उसने कहा, ‘वास्तविकता इतनी असहनीय हो गई है, इतनी धूमिल कि अब मैं केवल अपने सपनों के रंगों से ही अभिव्यक्त कर सकती हूँ।
कोई मनुष्य, चाहे कितने ही दुःख में क्यों न हो, उस व्यक्ति के सामने अपना शोक प्रकट करना नहीं चाहता जिसे वह अपना सच्चा मित्र न समझता हो।
अगोचर बातों या भावनाओं को भी; जहाँ तक हो सकता है, कविता स्थूल गोचर रूप में रखने का प्रयास करती है।
प्रकृति की नाना वस्तुओं और व्यापरों का अपना-अपना सौंदर्य भी है, जो एक ही प्रकार की वस्तु या व्यापार के आरोप द्वारा अभिव्यक्त नहीं हो सकता।
कलात्मक अभिव्यक्ति भी, कवि-प्रकृति और बाह्म जगत् के द्वंद्वों का ही किसी एक उच्च मनोवैज्ञानिक स्तर पर आविभूर्त रूप है—इससे अधिक कुछ नहीं।
अत्यधिक संवेदनशीलता हीन भावना की अभिव्यक्ति है।
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यदि तदनुसार आचरण नहीं किया तो केवल कहने या पढ़ने से क्या लाभ?
सच तो है कि मनुष्य जब काव्य में अपने-आपको प्रकट करता है; तब वह केवल आत्म-प्रस्थापना ही नहीं करता, वरन वह आत्म-औचित्य की भी स्थापना करता है।
निंदा, प्रशंसा, इच्छा, आख्यान, अर्चना, प्रत्याख्यान, उपालंभ, प्रतिषेध, प्रेरणा, सांत्वना, अभ्यवपत्ति, भर्त्सना और अनुनय इन तेरह बातों में ही पत्र से ही प्रकट होने वाले अर्थ प्रवृत्त होते हैं।
अपने में ब्रह्मभाव को अभिव्यक्त करने का यही एकमात्र उपाय है कि इस विषय में दूसरों की सहायता करना।
कवि अपने अंतर में व्याप्त जीवन-जगत को प्रकट करता है।
वास्तव में व्यक्ति में स्नेह, मधुरता, मृदुलता की मात्रा ही उसके विकास का मापदंड है। जग में स्नेह तथा उस पर आधारित मधुरता, मृदुलता उसी प्रेम रूप, मधु रूप, रस रूप भगवान की अभिव्यक्ति है। उसी के स्नेह, मधुरता मृदुलता, का प्रतिबिंब है। अतः यही उसके नैकट्य की द्योतक भी है।
सूरदास के वात्सल्य में संकल्पात्मक मौलिक अनुभूति की तीव्रता है, उस विषय की प्रधानता के कारण। श्रीकृष्ण की महाभारत के युद्ध-काल की प्रेरणा सूरदास के हृदय के उतने समीप न थी, जितनो शिशु गोपाल की वृंदावन की लीलाएँ।
तुलसीदास के हृदय में वास्तविक अनुभूति तो रामचंद्र की भक्त-रक्षण-समर्थ दयालुता है, न्यायपूर्ण ईश्वरता है, जीव की शुद्धावस्था में पाप-पुण्य-निर्लिप्त कृष्णचंद्र की शिशु-मूर्ति का शुद्धाद्वैतवाद नहीं। ऐसा प्रतीत होता है कि जहाँ आत्मानुभूति की प्रधानता है, वहीं अभिव्यक्ति के क्षेत्र में पूर्णता हो सकी है।
लोकतंत्र का अर्थ अब एकछत्र सत्ता हो गया है, अभिव्यक्ति के मायने हैं प्रतिध्वनि, और अधिकार का नया समकालीन अर्थ है संकोच।
कला; अनुभूति को बिंब और नाटकीयता के द्वारा सूचित नहीं, चित्रित करने का प्रयास करती है।
छोटे लोगों के गुण का वर्णन करने वाला अन्य कोई नहीं मिलता, अतएव वह स्वयं ही उसे कहता है।
क्रोध उन लोगों के ख़िलाफ़ अधिक स्वतंत्र रूप से प्रकट होता है, जो आपके सबसे क़रीब हैं… इतने क़रीब कि भरोसा होता है कि क्रोध और चिड़चिड़ेपन को माफ़ कर दिया जाएगा।
मैं स्वयं को रूपक के माध्यम से व्यक्त करना पसंद करता हूँ। ध्यान दीजिए : रूपक के माध्यम से, प्रतीक के माध्यम से नहीं।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere