बचपन से ही ‘ईश्वर है’ इस अवधारणा पर मुझे कभी यक़ीन नहीं हुआ।
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चुनौतियाँ आई और गईं, पर मैंने सफलता और विफलता के हर क्षण का भरपूर आनंद लिया। न मुझे थकान महसूस हुई और न मैंने ख़ुद को खोया हुआ या उद्देश्यहीन माना; यही, मेरी नज़र में सबसे बड़ी जमापूँजी है!
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मैं मानता हूँ कि स्वतंत्र निर्णय लेकर जीने में निचुड़ना ज़रूरी होता है।
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नास्तिकता अपने आप में ही अमूर्त धारणा है। एक बार जब इस अमूर्तता का जुनून चढ़ जाता है, तो आप अपनी ही कल्पनाशक्ति पर सवार होकर, एकांत में कैनवास के सामने डूब जाते हैं।
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परंपरा से हटकर चलने की क़दम-क़दम पर व्यक्तिगत क़ीमत चुकानी पड़ती है।
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