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Dandin

کی

باعتبار

कठिन कार्य का साधन बुद्धि है।

अन्यायपूर्वक दिए गए दंड ने भय और क्रोध को जन्म दिया।

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राजनीति और श्रेष्ठ कर्मों के आरंभ के मूल में धन ही होता है।

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ईश्वरीय शक्ति के सम्मुख मानवी शक्ति बली नहीं है।

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निश्चय ही इस संसार में इच्छारहित प्राणी को संपदाएँ नहीं अपनाती और संपूर्ण कल्याणों की उपस्थिति उनके हाथ में नित्य रहती है जो आलसी नहीं हैं।

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मनुष्यों में अनभ्यास से विद्या का, असंसर्ग से बुद्धिमानों का तथा अनिग्रह से इंद्रियों का विनाश हो जाता है।

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आज्ञा का उल्लंघन करने वाली प्रजा जो मन में आता है, बोलती है और जो मन में आता है, करती है तथा इस प्रकार सभी मर्यादाओं को अस्त-व्यस्त कर देती है। मर्यादारहित समाज इस लोक और परलोक से स्वामी और स्वयं को गिरा देता है।

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गृही के प्रिय और हित के लिए पत्नी के गुण होते हैं।

धन संचय किया, विद्या का ही अर्जन किया, कुछ तप ही संचित किया, और सारी आयु व्यर्थ ही बीत गई।

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अवज्ञा जिसकी बहिन है, वह है दारिद्र्य।

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Recitation

हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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