओर देखकर बादलों पर क्यों नहीं ‘ठहर’ जाते? क्यों हम उनमें हाथी और ऐसी ही तमाम आकृतियाँ ढूँढ़ने लगते हैं।

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हेनरी मूर क्लासिकी और आधुनिक एक साथ हैं।

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हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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