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सच्ची मित्रता के नियम इस सूत्र में अभिव्यक्त हैं- आने वाले अतिथि का स्वागत करो और जाने वाले अतिथि को जल्दी विदा करो।
जैसे-जैसे हम ज्ञान पाते हैं, हम अपने पिताओं को मूर्ख समझते हैं। निस्संदेह हमारे अधिक बुद्धिमान पुत्र हमें भी ऐसा ही समझेंगे।
जो भी किसी निर्दोष कृति को देखना चाहता है, वह ऐसी वस्तु की बात सोचता है जो न तो कभी थी, न है और न कभी होगी।
ग़लती करना मानवीय है किंतु क्षमा करना दिव्य है।
क्रुद्ध होने का अर्थ है दूसरों की ग़लतियों का स्वयं से प्रतिशोध लेना।