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सच पर ग़ज़लें

बात कुछ बनत

कृष्णानन्द कृष्ण

लाज नाहीं शरम

कृष्णानन्द कृष्ण

गीली केहिकै कोर

अशोक अज्ञानी

दरद जिन्दगी के सजा

जौहर शफियाबादी

पतझर जब से पास भइल

रमाकान्त मुकुल

इंसान सुधरि जाय

अशोक अज्ञानी

नेह घर से

जौहर शफियाबादी

छुट्टा हरहा खेतु

अशोक अज्ञानी

मीत, जब मीत

मिथिलेश ‘गहमरी’

का रखल बा अब

कृष्णानन्द कृष्ण

झलकेले खुशी बीच

अशोक द्विवेदी

बात होता कि सरग

अशोक द्विवेदी

कड़ी हो धूप तो

वीरेंद्र वत्स

आग रहे हवा

मिथिलेश ‘गहमरी’

देखलीं, कि बात

मिथिलेश ‘गहमरी’

आप तो हर मंच से

मनजीत भोला

कोई तो बात उठे

वीरेंद्र वत्स

रोज़ बढ़ जाती हैं

सुनील मिश्र

सच कहना

डी. एम. मिश्र

कौन है जो मुझको

अमन मुसाफ़िर

ग़मज़दा

डी. एम. मिश्र

क्या हैं हम

नवल बिश्नोई

मुकरियाँ

डॉ. वेद मित्र शुक्ल

बुझे न प्यास

डी. एम. मिश्र

दर्द

नवल बिश्नोई

महकमा तालीम का

मनजीत भोला

बोझ धान का लेकर

डी. एम. मिश्र

बातें जो हर क्षण

डॉ. वेद मित्र शुक्ल

हिज़रत–पलायन

मनजीत भोला

फ़रियाद

डी. एम. मिश्र

सच एकदम

डॉ. वेद मित्र शुक्ल

लोगों के

नवल बिश्नोई

टूटे सच का गुमान

आनंद बहादुर

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere