मनुष्य की सार्थक उपलब्धियाँ वे हैं जो सामाजिक रूप से उपयोगी हैं।
पाने के लिए—वह जो भी हो, सुनना होगा कि वह कैसे पाया जाता है, और ठीक-ठीक उसे करना होगा। बिना किए पाने के लिए उदग्रीव होने से बढ़कर बेवकूफ़ी और क्या है?
आनंदमय आत्मा की उपलब्धि विकल्पात्मक विचारों और तर्कों से नहीं हो सकती।
गृहस्थाश्रम में कोई कर्मयोग द्वारा परलोक में सिद्धि बताते हैं। दूसरे लोग कर्म का त्याग कर ज्ञान द्वारा सिद्धि का प्रतिपादन करते हैं। विद्वान पुरुष भी इस जगत् में भक्ष्य पदार्थों का भोजन किए बिना तृप्त नहीं हो सकता, अतएव विद्वान ब्राह्मण के लिए भी क्षुधा-निवृत्ति के लिए भोजन करने का विधान है।
निश्चय जानो—करना ही है पाने की जननी। करनी जब चाह का अनुसरण करती है—तभी उसकी कृतार्थता सम्मुख उपस्थित होती है।
पाने का अर्थ ही होता है आंशिक रूप से पाना।
उज्ज्वल घर, अच्छे हावभावयुक्त स्त्रीजन और श्वेत छत्रसहित शोभायमान लक्ष्मी तब ही स्थिरता से भोग में आती है, जब पुण्य की वृद्धि होती है।
जनतंत्र सदैव ही संकेत से बुलाने वाली मंजिल है, कोई सुरक्षित बंदरगाह नहीं। कारण यह है कि स्वतंत्रता एक सतत प्रयास है, कभी भी अंतिम उपलब्धि नहीं।
पार्थिव जगत् में प्राप्ति ही ध्येय होती है किंतु आत्मिक जगत् में प्रदान ही ध्येय बन जाता है। प्रदान का मार्ग ही एकत्व का मार्ग है।
बिना उत्साह के कोई महान उपलब्धि कभी नहीं हुई।
‘महान चीज़ों को पाना जितना दुर्लभ होता है, उनका एहसास होना भी उतना ही कठिन होता है'—'एथिक्स ऑफ़ स्पिनोज़ा' का अंतिम वाक्य यही कहता है।
वास्तव में किसी संग्रह को हासिल करने का सबसे ठीक तरीका उसे उत्तराधिकार में पाना है। क्योंकि संपत्ति के प्रति किसी संग्राहक की प्रवृत्ति ‘पूंजी के प्रति मालिक की जिम्मेदारी की भावना’ से पनपती है अतः सर्वश्रेष्ठ अर्थ में, यह किसी उत्तराधिकारी की प्रवृत्ति ही है कि किसी संग्रह का अत्यंत विशिष्ट लक्षण प्रायः उसकी हस्तांतरणीयता होता है।
चुनौतियाँ आई और गईं, पर मैंने सफलता और विफलता के हर क्षण का भरपूर आनंद लिया। न मुझे थकान महसूस हुई और न मैंने ख़ुद को खोया हुआ या उद्देश्यहीन माना; यही, मेरी नज़र में सबसे बड़ी जमापूँजी है!
-
संबंधित विषय : आत्मविश्वास
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere