भारतीय साहित्य में उन लोगों की वाणी को ही प्रधानता मिली है, जिन्होंने आध्यात्मिक असंतोषों और अतृप्तियों को दूर करने की दिशा में, विवेक-वेदना-स्थिति से ग्रस्त होकर काम किया है।
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दिवंगत होने पर भी सत्काव्यों के रचयिताओं का रम्य काव्य-शरीर; निर्विकार ही रहता है और जब तक उस कवि की अमिट कीर्ति पृथ्वी और आकाश में व्याप्त है, तब तक वह पुणयात्मा देव-पद को अलंकृत करता है।
मूर्धन्य कवियों में कुछ ही ऐसे हुए हैं, जिन्होंने अपनी कल्पनाओं के शुद्ध सौंदर्य को उसकी निर्वसन सत्यता और तेजस्विता में प्रस्तुत किया हो।
साहित्य की समस्त महान कृतियाँ किसी शैली (genre) की स्थापना करती हैं या विसर्जन—अन्य शब्दों में यों कहें, कि वे विशिष्ट घटनाएँ हैं।
महाकवियों की तो कला चेरी होती है, जब कि मध्यम कोटि के कवियों के लिए वह सहायक दिखाई देती है। निम्न कोटि के कवियों को तो शास्त्र का आधार लेकर ही जीवित रहना पड़ता है।
एक महान् कवि या उपन्यासकार केवल कुछ ही कारणों से महान् नहीं होता, कई कारणों से होता है। उसकी महानता की एक कसौटी यह भी है कि उसका कृतित्व अनेक दृष्टिकोणों से व्याख्या को आमंत्रित करता है और उन पर खरा उतरता है।
प्रत्येक महान कवि अपने पूर्ववर्ती कवियों की रचना-परंपरा में कुछ नवीन तत्व जोड़ता है और इस प्रकार अपनी विशिष्ट काव्य-शैली का सृजन करता है।
इतिहास के उत्कृष्टतम कवि वे रहे हैं, जिनका आचरण निर्मल रहा है, जिनकी प्रज्ञा विलक्षण रही है और जिनका जीवन सौभाग्य से संपन्न रहा है। यदि उनके जीवन का सूक्ष्म अध्ययन किया जाए, तो ज्ञात होता है कि वे अत्यंत सफल और भाग्यशाली व्यक्तियों में से एक थे।
श्रेष्ठता की कसौटी को लेकर हमारे साहित्य में रचनाकारों और आलोचकों के दो-तीन बड़े मज़बूत और सुपरिचित खेमे हैं; इनकी मान्यताएँ और दृष्टियाँ अत्यंत सुपरिभाषित हैं और अपने को एक-दूसरे से भिन्न मानने में ही उनकी सैद्धांतिक सार्थकता समझी जाती है, पर एक मामले में दोनों खेमों के सदस्य एक जैसे हैं। वे एक ओर भावुकता-विरोध को एक स्वतः सिद्ध मूल्य मानते हैं और दूसरी ओर अकेले में वे सभी भावुक होने की अपार क्षमता दिखा सकते हैं—सब नहीं तो अधिकांश। उन्हीं अधिकांश में एक मैं भी हूँ।
ऐसे पुण्यवान् कवीश्वर सदा ही उत्कृष्टता के कारण विजयी हैं; जो रससिद्धि को पाए हैं, क्योंकि उनके यशरूपी शरीर में ज़रा-मरण का भय नहीं है।
आसाधारण (महा)—कवियों के काव्यरूपी प्रयोगों के अनुरूप ही काव्यों को ले चलना चाहिए। पूर्ण सादृश्य कहीं देखा गया है, जैसा ‘रादमित्र’ में कहा गया है।
महान लेखक हमेशा बनते नहीं, बनाए भी जाते हैं।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere