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उपासना पर उद्धरण

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मैं ईश्वर की पूजा भी केवल सत्य के रूप में करता हूँ।

महात्मा गांधी
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गृहस्थी के संचय में, स्वार्थ की उपासना में, तो सारी दुनिया मरती है। परोपकार के लिए मरने का सौभाग्य तो संस्कार वालों को ही प्राप्त होता है।

प्रेमचंद
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धूमधाम से क्या प्रयोजन? जिनकी हम पूजा करते हैं, उन्हें तो हृदय में स्मरण करना ही पर्याप्त है। जिस पूजा में भक्तिचंदन और प्रेमकुसुम का उपयोग किया जाए, वही पूजा जगत् में सर्वश्रेष्ठ है। आडंबर और भक्ति का क्या साथ?

सुभाष चंद्र बोस
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भगवान् की पूजा के लिए सबसे अच्छे पुष्प हैं—श्रद्धा, भक्ति, प्रेम, दया, मैत्री, सरलता, साधुता, समता, सत्य, क्षमा आदि दैवी गुण। स्वच्छ और पवित्र मन मंदिर में मनमोहन की स्थापना करके इन पुष्पों से उनकी पूजा करो। जो इन पुष्पों को फेंक देता है और केवल बाहरी फूलों से भगवान् को पूजना चाहता है, उसके हृदय में भगवान आते ही नहीं, फिर वह पूजा किसकी करेगा?

हनुमान प्रसाद पोद्दार
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मनुष्य की पूजा करना हमारा काम नहीं है। पूजा आदर्श और सिद्धांत की हो सकती है।

महात्मा गांधी
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दीन-दुखियों की सेवा ही प्रभु की पूजा है।

संत तुकाराम
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उपासना बाह्य आवरण है उस विचार-निष्ठा का, जिसमें हमें विश्वास है। जिसकी दुःख-ज्वाला में मनुष्य व्याकुल हो जाता है, उस विश्व-चिता में मंगलमय नटराज के नृत्य का अनुकरण, आनंद की भावना, महाकाल की उपासना का बाह्य स्वरूप है और साथ ही कला की, सौंदर्य की अभिवृद्धि है, जिससे हम बाह्य में, विश्व में, सौंदर्य-भावना को सजीव रख सके हैं।

जयशंकर प्रसाद
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निरंतर उपासना का तात्पर्य है— निरंतर भजन। अर्थात् नामजप, चिंतन, ध्यान, सेवा-पूजा, भगवदाज्ञा-पालन यहाँ तक कि संपूर्ण क्रिया मात्र ही भगवान की उपासना है।

स्वामी रामसुखदास
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वेद से बड़ा शास्त्र नहीं है, माता के समान गुरु नहीं है, धर्म से बड़ा लाभ नहीं है तथा उपासना से बड़ी तपस्या नहीं है।

वेदव्यास
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पूजा या प्रार्थना वाणी से नहीं, हृदय से करने की चीज़ है।

महात्मा गांधी
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स्वामी का कार्य, गुरु भक्ति, पिता के आदेश का पालन, यही विष्णु की महापूजा है।

संत तुकाराम
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गुणवान कुल में उत्पन्न होकर भी यदि कोई स्वयं गुणहीन है, तो वह पूजा का पात्र नहीं हो सकता, जैसे दुधारी गाय से उत्पन्न होने पर भी यदि गो वंध्या है तो उसका उपयोग कौन करेगा?

क्षेमेंद्र
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कृषकों का जीवन ही जीवन है। अन्य सब दूसरों की वंदना करके भोजन पाकर उनके पीछे चलने वाले ही हैं।

तिरुवल्लुवर
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हिन्दू मूर्ति पूजक हैं और इसके लिए हमें अभिमान है।

महात्मा गांधी
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मूर्तियाँ ईश्वर की उपासना में सहायक होती हैं। कोई भी हिन्दू किसी मूर्ति को ईश्वर नहीं समझता। मैं मूर्ति-पूजा को पाप नहीं मानता।

महात्मा गांधी
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पूजा करने वाला पूजा करने में अपने उत्तम गुणों को बाहर लाता है।

महात्मा गांधी
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प्रियतम तुम मेरे प्राण हो। मैंने देह, मन, कुल, शील, जाति, मान सब तुम्हें सौंप दिया। हे अखिल के नाथ श्याम, तुम योगियों के आराध्य धन हो। हम गोपियाँ हैं, बड़ी दrन हैं, भजन-पूजन कुछ नहीं जानतीं। सब लोग हम पर कलंक लगाते हैं, पर उसका मलाल नहीं है। तुम्हारे लिए कलंक का हार गले में धारण करना सुख की बात है।

चंडीदास
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गँवारों की धर्मं-पिपासा इंट-पत्थर पूजने से शांत हो जाती है, भद्रजनों की भक्ति सिद्ध पुरुषों की सेवा से।

प्रेमचंद
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कन्या का पिता होना बहुत वंदनीय है।

भास
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मानव के अंतरतम में कल्याण के देवता का निवास है। उसकी संवर्धना ही उत्तम पूजा है।

जयशंकर प्रसाद
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उपासना और उपास्य बनने का प्रयत्न करो।

श्री अरविंद
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जो वस्तु हमसे अलग है, हमसे दूर प्रतीत होती हैं, उसकी मूर्ति मन में लाकर उसके सामीप्य का अनुभव करना ही उपासना है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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जैसे ईश्वर के गुण, कर्म, स्वभाव पवित्र हैं, वैसे अपने करना, ईश्वर को सर्वव्यापक, अपने को व्याप्त जान के ईश्वर के समीप हम और हमारे समीप ईश्वर है, ऐसा निश्चय योगाभ्यास से साक्षात करना उपासना कहाती है, इसका फल ज्ञान की उन्नति आदि है।

दयानंद सरस्वती
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व्यक्ति, रूप, मान, पद, धन, विद्या और आकार का सत्कार करना मूर्ति-पूजन है।

रामतीर्थ
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आडंबर से पूजा करने पर मन में अहंकार पैदा होता है। धातु, पत्थर, मिट्टी की मूरत से तुझे क्या काम? तू छिपकर पूजा कर कि किसी को कानों-कान ख़बर हो और मनोमय प्रतिमा बनाकर हृदय के पद्मासन में स्थापित कर।

रामप्रसाद सेन
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खादी द्वारा कला की—जीवित कला की—उपासना होती है।

विनोबा भावे
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ज्ञान मंत्र है। कर्म तंत्र है। उपासना दोनों को जोड़ देती है।

विनोबा भावे
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अव्यक्त निर्गुण, निर्विशेष ब्रह्म उपासना के व्यवहार में सगुण ईश्वर हो जाता है। इसका तात्पर्य यह है कि उपासना जब होगी, तब व्यक्त और सगुण की ही होगी, अव्यक्त और निर्गुण की नहीं।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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पूजा से तात्पर्य पूज्य जैसे बनने की क्रिया से है।

आनंद शंकर माधवन
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हमारे भीतर अनन्त शक्ति निहित है। उस शक्ति का बोध करना पड़ेगा। पूजा का उद्देश्य है मन में शक्ति का बोध करना।

सुभाष चंद्र बोस
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विचारशील भारतवासी यह कभी नहीं भूलता कि मूर्तिपूजा केवल साधना है।

सर्वेपल्लि राधाकृष्णन
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हे भवानी! मेरा बोलना-चालना आपका जप हो, मेरा शिल्प (मेरी चेष्टाएँ) आपकी उपासना से संबद्ध मुद्राओं की रचना हो, चलना आपकी प्रदक्षिणा लगाना हो, भोजन करना आपको विधिवत दी गई आहुतियाँ हों, भूमि में लेटना आपके लिए प्रणाम हो, इस प्रकार जितना भी मेरा विलास और चेष्टाएँ हैं, वे सब आत्मापर्ण की विधि से की गई आप की पूजा के पर्यायवाची हो जाए।

आदि शंकराचार्य
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जिसे मूर्ति की आवश्यकता हो वह मूर्तिपूजन करे, इसमें मुझे कोई आपत्ति नहीं है। मुझे इसकी आवश्यकता नहीं जान पड़ती। इसके बिना करोड़ों लोगों का काम चल जाता है। फिर एक तरह से तो हम सभी मूर्तिपूजक हैं।

महात्मा गांधी
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पैर से हो सकती है, हाथ से हो सकती है और जिह्वा से हो सकती है। पूजा का तरीक़ा कुछ भी हो, पूजा सच्ची होनी चाहिए।

महात्मा गांधी
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मिट्टी का पशुपति (शिव) बनाया तो उससे मिट्टी की क्या महत्ता? शिव की पूजा शिव को प्राप्त होती है, और मिट्टी मिट्टी में मिल जाती है। पत्थर का विष्णु बनाया किंतु विष्णु पत्थर नहीं है। विष्णु की पूजा विष्णु को प्राप्त होती है और पत्थर, पत्थर के रूप में ही रह जाता है।

संत तुकाराम

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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