साहित्य का विषय व्यक्तिगत होता है, श्रेणीगत नहीं। यहाँ पर मैं ‘व्यक्ति’ शब्द के धातुमूलक अर्थ पर ही ज़ोर देना चाहता हूँ।
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एक बार जब बुराई व्यक्तिगत हो जाती है, रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बन जाती है तो उसका विरोध करने का तरीक़ा भी व्यक्तिगत हो जाता है। आत्मा कैसे जीवित रहती है? यह आवश्यक प्रश्न है। और उत्तर यह है : प्रेम और कल्पना से।
व्यक्तिगत स्वतंत्रता बड़ी अच्छी चीज़ है, बड़ी अच्छी और अत्यंत ऊँची; परंतु राष्ट्र की स्वाधीनता प्राप्त करने के लिए उसे संकुचित कर देना एक ऐसा त्याग है, जिसकी समता नहीं हो सकती, जो सब त्यागों में श्रेष्ठ है।
जो लोग निर्णय लेते हैं उन्हें किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व के सभी पहलुओं को ध्यान में रखना चाहिए।
जो केवल अपने विलास या शरीर-सुख की सामग्री ही प्रकृति में ढूँढ़ा करते हैं, उनमें रस रागात्मक 'सत्त्व' की कमी है, जो व्यक्त सत्ता मात्र के साथ एकता की अनुभूति में लीन करके, हृदय के व्यापकत्व का आभास देता है।
व्यक्तिगत सुख विश्व वेदना में घुल कर जीवन को सार्थकता प्रदान करता है और व्यक्तिगत दुःख विश्व के सुख में घुल कर जीवन को अमरत्व।
‘विचार और कार्य की स्वतंत्रता ही जीवन, उन्नति और कुशल-क्षेम का एकमेव साधन है।’ जहाँ यह स्वतंत्रता नहीं है, वहाँ व्यक्ति, जाति, राष्ट्र की अवनति निश्चय होगी।
यह जगत का निजी अनुभव है कि आधी छटाँक-भर आचरण का जितना फल होता है उसका मन-भर भाषणों अथवा लेखों का नहीं होता।
जिस प्रकार कला अपने आभ्यंतर नियमों के कठोर अनुशासन के बिना अपंग या विकृत होती है; अथवा अभाव बनकर रहती है, उसी प्रकार व्यक्ति-स्वातंत्र्य अपनी अंतरात्मा के कठोर नियमों के अनुशासन के बिना—निरर्थक और विकृत हो जाता है, खोखला हो जाता है।
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हम जब अपने निजी जीवन से संबंधित किसी प्रसंग की चर्चा करते हैं, तब उसे हम उस दृष्टि से देखते हैं, जिस प्रकार कोई माँ अपने पुत्र को देखती है।
अभिमान एक व्यक्तिगत गुण है, उसे समाज के भिन्न-भिन्न व्यवसायों के साथ जोड़ना ठीक नहीं।
डरावनी बात यह है कि जो लोग अपने निजी दायरे में पागलपन करते हैं, वे सार्वजनिक रूप से बिल्कुल ही मासूम और सहज भाव भंगिमा के साथ हो सकते हैं।
विशेष भाव-प्रसंगों की रूपरेखाओं की विस्मृति और प्रणय-जीवन के वास्तविक मनोवैज्ञानिक चित्रों की कमी यह सूचित करती है कि विशुद्ध व्यक्तिनिष्ठता अपने ही उद्देश्य को पराजित कर देती है।
वैर का आधार व्यक्तिगत होता है, घृणा का सार्वजनिक।
किसी प्रतिभाशाली ग्रंथकार की स्थिति, अपने ही काल और अपने ही व्यक्तित्व से सीमाबद्ध नहीं होती।
ईर्ष्या व्यक्तिगत होती है और स्पर्द्धा वस्तुगत।
निहायत वैयक्तिक प्रयोजन से ही पीड़ित रहने वाले की उदासी रचनात्मक ऊर्जा को निरंतर चबाती रहती है।
वैयक्तिकता ऐसी चीज़ है जो विभाज्य नहीं है, जिसे खंडित नहीं किया जा सकता।
व्यवसायी के नाते मैं जानता हूँ कि टेलीविज़न अब तक बने माध्यमों में सबसे समर्थ विज्ञापन-माध्यम है, और मैं अपनी अधिकांश जीविका इसी से अर्जित करता हूं। किंतु, व्यक्तिगत तौर पर यदि मुझे व्यापारिक व्यवधानों के बिना टेलीविज़न देखने का विशेषाधिकार मिले तो मैं उसके लिए प्रसन्नतापूर्वक धन दूँगा।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere