संतोष की भाषा धीमी होती है, क्योंकि वह शब्दों और मौन दोनों में व्यक्त होती है।
त्यागने की संतुष्टि और अनुभव की संतुष्टि में बहुत बड़ा अंतर है।
…यही लिखने की संतुष्टि है कि कोई इतने सारे लोगों की नक़ल कर सकता है।
प्रेम एक पर्याप्त ‘यौन-संतुष्टि का परिणाम’ क़तई नहीं है। उल्टे यौन-सुख—और तथाकथित यौन-तकनीकों का ज्ञान भी—‘प्रेम का परिणाम’ होता है।
अपने हाथ से अपने आदमियों की सेवा और यत्न करने में कितनी तृप्ति होती है, कितना आनंद मिलता है, यह स्त्री जाति के सिवा और कोई नहीं समझ सकता।
प्रामाणिकता की माँग हमारे अंतरंग की माँग है।
वासनाओं के वशीभूत होने से बढ़कर कोई पाप नहीं है, अपनी परिस्थिति से असंतुष्ट रहने से बढ़कर कोई विपत्ति नहीं है और परिग्रह के बढ़कर कोई दोष नहीं है। इसलिए संतोष की ही अंतिम रूप से सार्थकता सिद्ध होती है।
दुनिया में मौजूद अच्छी चीज़े कभी ख़त्म नहीं होंगी, क्योंकि यहाँ सबके लिए पर्याप्त से ज़्यादा है। जीवन प्रचुर और समृद्ध होना चाहिए।
जो दूसरे मनुष्यों को जानता है, वह विवेकी है। जो अपने को जानता है, वह ज्ञानी है। जो दूसरों को वशीभूत करता है, वह बलवान है। जो अपने को वशीभूत करता है, वह अत्यंत शक्ति-संपन्न है। जो अपनी परिस्थिति से संतुष्ट है, वही घनी है।
अपनी असंपूर्णता में, संपूर्णता का आविष्कार करने में समय लगता है।
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यदि कोई स्त्री लकड़ी के बने हुए कृत्रिम लिंग से संतुष्ट हो, तो लकड़ी के लिंग का प्रयोग करना चाहिए।
जिस प्रकार देवताओं को अमृत, पितरों को स्वधा (हवि की आहुति) तथा नागों को सुधा तृप्तिकारक है, उसी प्रकार मनुष्यों को गंगाजल तृप्तिकारक है।
उन व्यक्तियों को धनी समझो जो ज्ञान से पूर्ण हैं, जो शरीर से स्वस्थ है और जो निर्भय होकर रहते हैं। जो संतोषी हैं, जिनका भाग्य धर्म पर चलने में सहायक है, जो सज्जन तथा पवित्र आत्माओं से अपने सदाचार के लिए प्रशंसा प्राप्त करते हैं, जो अहुरमजदा के शुद्ध और श्रेष्ठ पद में विश्वास रखते हैं, जो सच्चाई से संपन्न हैं।
हमने ऐसा संसार बनाया है जिसमें संतुष्ट शरीर हैं और असंतुष्ट मन हैं।
संसार की इच्छाओं से तृप्ति नहीं होती, जैसे गिरती जल राशि से महासागर की तृप्ति नहीं होती।
पाने का अर्थ ही होता है आंशिक रूप से पाना।
जो मन नहीं मार सकता, जिसे झुकना और छोटा बनना नहीं आता, जिसे दूसरों की सुविधा और दूसरों को निभाने की दृष्टि से झुकना और राह छोड़ना नहीं आता—वह ज़िंदगी में कभी कुछ नहीं कमा पाता—ज़िंदगी का संतोष भी नहीं।
सत्य संतोष का शरीर हो, सातों समुद्र निर्मल नीर से भरे हों।
यश तो अहं की तृप्ति है।
ईमानदारी वैभव का मुँह नहीं देखती, वह तो मेहनत के पालने पर किलकारियाँ मारती है और संतोष पिता की तरह उसे देखकर तृप्त हुआ करता है।
मुझे लोभ रूपी सर्प ने डस लिया है और स्वार्थ रूपी संपत्ति से मेरे पैर भारी हो गए हैं। आशा रूपी तरंगों ने मेरे शरीर को तपा डाला है। और गुरुकृपा से संतोषरूपी वायु शीतलता प्रदान कर रहा है। मुझे विषयरूप नीम मीठा लगता है और भजनरूपी मधुर गुड़ कड़वा लग रहा है।
मनुष्य को; उसके पास जो है, उससे संतोष नहीं। जो नहीं है, उसकी उसे भारी चाह है।
यदि संतोषी जीवन नहीं तो माया की तृष्णा नाम-बीज को ख़त्म कर देगी। संतोष नाम-बीज, तृष्णा-पक्षियों से बचने का सुहागा है।
अपना नाम छपा हुआ देखना निश्चित ही सुखद होता है। पुस्तक तो पुस्तक ही है भले ही उसमें कुछ न हो।
मैं कई ऐसे करोड़पतियों को जानता हूँ, जो ख़ुद को दिवालिया महसूस करते हैं, जिन्हें लगता है कि उनके पास कुछ भी नहीं है। इसका कारण यह है कि वे लगातार अपनी तुलना किसी और से करते रहते हैं, किसी ऐसे व्यक्ति से जिसके पास उनसे अधिक पैसा है।
आत्म संतुष्टि पाना बड़ा महत्त्वपूर्ण हुनर है।
संतुष्ट होना अच्छा है, लेकिन आत्मसंतोष में रहना नहीं।
जो हमारे पास है, हम उससे संपन्न नहीं होते; बल्कि जो हम उसके बिना कर सकते हैं, उससे होते हैं।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere