सत्संग पर उद्धरण
भक्तिधारा में संत-महात्माओं
की संगति और उनके साथ धार्मिक चर्चा को पर्याप्त महत्ता दी गई है। प्रस्तुत चयन में सत्संग विषयक भक्ति काव्य-रूपों को शामिल किया गया है।
जंगली फल आदि के द्वारा जीवन व्यतीत करना सफल है, परंतु खल के साथ निवास अच्छा नहीं।
यदि एक बहुत बलवान् व्यक्ति किसी दुर्बल व्यक्ति के साथ सदैव रहे, तो वह दुर्बल व्यक्ति कुछ अंशों में अवश्य सबल हो जाएगा।
संतों की वाणी सुनो, शास्त्र पढ़ो, विद्वान हो लो, लेकिन अगर ईश्वर को हृदय में स्थान नहीं दिया तो कुछ नहीं किया।
अच्छी कविता और अच्छे कवियों की सोहबत व्यक्तित्व में तब्दीलियाँ लाती है।
'सत्संग' नामक देश में 'भक्ति' नाम का नगर है। उसमें जाकर 'प्रेम' की गली पूछना। विरह-ताप-रूपी पहरेदार से मिलकर महल में घुसना और सेवारूपी सीढ़ी पर चढ़कर समीप पहुँच जाना। फिर दीनता के पात्र में अपने मन की मणि को रखकर उसे भगवान् को भेंट चढ़ा देना। अहं तथा घमंड के भावों को न्योछावर कर तुम श्रीकृष्ण का वरण करना।
बुरी आदतों का एकमात्र प्रतिकार है—उनकी विपरीत आदतें।
तप्त लोहे पर जल की बूँद पड़ने से उसका नाम भी नहीं रहता है, वही बूँद कमल के पत्र पर पड़ने से मोती के सदृश शोभित होता है, फिर वही बूँद स्वाती नक्षत्र में समुद्र की सीप में मोती हो जाता है, इससे यह सिद्ध हुआ कि प्रायः अधम, मध्यम और उत्तम गुण संसर्ग से ही होते हैं।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere