अकेले स्वादिष्ट भोजन न करे, अकेले किसी विषय का निश्चय न करे, अकेले रास्ता न चले और बहुत से लोग सोए हों तो उनमें अकेला जागता न रहे।
फूलों के गुच्छों के समान स्वाभिमानी मनस्वी पुरुषों की भी दो तरह की स्थिति होती है, या तो समाज में सर्वोपरि स्थान प्राप्त करते हैं, या समाज से दूर रहकर एकांत में अपना जीवन व्यतीत करते हैं।
क्या आपको नहीं लगता कि सब कुछ और हर किसी से छुटकारा पाकर बस किसी ऐसी जगह चले जाना अच्छा होगा जहाँ आप किसी व्यक्ति को नहीं जानते हैं?
सामाजिक रूप से अलग-थलग रहना और अकेलापन; वैसे तो सभी लोगों के कल्याण के लिए हानिकारक है, लेकिन बुज़ुर्गों पर विशेष रूप से असर डालता है।
मैं बारिश की याद के साथ, अचानक फिर से धूप वाले रास्ते पर अकेली रह गई हूँ।
श्रद्धालु अपने भाव में संसार को भी सम्मिलित करना चाहता है, पर प्रेमी नहीं।
यह कैसे हो सकता है कि कोई अपना रास्ता चुने भी, और उस पर अकेला भी न हो। राजमार्ग पर चलने वाले रास्ता नहीं चुनते; रास्ता उन्हें चुनता है।
अकेले रहो, अकेले रहो। जो अकेला रहता है, उसका किसी से विरोध नहीं होता, वह किसी की शांति भंग नहीं करता, न दूसरा कोई उसकी शांति भंग करता है।
अकेले रहने पर ही मैं अधिक अच्छी तरह से कार्य कर सकता हूँ, और जब मैं संपूर्णतः निःसहाय रहता हूँ, तभी मेरी देह एवं मन सबसे अधिक अच्छे रहते हैं।
यदि तेरी पुकार सुनकर कोई न आए तो तू अकेला ही चल।
नदी, नाव और निभृत एकांत—युवा प्रेमियों को भला और क्या चाहिए।
व्याकुलता का अर्थ विज्ञापन नहीं, बल्कि हृदय की एकांत उद्दाम आकांक्षा है।
अकेले होने और अकेलेपन में फ़र्क़ है।
एकांत में आदमी के विद्रूप होने की चर्चा या संभावना होती है।
वही सबसे तेज़ चलता है जो अकेला चलता है।
जब कोई व्यक्ति अकेला हो जाता है, तो उसे यह ग़लतफ़हमी होती है कि वह सही रास्ते पर है। लेकिन अपनी मर्जी से अकेले रहना बेहतर है, क्योंकि अकेलेपन को महसूस किए बिना अकेले रहना बेहतर है।
अकेले आदमी की रक्षा ईश्वर करता ही है, इसीलिए उसे ‘निर्बल के बल राम’ कहा जाता है।
जो इच्छाओं से अभिभूत हैं, वे मर्त्य लोक में क्या, स्वर्ग में भी शांति नहीं पाते। तृष्णावान को काम से तृप्ति नहीं होती, जैसे हवा का साथ पाकर अग्नि की ईंधन से तृप्ति नहीं होती।
जब भी तुम अकेले हो; अपने आप को याद दिलाओ कि ईश्वर ने बाकी सभी को दूर भेज दिया है, ताकि केवल तुम और वह हो।
जब भी कोई ऐसा व्यक्ति सड़क पर नज़र आता है; जो अपने कपड़ों या चाल की वजह से दूसरों से फ़र्क़ नज़र आता है, तो अपने सैकड़ों सिरों को उसकी तरफ़ घुमाकर 'भीड़' उसे सवालिया निगाहों से घूरती है।
निःसंग मनीषी का अकेलापन उस व्यक्ति का अकेलापन है जिसे ईश्वर में विश्वास नहीं है। धर्म में जिसकी आस्था नहीं है और सभ्यता के सभी मूल्यों को जो शंका की दृष्टि से देखता है।
एकांत को आत्ममंथन का अवसर मानकर गले लगाइए।
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उपेक्षित पड़े रहने का सुख आज के समय में दुर्लभ हो गया है।
जैसे ही मुझे यह एहसास होने लगता है कि मैं इस ब्रह्मांड से अलग हूँ, तब सबसे पहले भय आता है और फिर दुःख।
अकेला महसूस कराने वाले लोगों के साथ होने से अच्छा है अकेला होना और ख़ुश रहना।
विचार ही अकेलेपन का भी सृजन करता है, किन्तु यह अकेलेपन को पसंद नहीं करता। इसलिए यह इससे पलायन करने के मार्गों का आविष्कार कर लेता है।
व्यक्ति के समस्त साधन जब उसे किसी शांति की ओर ले जाते हैं, तब उसका एकांतिक हो जाना कोई आश्चर्यजनक बात नहीं है
प्रत्येक वस्तु जो जीवित है, न तो अकेली जीवित है और न अपने लिए ही जोवित है।
मनुष्य की ऐकांतिक दशा भी समाज के लिए विचारणीय होती है, बशर्ते कि उसका कोई सामाजिक परिणाम हो या सामाजिक प्रभाव हो।
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कौन मनुष्य किसका बंधु है? किसको किससे क्या प्राप्त होता है? प्राणी अकेला ही उत्पन्न होता है और अकेला ही नष्ट हो जाता है।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere