प्रेम पर कवितांश
प्रेम के बारे में जहाँ
यह कहा जाता हो कि प्रेम में तो आम व्यक्ति भी कवि-शाइर हो जाता है, वहाँ प्रेम का सर्वप्रमुख काव्य-विषय होना अत्यंत नैसर्गिक है। सात सौ से अधिक काव्य-अभिव्यक्तियों का यह व्यापक और विशिष्ट चयन प्रेम के इर्द-गिर्द इतराती कविताओं से किया गया है। इनमें प्रेम के विविध पक्षों को पढ़ा-परखा जा सकता है।
प्रेम के तत्त्व पर आधृत
तन ही प्राणवंत है प्रेम
प्रेमहीन शरीर कंकाल मात्र है—
चमड़े से मढ़ा
प्रेम का स्पर्श एक लंबी नींद है
प्रेम के सारे आवेग असभ्य ही होते हैं
यदि आँख न ही खुले तो अच्छा है
मेरे प्रियतम, जो स्वप्न में आते हैं
मुझसे कभी नहीं बिछुड़ेंगे
नींदों ने बहुत प्रेम छीने हैं
इस पृथ्वी पर जो गृहस्थ
धर्मनिष्ठ रहता है
वह स्वर्ग के देवगणों के
सदृश पाता है सम्मान
नायिका बिछुड़ने पर जला देती है
निकट जाने पर शीतलता प्रदान करती है
इस बाला ने इस प्रकार की
विचित्र आग कहाँ से पाई ?
देखना, स्पर्श करना,
सूँघना, सुनना, अनुभव करना—
पंचेंद्रियों का सुख
नायिका से पूर्ण रूप से मिल जाता है
जितना उसके बारे में जानते हैं
उतना ही उसके बारे में कम जानकारी मिलती है
उस नायिका से अधिकाधिक सुख मिलने पर
उतना ही उसके बारे में जान पाते हैं
आग तो छूने पर ही जला सकती है
किंतु काम-ज्वर तो बिछुड़ने पर जलाता है
आत्मा और शरीर के सदृश
मुझमें और उस नायिका में अंतरंगता है
अपनी प्रिय नायिका के सुकोमल कंधों पर
सोने वाले को जो आंनद मिलता है
वह अपने आपमें परम सुखोप्लब्धि है
मधु पीने पर ही नशीला प्रतीत होता है
पर काम तो
दर्शन मात्र से उन्मत्त कर देता है
प्रेमशून्य व्यक्ति
अपने लिए सब कुछ बटोरते हैं
प्रेमी जन जो दूसरों के होते हैं
अपना सब कुछ—अस्थि तक—
बलिदान कर देते हैं।
प्रियतम का दूत
मेरे स्वप्न में आया
मैं उसका अतिथि-सत्कार
किस प्रकार करूँ?
दूसरों से हिल-मिलकर
प्रसन्नता से जो नहीं रह सकते
उन्हें यह बड़ा विश्व
दिन में भी
रात के सदृश अंधकारमय है
सभ्यताओं की घाटियों का पहला झूठ था प्रेम
मैं जीवित हूँ इसलिए
कि उसके साथ सुख के कुछेक दिन मैंने बिताए
उन्हीं के सुखदायी क्षणों का स्मरण कर
जीवित हूँ मैं
वरना जीवित नहीं रह पाती
मेरे पौरुष के सम्मुख टिक नहीं सकते
दुश्मन युद्ध-भूमि में
लेकिन उस नायिका के तेजोमय भाल को
देखते ही मेरी शक्ति चूर-चूर हो जाती है
जो दवा बीमारी को दूर कर देती है
वही दवा कभी उल्टा असर भी करती है
लेकिन जो रोग उस नायिका के कारण हुआ
उसकी दवा तो वही है
मैंने अपनी प्रियतमा से कहा,
मैं तुमको सबसे बढ़कर प्यार करता हूँ
इसे सुनकर वह बहुत ग़ुस्से में भर गई
और रूठकर कहने लगी,
फिर तुम किस-किसको प्यार करते हो भला?
जब मैं प्रियतम को देखती हूँ
उसका कुछ भी दोष दिखाई नहीं पड़ता
और उसको न देख पाऊँ
तो दोष को छोड़कर
मुझे कुछ भी नहीं दिखाई पड़ता
सभी स्त्रियाँ समान भाव से
तुम्हें सौंदर्य-पान के लिए निहारा करती है
इसलिए तुम्हारे वक्ष से लगकर
मैं तुम्हारा आलिंगन नहीं करूँगी
अगर वह मुझसे बिछुड़कर नहीं जाते
तो यह समाचार मुझे बताओ
प्रियतम के वापस आने के आश्वासन पर
जो जीते रहते हैं, उनसे कहो
मैं उसकी ओर दृष्टिपात करूँ
तो वह सिर झुकाकर
ज़मीन को देखती है
उसकी ओर न देखने पर
वह मुझे देख गद्गद् हो उठती है
मेरे न देखते समय
उसने मुझे देखा
देखने पर उसने सिर झुका लिया
यही हमारे प्रेम-बिरवे को
पल्लवित करने के लिए मृदु जलसिंचन है
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