बेईमानी इतनी पुरानी बात हो गई है कि अब कोई बेईमानी की बात करे, तो लगता है बड़ा पिछड़ा हुआ आदमी है।
मनुष्य को चाहिए कि वह जिस स्थिति में भी हो, मृत्यु की परवाह न करके कर्तव्य का पालन करे। मृत्यु की अपेक्षा अधर्म से अधिक डरना चाहिए।
नकली-भक्ति-युक्त मनुष्य उपदेश नहीं ले सकता, उपदेष्टा के रूप में उपदेश दे सकता है। इसीलिए कोई उसे उपदेश देता है; तो उसके चेहरे पर कोष के लक्षण, विरक्ति के लक्षण, संग छोड़ने की चेष्टा इत्यादि लक्षण प्रायः स्पष्ट प्रकाश पाते हैं।
चरित्रवान और चरित्रहीन में कुल इतना फ़र्क़ है—एक पकड़ा नहीं जाता और दूसरा पकड़ा जाता है। जिसकी दबी है, वह चरित्रवान और जिसकी खुल गई वह चरित्रहीन।
कुसंस्कारों की जड़ें बड़ी गहरी होती हैं।
सबसे ज़्यादा अनैतिकता धार्मिक विश्वास ही फैलाते हैं।
धार्मिक कट्टरता साधारण मनुष्य को किसी-किसी अवसर पर मनुष्य नहीं रहने देती, उसे पशु बना देती है।
'भारतीय बनिया संस्कृति' एक अलग ही संस्कृति है। इस संस्कृति का लक्षण है कि किसी भी मामले में आदमी के मन में पहिले यह विचार आता है कि मैं इसमें कहाँ बेईमानी कर सकता हूँ।
नैतिक गिरावट स्वयं एक लक्षण है, जो अन्य घटना-क्रमों या अन्य मानसिक विकार-दृश्यों का कारण हो सकती है।
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ग़लत लक्ष्य वाले व्यक्ति का चुना जाना; ज़्यादा बेहतर है बजाए उस व्यक्ति के, जिसका लक्ष्य भले अच्छा हो लेकिन वो संदिग्ध तरीक़ों से जीतना चाहे।
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अनैतिक का नैतिक के प्रति विद्रोह, नैतिकता की उन्नति और उसके परिष्कर का कारण है।
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सेवा ढंग से की जाए, तो वह धंधा भी हो जाती है।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere