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गाँव पर ग़ज़लें

महात्मा गांधी ने कहा

था कि भारत की आत्मा गाँवों में बसती है। आधुनिक जीवन की आपाधापी में कविता के लिए गाँव एक नॉस्टेल्जिया की तरह उभरता है जिसने अब भी हमारे सुकून की उन चीज़ों को सहेज रखा है जिन्हें हम खोते जा रहे हैं।

उठ गइल बा

ए. कुमार ‘आँसू’

चढ़ल बसन्त में

अशोक द्विवेदी

तहरा सुधियन के

अशोक द्विवेदी

निर्दोष गाम

राम चैतन्य धीरज

झलकेले खुशी बीच

अशोक द्विवेदी

रो-रो के सनेहिया

जौहर शफियाबादी

जरूरत गाँव में

मिथिलेश ‘गहमरी’

जर रहल बा गाँव

सूर्यदेव पाठक ‘पराग’

सब फूल हमरा

जौहर शफियाबादी

गाँव जे शहर

कृष्णानन्द कृष्ण

खेल उनकर खतम हो गइल

नागेन्द्र प्रसाद सिंह

सगरो मचल बवाल

मिथिलेश ‘गहमरी’

चाल देशी ना

जौहर शफियाबादी

कौन है जो मुझको

अमन मुसाफ़िर

मेरा प्यार बेशक

डी. एम. मिश्र

एह सियासी नगर

अशोक द्विवेदी

गाँवों का उत्थान

डी. एम. मिश्र

गाँव में

डॉ. वेद मित्र शुक्ल

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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