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Rajendra Mathur

1935 - 1991 | مدھیہ پردیش

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باعتبار

जैसे उपन्यास का सच संसार के सच से ज़्यादा सच्चा होता है, उसी तरह हमारा पुराण-सत्य, हमारा मिथक-सत्य—आपके इतिहास-सत्य से कहीं ज़्यादा ऊँचा है।

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महाभारत कोई धर्मग्रंथ नहीं है। वह इस ज़मीन के बाशिंदों के अनुभवों का निचोड़ है और होमर या शेक्सपीयर की तरह का सार्वकालिक और पंथ-निरपेक्ष है।

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मध्य युग के यूरोप को काफ़ी स्थिरता सामंतवाद ने दी। सैकड़ों सालों तक सामंतों के ख़ानदान चला करते थे, और राजा प्रायः उन्हें छू नहीं सकता था। राज्य राजा के भरोसे नहीं, बल्कि सामंतों के भरोसे चलता था। लेकिन भारत में ऐसा सामंतवाद कभी रहा ही नहीं। हमारे यहाँ सिद्धांत यह था कि राज्य की सारी ज़मीन का स्वामी राजा है। सामंत की कोई ज़मीन नहीं है। जो है, वह राजा का प्रसाद है। अतः राजा जब चाहे, तब सामंत या रियाया को ज़मीन से बेदख़ल कर सकता है। फिर घटनाएँ प्रायः राजा को भी बेदख़ल कर देती थीं। ऐसे सतत गड़बड़झाले के बीच कोई टिकाऊ राज्य कैसे क़ायम हो सकता था?

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भारत की सभ्यता अद्भुत इस माने में रही है कि इतना स्थिर समाज, इतनी सदियों तक चीन के अलावा और कहीं क़ायम नहीं रहा। लेकिन इस सामाजिक स्थिरता के साथ-साथ; जितनी राज्य-गत अराजकता और अस्थिरता भारत में रही है, उतनी पृथ्वी पर और कहीं नहीं रही।

जनसंघ के अंधविश्वासी लोग कहते हैं कि गाय भारतीय संस्कृति की अंग है, तो वह जानते नहीं कि अनजाने में कितनी बड़ी सच्चाई कह गए हैं।

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धर्म के बिना तो हिंदुस्तान का या किसी भी देश का काम चल सकता है; लेकिन एक साझा मिथकावली के बिना, किसी देश का काम नहीं चल सकता।

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यदि कोई वामपंथी विशेषज्ञ यह नुस्ख़ा सुझाए कि आप महाभारत की कथाओं को अपनी याददाश्त से बाहर निकाल दीजिए और फिर देश बनाइए, तो यह काम ब्रह्मा और विश्वकर्मा मिलकर भी नहीं कर सकते।

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हमारे हिंदू गुणों-अवगुणों को नई दिशा में कौन मोड़ेगा? हमारी एक बाँह को लकवा मार गया है और दूसरी बाँह में रक्त बह रहा है। क्या ऐसा कोई उपाय है, जिसके द्वारा हमारी बेकार बाँह भी रक्तप्रवाह के नियम सीख सके?

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ईश्वर के रूप में राम का परित्याग करके भारत का काम चल सकता है, लेकिन एक संस्कृति-पुरुष के नाते, एक काव्य-प्रतीक के नाते, राम का परित्याग करके कैसे काम चल सकता है? एक नास्तिक, विदेशी समाजशास्त्री जितनी संवेदना राम के चरित्र को दे सकता है; यदि उतनी भी हम देंगे, तो क्या राष्ट्र को तोड़ने के पाप के भागी बनेंगे?

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ए.एल. बाशम के अनुसार, प्राचीन भारत में अराजकता और अस्थिरता का सबसे बड़ा कारण यह था कि हर राजा के दिमाग़ में यह कीड़ा घुसा हुआ था कि पड़ोसी पर हमला करना मेरा धर्म है। सबके सब चक्रवर्ती सम्राट् बनकर राजसूय यज्ञ करना चाहते थे। बनते बहुत कम थे, लेकिन लड़ते सब रहते थे। दो गज ज़मीन पर क़ब्ज़ा करते और चारणों से कहलवा लेते कि सारी पृथ्वी आपके भय से काँपती है। भारतीय समाज ने समन्वय, सहिष्णुता और क्रमशः विलय का अद्भुत पाचन-यंत्र विकसित कर लिया था, लेकिन राजाओं के बीच सहअस्तित्व का कोई शास्त्र, प्राचीन भारत ने विकसित नहीं किया। गीता के अर्जुन के बावजूद परंपरा निरंतर युद्धों की थी। अहिंसक और शाकाहारी भारत ने अपने समाज में गृहयुद्धों को वर्जित करने की कोई युक्ति नहीं सोची।

आर्यों के ज़माने में भारत स्वयं एक महाकाव्य था, जबकि आज जो हिंदुस्तान हम देखते हैं वह उस महाकाव्य का सड़-बुसा, फफूंद लगा संस्करण है।

राज्य तो चमचों से टिक सकता है, डाकुओं से।

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राष्ट्र को छोड़िए, लेकिन अवचेतन को समाप्त करके कोई व्यक्ति तक होश, समझदारी और पहचान नहीं पा सकता।

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जाति-प्रथा भारत के बीजों पर अंकित है। उसे बदलना हो, तो बीज-सुधार का एक लंबा कार्यक्रम हाथ में लेना होगा। विकासवाद का कहना है कि कोई भी जीव-जंतु दो तरीक़ों से बदलता है या तो अनुकूलन से या उत्परिवर्तन से। अनुकूलन की प्रक्रिया लंबी होती है।

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धर्म और कविता में अंतर स्पष्ट है। कविता हृदय की सहज संवेदना है (इस घिसी-पिटी परिभाषा के लिए पाठक क्षमा करें), जबकि धर्म एक रूढ़ि है।

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संसद को संविधान का दुश्मन मानकर आप संविधान की रक्षा कैसे कर सकते हैं? जनता को जनतंत्र का दुश्मन मान लिया जाए, तो फिर जनतंत्र की रक्षा कैसे होगी?

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जो आदमी पूर्व में असंबद्ध प्रतीत होने वाले तथ्यों के बीच नया रिश्ता जोड़ता है; वह आइन्सटाइन जैसा महान् वैज्ञानिक होता है, अथवा गांधी और लेनिन जैसा सामाजिक क्रांतिकारी।

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जब हम कविता की तीव्रता और ताज़गी लेते हैं और उस भावना को बनाए नहीं रख पाते, तो हम रूढ़ि अपना लेते हैं और उस भावना को खोखली श्रद्धांजलि अर्पित करने लगते हैं, जो किसी समय थी।

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गांधी ने भारत की प्रेतभाषा को पढ़ा और प्रेतों से वार्तालाप करके उन्हें मनुष्य जैसा बर्ताव करना सिखाया। लेकिन प्रेतों को याद ही नहीं कि गांधी उनसे मिला था। वे मंत्र के इशारे पर नाचते हैं, लेकिन उच्चार बंद होते ही उन्हें याद नहीं रहता कि मंत्र था।

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आर्यों के ज़माने में गाय एक कविता थी, लेकिन भारत के पतन के साथ वह एक धर्म बन गई।

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उच्चतम न्यायालय का एक बड़ा फ़ैसला आज जितना अर्थगर्भित होता है, उतना पहले सदियों का चिंतन नहीं होता था।

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भारत की समाजेंद्रिय शायद इतनी अधिक विकसित हो चुकी थी कि राज्येंद्रिय को विकसित करने की यहाँ के लोगों को कभी ज़रूरत ही महसूस नहीं हुई।

