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Sudhish Pachauri

تمام تمام

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हिंदी के वर्णवादी अध्यापक इसलिए परेशान है कि अगर कबीर दलित ले गए, तो निर्गुण परंपरा का क्या होगा? सामाजिक एकता समरसता का क्या होगा? द्विवेदी जी का क्या होगा? उस उदारता का क्या होगा, जो हमारे हिंदी साहित्य के इतिहास ने भक्ति काल में पैदा की, जिसमें मानव-मानव एक हो गया।

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अलग धर्म चलाना, अलग होना, हिंदू समाज से, वर्णवादी वर्चस्व से अलग होना, मुक्त होना। कबीर इस एजेंडे को देने वाले एक घनघोर राजनीतिक कवि की तरह आते हैं, जो एक ऐसे विचार को बना रहे हैं, जो दलित समाज को हिंदू समाज से बाहर ले जाएगा। दलित लिबरोन का विचार कबीर देते हैं।

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कर्ता की एकता और अन्विति ही वह तत्व है, जो सातत्य को बनाता है।

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रामचंद्र शुक्ल और द्विवेदी में और इन दिनों संघ की इतिहास की अवधारणाओं में, एक भयानक समानता यही है कि ये सब इतिहास को एक अटूट धारा मानते हैं और कर्ता के भाव को एक अन्विति में पिरोया जाता मानते है, जिसमें कबीर की आलोचना का तत्व एक विरेचक का काम करता है बस।

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जब वर्णवादियों ने दलितों को एक देवता तक नहीं दिया, एक मंदिर तक नहीं दिया, इतिहास दिया, लिखने दिया—तब नए ग्लोबल स्पेस में दलित विमर्श अपनी जीनियोलोजी बनाएगा और उसे रोकने वाला कोई नहीं होगा।

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کتاب 1

 

Recitation

हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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