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पुरुष दुश्मन नहीं है, बल्कि सहचर पीड़ित है। असली शत्रु स्त्रियों द्वारा ख़ुद की आलोचना करना है।
स्त्रियों को पूरी मानव नियति में हिस्सेदारी के बजाय आधे जीवन की तस्वीर को क्यों स्वीकार करना चाहिए?
समस्या हमेशा बच्चों की माँ या मंत्री की पत्नी होने में और—कभी भी—जो हो वह नहीं होने में होती है।
किसी स्त्री—और पुरुष के लिए भी—ख़ुद को तलाशने और एक व्यक्ति के रूप में जानने का एकमात्र साधन, अपना मौलिक कार्य है।
कौन जानता है कि स्त्रियाँ तब क्या हो सकती हैं, जब वे अंततः अपनी मर्ज़ी से जीने के लिए स्वतंत्र हो जाएँगी।
बूढ़ा हो जाना जवानी को खो देना नहीं है, बल्कि अवसर और ताक़त का नया कार्यक्षेत्र है।
जब उसने स्त्रीत्व की पारंपरिक तस्वीर के अनुरूप जीना बंद कर दिया, तब वह आख़िरकार स्त्री होने का आनंद लेने लगी।