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Amrita Pritam

1919 - 2005 | گجرانوالہ, پنجاب

کی

हर कोई जब छाती में बहुत से सपने और माथे में बहुत से ख़याल डाल कर घर से ज़िंदगी ख़रीदने निकलता है, और ज़िंदगी के बाज़ार में ज़िंदगी की क़ीमत सुनता है, तो उसकी छाती में खनकते सब सिक्के बेकार हो जाते हैं।

एक ग़ुस्सा था रुके हुए पानी की तरह जिसके निकलने की कोई राह नहीं थी, इसलिए जहाँ वह रुका हुआ था, उन दीवारों को ही चाट रहा था।

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जीवन बड़ा अजीब होता है। ...कई बार उसकी परतों में से हम जिस रंग को खोजते हैं, वह नहीं निकलता। पर कोई ऐसा रंग निकल आता है जो उससे भी अधिक ख़ूबसूरत होता है।

किसी भी ग़लत ढाँचे से रोष या घृणा स्वयं में जीवन की निशानी है, सदा रही है।

ज्ञान हमेशा किसी को सौंपकर जाना चाहिए।

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हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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