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हिंदी के वर्णवादी अध्यापक इसलिए परेशान है कि अगर कबीर दलित ले गए, तो निर्गुण परंपरा का क्या होगा? सामाजिक एकता समरसता का क्या होगा? द्विवेदी जी का क्या होगा? उस उदारता का क्या होगा, जो हमारे हिंदी साहित्य के इतिहास ने भक्ति काल में पैदा की, जिसमें मानव-मानव एक हो गया।
अलग धर्म चलाना, अलग होना, हिंदू समाज से, वर्णवादी वर्चस्व से अलग होना, मुक्त होना। कबीर इस एजेंडे को देने वाले एक घनघोर राजनीतिक कवि की तरह आते हैं, जो एक ऐसे विचार को बना रहे हैं, जो दलित समाज को हिंदू समाज से बाहर ले जाएगा। दलित लिबरोन का विचार कबीर देते हैं।
कर्ता की एकता और अन्विति ही वह तत्व है, जो सातत्य को बनाता है।
रामचंद्र शुक्ल और द्विवेदी में और इन दिनों संघ की इतिहास की अवधारणाओं में, एक भयानक समानता यही है कि ये सब इतिहास को एक अटूट धारा मानते हैं और कर्ता के भाव को एक अन्विति में पिरोया जाता मानते है, जिसमें कबीर की आलोचना का तत्व एक विरेचक का काम करता है बस।
जब वर्णवादियों ने दलितों को एक देवता तक नहीं दिया, एक मंदिर तक नहीं दिया, न इतिहास दिया, न लिखने दिया—तब नए ग्लोबल स्पेस में दलित विमर्श अपनी जीनियोलोजी बनाएगा और उसे रोकने वाला कोई नहीं होगा।
दलित के सत्ता विमर्श में एक कबीर का, एक अम्बेडकर होना भी अगर नहीं भाता; तो इस नव ब्राह्मणवादी पेटूवाद को क्या कहा जाए, जो कुछ प्रगतिशील दिमाग़ों में भी बैठा हुआ है।
धर्मवीर की विशेषता यही है कि उन्होंने कबीर को वर्णवादी सत्ताविमर्श में 'छीनने' की को रणनीति बनाई है, उसे अब तक कोई भी निंदक सही-सही संबोधित करने में असमर्थ ही रहा है—यह उसकी विजय है।
कबीर के होने न होने से सत्ता बदलती है। कबीर के बदलने से, उसके पाठ के बदलने से सत्ता बदलती है। कबीर जाता है, तो एक इतिहास खंड में विच्छिन्नता पैदा हो जाती है। उसका सातत्य भंग हो जाता है और वेदवादी वर्णवादी गर्व खंडित हो जाता है, और हिंदुत्व के एजेंडे की समस्या बढ़ जाती है।
दलित साहित्य को व्यापक जीवन के दलित विमर्श के भीतर ही पढ़ा जा सकता है। यही दलित की देह गाथा है, जिस पर वर्णवादी इतिहास अपनी इबारत लिखता रहा है।