आदमी का मन कभी-कभी 'अकेलेपन' का अनुभव भले करे, लेकिन अपनी शारीरिक उपस्थिति में कोई चीज़ कभी 'अकेली' नहीं होती।
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भारतीय कला में प्रकृति-द्रश्यों या प्रकृति उपकरणों की उपस्थिति की अपनी विशिष्ट भूमिका रही है।
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देखने के साथ सोचना जुड़ा हुआ है। हम जो कुछ भी देखते हैं, उस पर किसी-न-किसी रूप में सोचते ज़रूर हैं।
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पिकासो की ग्राफ़िक-कृतियों में से कई ऐसी हैं, जिनमें चित्रित आकृतियाँ 'काल्पनिक' हैं, लेकिन इनमें मानवीय-स्थितियाँ या अनुभव इस तरह एकत्र हुए हैं कि काल के गर्त में बिला गए हज़ारहा लोगों का 'प्रतिनिधित्व' करने में वे समर्थ हैं।
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