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अँग्रज़ों के आने से पहले का हिंदुस्तान अपने-आपके साथ क़िस्म-क़िस्म के राजनीतिक प्रयोग करने वाला हिंदुस्तान नहीं था।

धर्म का विनाश संभव है, लेकिन मनुष्य जाति की पुराण-चेतना का विनाश आज तक संभव नहीं हुआ।

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भारत एक धार्मिक देश है, जिसने अपनी कविता खो दी है।

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गांधी के बावजूद मुस्लिम लीग ने कांग्रेस से पाकिस्तान ले लिया, लेकिन वामपंथी कुछ नहीं ले पाए।

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गांधी ने भारत के मर्म को छुआ, लेकिन भारत का मर्म किसी पार्थिव चीज़ को छूता है, पता पाता है।

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महान विचार ही देश में वह अनुशासन पैदा कर सकता है, जिसके प्रति करोड़ों लोग स्वेच्छा से समर्पित हों।

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क्या यह आश्चर्यजनक नहीं है कि हिंदू धर्म ने जिस देश में हर आदमी की हर साँस को हज़ारों साल से क़ायदे-क़ाननों में बाँध रखा है, उस देश में 1947 के बाद ऐसी कोई नैतिकता नहीं पनपी, जो हमारे राज्य को तथा राजनीति को बाँध सके?

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भारत में जो समानांतर संविधान चल रहे हैं वे तेल और पानी की तरह एक-दूसरे से अलग-थलग हैं। जिस गुठली से हिंदू जाति पैदा हुई है, वह राजनीति-निरपेक्ष है।

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जो आप ज़िंदगी में नहीं करते, वह विचार के धरातल पर बहुत साधिकार नहीं कर सकते।

सांसारिक मोर्चे पर जब देश पराजित हो गया, तो उसके बुद्धिवादी लोग आध्यात्मिक बन गए और औसत लोग रूढ़िवादी हो गए। चोर का ख़तरा होने पर हमने अपने सांस्कृतिक दरवाज़े कसकर बंद कर दिए, बच्चों को बाहर झाँकने से मना किया और दम साधकर बैठ गए। इससे हमारी रक्षा तो हो गई। लेकिन हज़ार साल तक साँस रोके बैठने से हम बदल चुके हैं। हम वे नहीं हैं, जो हम खुले दरवाज़ों के ज़माने में थे। चोर चले गए, लेकिन हमारे दरवाज़े बंद हैं। रोशनी से हमारी आँखें चौंधियाती हैं और खुली हवा में हमें ज़ुकाम होता है।

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भारत में वर्ग-संघर्ष होने का कारण यह है कि अपने वर्ग-चरित्र का सबने त्याग कर दिया है, और वर्तमान व्यवस्था में सबके निहित स्वार्थ फँसे हुए हैं।

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गाय भारत के निराश भक्तियुग की प्रतीक है।

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जब चोर का भय हो, तब कोई संस्कृति बन ही नहीं सकती। तब केवल बनी हुई संस्कृति की चौकीदारी होती है और चौकीदारी लोग बहुत सुसंस्कृत नहीं होते।

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कांग्रेस क्योंकि पूरी तरह जनाधारित थी, इसलिए वह भारत की जनता की तरह ही परिभाषाविहीन थी। यदि वह एकांगी होती तो कोई लेनिन या माओ उसे ज़रूर मिलता, जो किताब लिखकर उसे रणनीति देता। लेकिन कांग्रेस परिभाषाहीन थी, इसलिए उसे परिभाषा देने की सबसे आज़ादी थी।

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समाज हमारा हिमाचल की तरह अटल रहा, लेकिन राजा और राज्य समुद्र की लहरों की तरह क्षणभंगुर रहे। ऐसा क्यों हुआ? चक्रवर्ती राजा की अवधारणा होते हुए भी सच्चे चक्रवर्ती यहाँ एक हाथ की उंगलियों पर आसानी से क्यों गिने जा सकते हैं? चीन की तरह एक अखंड देश और अखंड समाज हम यहाँ क्यों नहीं बना सके?

