Font by Mehr Nastaliq Web
noImage

Sarvepalli Radhakrishnan

1888 - 1975

کی

باعتبار

हमें तो एक ही धर्म की आवश्यकता है जो मानवात्मा को मुक्त करता हो; जो मनुष्य के मन में भय को नहीं आस्था को, औपचारिकता को नहीं स्वाभाविकता को, यांत्रिक जीवन की नीरसता को नहीं नैसर्गिक जीवन की रसात्मकता को बढ़ावा देता हो। हमें नहीं चाहिए ऐसा धर्म जो मनुष्य के मन का यंत्रीकरण कर देता हो, जिसका फल धार्मिक कट्टरता के रूप में सामने आता है। हमें ऐसा धर्म नहीं चाहिए जो लक्ष्यों का यंत्रीकरण करके अपने अनुयायियों से बिल्कुल एक जैसा आचरण करने की माँग करने लगता है।

धर्म विश्वास की अपेक्षा व्यवहार अधिक है।

  • विषय :
    اور 2 مزید

धर्म का प्रयोजन है इस प्रज्ञा-जगत से, इस विभक्त चेतना वाले जगत से, जिसमें विभेद है, द्वित्व है, सामरस्य-मय, स्वातंत्र्यमय एवं प्रेममय जीवन में विकसित होने में हमारी सहायता करना।

धर्म का प्रारंभ हमारे जीवन में तब होता है जब हम यह जान जाते हैं कि हमारा जीवन केवल हमारे ही निमित्त नहीं है।

धर्म एक आंतरिक रूपांतरण है, एक आध्यात्मिक परिवर्तन है, हमारे अपने स्वभाव के विसंवादी स्वरों सामंजस्य लाने की क्रिया है—और उसका यह रूप इतिहास के आरंभ से ही मिलता आया है, यही उसका मूल स्वरूप है।

  • विषय : 1
    اور 1 مزید

नास्तिकता प्रायः धर्म की प्राणशक्ति की अभिव्यक्ति रही है, धर्म में वास्तविकता की खोज रही है।

  • विषय :
    اور 2 مزید

भली भाँति मनन किए हुए विचार ही जीवनरूपी सर्वोच्च परीक्षा में व्यवहृत एवं परीक्षित होकर धर्म बन जाते हैं।

अतीत को त्यागने से नहीं अपितु स्वीकारने से और अतीत को भविष्य में ढालने से, जिसमें अतीत का पुनर्जन्म होता है, जीवन आगे बढ़ता है।

  • विषय : 1

दर्शन तर्क-वितर्क कर सकता है और शिक्षा दे सकता है, धर्म उपदेश दे सकता है और आदेश दे सकता है; किंतु कला केवल आनंद देती है और प्रसन्न करती है।

धर्म जीवन की एक विशेष विधि नहीं है अपितु निखिल जीवन की एकमात्र विधि है।

धर्म आध्यात्मिक परिवर्तन है, एक अंतर्मुखी रूपांतरण है। यह अंधकार से प्रकाश की ओर जाना है, आत्मोद्धारहीनता से आत्मोद्धार की स्थिति में पहुँचना है। यह एक जागरण है. एक प्रकार की पुनर्जन्मता है।

  • विषय : 1
    اور 4 مزید

जीवन ताश के खेल की तरह है। हमने खेल का आविष्कार नहीं किया है और ताश के पत्तों के नमूने ही हमने बनाए हैं। हमने इस खेल के नियम भी ख़ुद नहीं बनाए और हम ताश के पत्तों के बँटवारे पर ही नियंत्रण रख सकते हैं। पत्ते हमें बाँट दिए जाते हैं, चाहे वे अच्छे हों या बुरे। इस सीमा तक नियतिवाद का शासन है। परंतु हम खेल को बढ़िया ढंग से या ख़राब ढंग से खेल सकते हैं। हो सकता हे कि कुशल खिलाड़ी के पास ख़राब पत्ते आए हों और फिर भी वह खेल में जीत जाए। यह भी संभव है कि किसी ख़राब खिलाड़ी के पास अच्छे पत्ते आए हों और फिर भी वह खेल का नाश करके रख दे। हमारा जीवन परवशता और स्वतंत्रता, दैवयोग और चुनाव का मिश्रण है।

परंपरा आत्मिक जीवन को पंगु कर देने वाला और हमसे एक सदा के लिए गए गुज़रे युग में लोटने की अपेझा करने वाला कोई कड़ा और कठोर साँचा नहीं है। वह अतीत की स्मृति नहीं है, बल्कि जीवंत आत्मा का सतत आवास है। वह आत्मिक जीवन की जीवंत धारा है।

जीवन अनंत जन्म तथा अनंत मृत्यु की प्रक्रिया है। जन्म मृत्यु है और मृत्यु, जन्म है।

दर्शनशास्त्र की आवश्यकता तब पड़ती है जब परंपरा में श्रद्धा हिल जाती है।

  • विषय : 1
    اور 1 مزید

विचारशील भारतवासी यह कभी नहीं भूलता कि मूर्तिपूजा केवल साधना है।

  • विषय :

मार्क्सवाद अपने अंधसमर्थकों और कट्टर विरोधियों दोनों के लिए ही एक धर्म-सा बन गया है।

  • विषय : 1
    اور 1 مزید

आज भारतीय ज्ञान केवल भारत राष्ट्र के पुनरुत्थान के लिए अपरिहार्य नहीं है अपितु मानव जाति के पुनर्शिक्षण शक्षण के लिए भी।

  • विषय :

परंपरा की अखंडता यांत्रिक पुनरुत्पादन नहीं है अपितु यह सर्जनात्मक रूपांतरण है, सत्य के आदर्श के अधिकाधिक निकट पहुँचना है।

  • विषय : 1
    اور 1 مزید

हम अन्तःज्ञान से आविष्कार करते हैं-यद्यपि हम तर्क से सिद्ध करते हैं।

Recitation

हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

रजिस्टर कीजिए