Font by Mehr Nastaliq Web
noImage

Madhavdev

1489 - 1596 | اتر پردیش

کی

باعتبار

हे हरि! आपने अपने नाम को स्वयं से भी बढ़ा दिया, अपनी सब शक्ति उसमें भर दी। उसके स्मरण के लिए काल के नियम भी नहीं बनाए। ऐसी तुम्हारी कृपा हुई परंतु मेरा दुर्भाग्य तो देखो कि तुम्हारे नाम के प्रति मुझमें अनुराग ही नहीं उत्पन्न हुआ।

  • विषय :
    اور 4 مزید

व्यवहार में गंभीरता, वचन में गंभीरता और भावों में गंभीरता—इन तीन गंभीरताओं के साथ कृष्ण का स्मरण करें तो महामंगल मिलेगा।

  • विषय :
    اور 3 مزید

उग्र तप, ज्ञान, गुण विकास, यज्ञ, योग, दान, पुण्य आदि सबका प्रयोजन ही क्या है जब तक सब जगत् के निज आत्मा, मोक्ष-सुख देने वाले इष्ट देव कृष्ण के चरणों में भक्ति नहीं?

  • विषय : 1
    اور 2 مزید

जिन्हें मुक्ति की इच्छा नहीं, ऐसे महान भक्तों को प्रणाम है।

  • विषय :
    اور 1 مزید

हे नारायण! तुम नित्य और निरंजन (पवित्र) हो। मैं भी तुम्हारा अंश हूँ।

मेघों से ढके हुए सूर्य वाला दिन 'दुर्दिन' नहीं है, उसी दिन को दुर्दिन कहो जिस दिन भगवान् की कथा का अमृतमय सुंदर आलाप-रस सुनायी नहीं पड़ता।

  • विषय : 1
    اور 2 مزید

कर्ण-मार्ग से भक्त के हृदय में हरि प्रवेश करते हैं।

  • विषय : 1
    اور 1 مزید

सुवासना और दुर्वासना—ये दोनों मोक्ष और बंधन के मूल कारण हैं।

  • विषय : 1

यदि तुम ईश्वर को पाना चाहते हो तो बुद्धि को सात्त्विक करो।

  • विषय : 1

हे भगवान! तुम भक्त-कल्पतरु हो। तुम अंतर्बाह्य गुरु हो। मुझे अपने चरणों में रक्षण दो, मुझे सेवा-रस-सार दो।

  • विषय : 1

Recitation

हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

रजिस्टर कीजिए