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Noam Chomsky

1928 | دوسرا

کی

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मुझे लगता है कि जीवन के हर आयाम में सत्ता, अनुक्रमों और राज करने की कोशिश में लगे केंद्रों को पहचानने की कोशिश करनी चाहिए और उनको चुनौती देनी चाहिए। जब तक उनके होने का कोई जायज़ हवाला दिया जा सके, वे ग़ैरक़ानूनी हैं और उन्हें नष्ट कर देना चाहिए। मनुष्य की आज़ादी की उम्मीद इससे ही बढ़ेगी।

टेलीविज़न पर बड़े कॉर्पोरेट विज्ञापनदाता शायद ही कभी ऐसे कार्यक्रमों को प्रायोजित करते हैं जो कॉर्पोरेट गतिविधियों की गंभीर आलोचनाओं में संलग्न होते हैं, फिर चाहे पर्यावरण के स्तर में गिरावट की समस्या हो, चाहे सेना या औद्योगिक क्षेत्र के कामकाज के तरीक़े पर कोई बात कर रहा हो या कोई, तीसरी दुनिया में होने वाले तानाशाही रवैये के कॉर्पोरेट समर्थन और उनके द्वारा उठाए जाने वाले लाभ पर बात करे।

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किसी भी प्रॉपगैंडा मॉडल में खुले बाज़ार की मान्यताओं में एक प्रारंभिक विश्वसनीयता होती है। ज़ाहिर तौर पर, प्राइवेट मीडिया, वे बड़े कोर्पोरेट हैं जो अन्य व्यापारों (विज्ञापनदाताओं) को एक प्रोडक्ट (पाठक और दर्शक) बेच रहे हैं। राष्ट्रीय मीडिया केवल अभिजात्य वर्ग के मुद्दों और धारणों पर ध्यान देती है। इससे जहाँ एक तरफ़, विज्ञापनों के चयन के लिए बढ़िया ‘प्रोफ़ाइल’ बनाने में मदद मिलती है, वहीं दूसरी तरफ़ ये निजी और सामाजिक क्षेत्रों में निर्णय-निर्धारण में भी ज़रूरी भूमिका निभाते हैं। अगर राष्ट्रीय मीडिया, दुनिया का एक संतोषजनक यथार्थवादी चित्रण नहीं करती तो वह अपने अभिजात्य दर्शकों की ज़रूरतों को पूरा करने में असमर्थ मानी जाएगी। यही मीडिया, दुनिया की जो व्याख्या करती है, उसमें इन अभिजात्य लोगों से भरे हुए सरकारी और निजी संस्थानों, ख़रीदारों, विक्रेताओं आदि की ज़रूरतों और चिंताओं का चित्रण भी उनका ‘सामाजिक उद्देश्य’ है।

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यह बुद्धिजीवियों की ज़िम्मेदारी है कि वे सच बोलें और झूठ उजागर करें।

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प्रॉपगैंडा आमतौर पर अभिजात्य हितों से बहुत नज़दीक से जुड़े रहते हैं। 1919-20 के ‘लाल डर’ ने दुनिया भर में पहले विश्वयुद्ध के बाद सेल और दूसरे कारख़ानों में चल रहे संघ-निर्माणों को रोकने का काम बहुत अच्छे तरीक़े से किया। इसी तरह ट्रूमन-मैककार्थी के पैदा किए गए ‘लाल डर’ (वामपंथ को अतिवादी बताते हुए लोगों को चेतावनी देना) ने शीतयुद्ध का उद्घाटन करने और युद्ध से जुड़ी एक स्थायी अर्थ-व्यवस्था को खड़ा करने में भारी मदद की… उन्होंने सोवियत संघ से असहमत होने वालों की हालत पर लगातार अपना ध्यान बनाए रखा। यही उन्होंने कम्बोडिया में हो रही दुश्मनों की हत्या और बुल्गारिया से संबंधों के संदर्भ में किया। इससे वियतनाम सिंड्रोम तोड़ने में मदद मिली, सुरक्षा के नाम पर हथियारों की जमाख़ोरी को सही ठहराया जा सका और एक आक्रामक विदेश नीति लागू की जा सकी। और यह सब करके उच्च वर्ग में हो रहे आय के पुनर्वितरण से सबका ध्यान बँटाया जा सका—रीगन की घरेलू आर्थिक नीति की जड़ में यही था।

