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Prayag Shukla's Photo'

Prayag Shukla

1940 | کولکاتا, مغربی بنگال

تمام تمام

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आदमी का मन कभी-कभी 'अकेलेपन' का अनुभव भले करे, लेकिन अपनी शारीरिक उपस्थिति में कोई चीज़ कभी 'अकेली' नहीं होती।

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भारतीय कला में प्रकृति-द्रश्यों या प्रकृति उपकरणों की उपस्थिति की अपनी विशिष्ट भूमिका रही है।

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देखने के साथ सोचना जुड़ा हुआ है। हम जो कुछ भी देखते हैं, उस पर किसी-न-किसी रूप में सोचते ज़रूर हैं।

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पिकासो की ग्राफ़िक-कृतियों में से कई ऐसी हैं, जिनमें चित्रित आकृतियाँ 'काल्पनिक' हैं, लेकिन इनमें मानवीय-स्थितियाँ या अनुभव इस तरह एकत्र हुए हैं कि काल के गर्त में बिला गए हज़ारहा लोगों का 'प्रतिनिधित्व' करने में वे समर्थ हैं।

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कला की दुनिया में रूपांतरण का अपना महत्त्व है।

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کتاب 3

 

Recitation

हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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