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Amol Palekar

1944

کی

باعتبار

चुनौतियाँ आई और गईं, पर मैंने सफलता और विफलता के हर क्षण का भरपूर आनंद लिया। मुझे थकान महसूस हुई और मैंने ख़ुद को खोया हुआ या उद्देश्यहीन माना; यही, मेरी नज़र में सबसे बड़ी जमापूँजी है!

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परंपरा से हटकर चलने की क़दम-क़दम पर व्यक्तिगत क़ीमत चुकानी पड़ती है।

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नास्तिकता अपने आप में ही अमूर्त धारणा है। एक बार जब इस अमूर्तता का जुनून चढ़ जाता है, तो आप अपनी ही कल्पनाशक्ति पर सवार होकर, एकांत में कैनवास के सामने डूब जाते हैं।

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बचपन से ही ‘ईश्वर है’ इस अवधारणा पर मुझे कभी यक़ीन नहीं हुआ।

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मैं मानता हूँ कि स्वतंत्र निर्णय लेकर जीने में निचुड़ना ज़रूरी होता है।

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‘हर कलाकार का अपना एक वर्ग-चरित्र होता है’—मेरे पसंदीदा समकालीन कवि नामदेव ढ़साल का यह वक्या मुझे हमेशा सत्य (tautologous) लगता हैं।

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प्रवाह के विरुद्ध जाने की या अलग होने-बोलने-करने की निरंतर क़ीमत चुकानी पड़ती है।

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मैंने वही अवसर चुने जहाँ मेरी कलात्मक स्वतंत्रता सुरक्षित रहे। इस तथ्य को जानते हुए भी कि फ़िल्म उद्योग लाभोन्मुख है और सिद्धाँतों के ऊपर कलेक्शन को महत्व देता है और निश्चित सिद्धाँतों के प्रति सहनशक्ति भी कम रखता है।

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जैसे-जैसे मेरी उम्र बढ़ी, मुझ पर कामू (एल्बर्ट कामू) के ‘द मिथ ऑफ़ सिसीफ़स’ के एक प्रेरणादायक उद्धरण का प्रभाव पड़ने लगा- ‘बंधनों में जकड़े हुए जीवन से दो-दो हाथ करने के लिए इतना बंधनमुक्त हो जाओ कि अपना पूरा अस्तित्व ही विद्रोही साबित हो जाए’।

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संकट, चुनौतियों या दुविधाएँ—चाहें आप इन्हें कुछ भी कहें; पर ये आपके अंदर एक प्रतिक्रिया जगाती हैं, जिसके अनुसार आप कार्य करने पर मज़बूर हो जाते हैं।

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हमेशा सतर्क रहना मेरी नज़र में एक श्राप है।

नास्तिक होना भी आसान नहीं है।

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मैं कभी ‘फ़िल्मी’ हीरो नहीं बन सका और बन जाना टालता भी रहा।

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खेल में खिलाड़ी की तरह रहो, प्यादे की तरह नहीं। हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्री में अपना सिक्का जमाए रखने का यही सच्चा मूलमंत्र है जिसका मैंने कभी पालन नहीं किया।

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जीवन की जटिलताओं के बारे में जब भी मैं सोचता हूँ; तो मेरी आँखों के सामने हमेशा एक अर्धगोलाकार मौसमी का दृश्य उभरता है, जिसे धारदार ब्लेड वाले क्रशर पर दबाया जा रहा है।

सिनेमा में मेरा करियर स्वायत्तता के प्रति मेरा जुनून प्रतिबिंबित करता है। मैंने हमेशा ही लीक से हटकर काम किया है और जोखिम लेने में पीछे नहीं हटा।

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अधूरी छोड़ी गई कितनी ही चीज़ें कहीं अंतरिक्ष में तैरती रहती हैं; उनमें से कुछ मेरे सपनों में आकर मूर्त रूप ले लेती हैं।

व्यवस्था द्वारा दिखाया न्याय गया भ्रम होता है।

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अवोलोकन अतीत का होता है, ‘पहरा’ वर्तमान का।

नाटक श्मशान में घटित होता है। उसमें चार पुरूष एक ऐसी युवती के शव के दाह-संस्कार की राह देख रहे होते हैं जिसका इस दुनिया में अपना कोई नहीं हैं।

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Recitation

हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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