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अधिक श्रेष्ठ बनने का प्रयत्न करने वाले जीवन से श्रेष्ठतर जीवन नहीं हो सकता; और स्वच्छ अंतःकरण होने से बढ़कर अधिक समानुकूलता वाला जीवन नहीं हो सकता।
दर्शन का वास्तविक विषय मृत्यु है। सच्चा दार्शनिक मृत्यु के लिए इच्छुक रहता है, क्योंकि दार्शनिक ज्ञान चाहता है और इस शरीर में रहते हुए सच्चे ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो सकती। इसका अर्थ यह नहीं कि आत्महत्या करने से हमें मुक्ति मिल सकती है। आत्महत्या से तो जिस ईश्वर ने हमें शरीर-रूपी कारागार में डाला है, उसके नियमों का उल्लंघन होगा। ज्ञान-प्राप्ति की दृष्टि से मृत्यु का स्वागत करो।
मनुष्य को चाहिए कि वह जिस स्थिति में भी हो, मृत्यु की परवाह न करके कर्तव्य का पालन करे। मृत्यु की अपेक्षा अधर्म से अधिक डरना चाहिए।
मनुष्य को अंधे के समान जीवन-यापन नहीं करना चाहिए, जीवन के तत्वों की मीमासा करनी चाहिए। अपरीक्षित जीवन जीने योग्य नहीं।
शारीरिक सुखों और दुःखों के प्रति अनासक्त रहना ही वास्तविक मृत्यु है। आत्मा को शरीर से पृथक् रखने का सतत प्रयत्न ही मृत्यु का अभ्यास है।
किसी कार्य को करते समय मृत्यु की चिंता छोड़कर, उसके औचित्य और अनौचित्य की चिंता करनी चाहिए।
धार्मिक मनुष्य का कभी भी अशुभ नहीं हो सकता, ईश्वर उसकी रक्षा करता है।
आत्मा को पूर्णत्व तक पहुँचाना, मनुष्य का परम और प्रथम धर्म है।
मैं ज्ञान नहीं सिखाता, ज्ञानी तो केवल ईश्वर ही है। मैं तो लोगों के ज्ञानाभिमान को नष्ट कर, उनको अपने अज्ञान का परिचय कराता हूँ। अपने अज्ञान को जानना ज्ञान का प्रथम चरण है।
धन से जीवन धार्मिक नहीं होता, बल्कि धर्म से धन प्राप्त हो जाता है।
आत्मा अमर है। आत्मा का पुनर्जन्म होता है और मनुष्य के इस जन्म के कर्त्तव्यों के अनुसार, उसे दूसरे जन्म में पुरस्कार और दंड मिलते हैं।
मनुष्य अपनी हानि स्वयं आप ही करता है, अपने कार्यों द्वारा। दूसरा मनुष्य मेरी कोई हानि नहीं कर सकता। ईश्वर सज्जन पुरुष को दुर्जन द्वारा पीड़ित नहीं करा सकता।
धर्म केवल बाह्याचरण नहीं है, धर्म ज्ञानमूलक होता है।
मृत्यु की अपेक्षा दुष्टता से बचना कठिन है, इसलिए मनुष्य को अपनी मृत्यु से अधिक दुष्टता से बचने का प्रयास करना चाहिए।
पहले आत्मा की प्राप्ति करो, उससे सब कुछ प्राप्त हो जाएगा।
हानि की आशंका से प्रेरित होकर, मृत्यु का स्वागत करना बहादुरी नहीं हैं।
बुराई का बदला बुराई से चुकाना कभी उचित नहीं।