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इस तंत्र (जो प्रॉपगैंडा को फैलाने में मदद करता है) की ख़ूबसूरती ही यही है कि वह असहमतियों और असुविधाजनक जानकारियों को नियंत्रण में और हाशिए पर रखता है। ताकि उनका होना यह तो तय कर ही दे कि तंत्र अखंड नहीं है, लेकिन ये असहमतियाँ इतनी बड़ी भी हों कि अधिकारिक एजेंडे में कोई मानीख़ेज़ हस्तक्षेप कर सकें।

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हमें नायकों की खोज में नहीं रहना चाहिए। हमें अच्छे विचारों की खोज में रहना चाहिए।

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सकारात्मकता बेहतर भविष्य बनाने की एक नीति है; क्योंकि जब तक आप भविष्य की बेहतरी में यक़ीन नहीं करते, तब तक आप आगे बढ़कर उसे बेहतर करने की ज़िम्मेदारी नहीं लेंगे।

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अच्छे प्रॉपगैंडा का पूरा का पूरा काम यही है। आप एक ऐसा नारा बनाना चाहते हैं जिसके ख़िलाफ़ कोई नहीं जाएगा और जिसका सब समर्थन करेंगे। कोई नहीं जानता उस नारे का क्या मतलब है, क्योंकि उसका कोई मतलब है ही नहीं।

शिक्षा थोपी हुई अज्ञानता का एक तंत्र है।

दुनिया एक रहस्यमय और उलझन भरी जगह है। अगर तुम उलझन में नहीं पड़ना चाहते, तो तुम बस किसी और के दिमाग़ की नक़्ल बन जाते हो।

पश्चिम को एक दिन अपने उन उथले विचारों पर पछतावा होगा, जो लोगों को उनकी वास्तविक प्रकृति से दूर करते हैं।

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इंसान को सही धर्म और सही विश्वास की तलाश करनी चाहिए।

लोगों को क़ाबू करने के लिए, उन्हें यह यक़ीन दिलाओ कि उनकी बदहाली के लिए वे स्वयं ज़िम्मेदार हैं और फिर ख़ुद को उनका रक्षक बताओ।

कोई भी देश ग़रीब देश नहीं होता; बस संसाधनों के प्रबंधन की नाकाम व्यवस्थाएँ होती हैं, जिनकी वजहें उन्हें ग़रीब रखती हैं।

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अगर तुम लोगों को क़ाबू में करना चाहते हो तो एक काल्पनिक दुश्मन बनाओ जो तुमसे ज़्यादा ख़तरनाक लगे, फिर ख़ुद को उनका रक्षक बताओ।

इतिहास को तोड़-मरोड़कर दिखाने का मक़सद यह है कि सिर्फ़ महान् लोग ही बड़ी चीज़ें हासिल करते हैं। इससे लोगों को लगता है कि वे शक्तिहीन हैं और उन्हें किसी महान् व्यक्ति के क़दम उठाने का इंतिज़ार करना चाहिए।

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इतिहास का सबसे साफ सबक़—अधिकार दिए नहीं जाते, उन्हें बलपूर्वक लिया जाता है।

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हमें नायकों की तलाश नहीं करनी चाहिए, हमें अच्छे विचारों की तलाश करनी चाहिए।

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दुनिया में कोई तुम्हारे दिमाग़ में सच्चाई नहीं डालेगा, यह वह चीज़ है जो तुम्हें ख़ुद खोजनी पड़ती है

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हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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