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भारत में जीवन ही मूल्य है, गया-बीता, घिघियाता जीवन ही मूल्य है; लेकिन ज़िंदादिली मूल्य नहीं है, अच्छा जीवन मूल्य नहीं है। मरने से तो गया-बीता जीवन ही अच्छा है, यह हमारा उद्देश्य वाक्य है। क्या कुरुक्षेत्र में कृष्ण ने यही उपदेश दिया था?

भारत का इतिहास, क्रमिक अनुकूलन का सबसे अच्छा नमूना है। कछुए या शतुरमुर्ग़ की तरह हमने ऐसे अवयव विकसित किए कि विपरीत से विपरीत आँधी भी हमारे ऊपर से गुज़र गई।

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केवल भारत दुनिया में ऐसा देश है जो अपनी हिंदू नैतिकता क्रमशः खो रहा है, लेकिन जो राज्य-संचालन के लिए ज़रूरी नई नैतिकता नहीं अपना पाया है।

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गाय को भी हम माता मानेंगे, लेकिन अपनी उपेक्षा से उसके कंकाल बना देंगे। मूलतः यह रवैया अधार्मिक और अनार्य है, लेकिन वह भारतीय है। भारत मूलतः एक अनार्य और अधार्मिक देश है।

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अवसर की समानता विश्व के अमीर देशों की साँस है।

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एक सभ्यता कई राज्यों में बँटी हुई हो सकती है, और वे राज्य इस हद तक एक-दूसरे से लड़ते रह सकते हैं कि सभ्यता के ख़त्म होने का ख़तरा पैदा हो जाए। यूनानी सभ्यता के साथ ऐसा ही हुआ।

पाकिस्तान कोई ख़ुराफ़ात कर सके, इसके लिए यह भी ज़रूरी है कि स्वयं भारत अपने इतिहास से मुक्त हो।

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राज्य के दायरे में नागरिकों को नियमित और संचालित करने के लिए भारत के पास कोई समग्र सामाजिक नैतिकता आज है, पहले कभी रही। लेकिन गाँव और जाति और कुनबे के दायरे में, हर आदमी की हर साँस को नियमित करने वाली नैतिकता सदियों से हमारे साथ है—उसे राजा भी मानते रहे और दीवान भी।

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समाज-निर्माण का एक अद्भुत साँचा क्योंकि हमारे पास था, इसलिए यह लगभग अनिवार्य था कि किसी और जगह हम बिल्कुल अपंग रह जाएँ।

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कविता एक झरना है, जबकि धर्म उस झरने की याद दिलाने वाला सूखा, रेतीला रास्ता है।

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राणा प्रताप ने कहा था कि ग़ुलामी के सदाचार से आज़ादी का भ्रष्टाचार अच्छा है। मजबूरी के महात्मापन से स्वच्छंद गुंडापन लाख गुना बेहतर है। एक नदी सूखी है और एक बाढ़ से उफ़नती हुई। सूखी नदी में पानी आना मुश्किल है, लेकिन उफ़नती नदी कभी तो किनारों का अनुशासन पहचानेगी।

शाप हमें यातना देता है, हमें मांजता है और इस योग्य बनाता है कि हम शुद्ध होकर शाप से उबरें। इसीलिए शाप पवित्र है और शिरोधार्य है।

भारत में वर्ग-संघर्ष अनुपस्थित क्यों है, इसका उत्तर पाने के लिए यह पूछना ज़रूरी है कि भारत पर आजकल किन वर्गों का राज है? कौन राजा हैं हमारे? राजा अनेक हैं। पूँजीपति भी राजा है, मध्यवर्गीय सफ़ेदपोश भी राजा है और मिलों के मज़दूर तो हैं ही।

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हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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