सुंदर अर्थ की शोभा बढ़ाने में जो अलंकार प्रयुक्त नहीं, वे काव्यालंकार नहीं हैं। वे ऐसे ही हैं, जैसे शरीर पर से उतारकर किसी अलग कोने में रखा हुआ गहनों का ढेर। किसी भाव या मार्मिक भावना से असम्पृक्त अलंकार, चमत्कार या तमाशे हैं।
अनुप्रास और यमक आदि शब्दाडंबर कविता के आधार नहीं, जो उनके न होने से कविता निर्जीव हो जाए, या उससे कोई अपरिमेय हानि पहुँचे। कविता का अच्छा या बुरा होना विशेषतः, अच्छे अर्थ और रस-बाहूल्य पर अवलंबित है।
बिना अलंकार के आम शब्दों में; जीवनयथार्थ को वास्तविक अनुभूति से शक्तिशाली, प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त करे—वह कविता अच्छी होती है।
जिस प्रकार एक कुरूपा स्त्री अलंकार लादकर सुंदर नहीं हो सकती, उसी प्रकार प्रस्तुत वस्तु या तथ्य की रमणीयता के अभाव में, अलंकारों का ढेर काव्य का सजीव स्वरूप नहीं खड़ा कर सकता।
भावानुभव में वृद्धि करने के गुण का नाम ही अलंकार की रमणीयता है।
वैशिष्टय-प्रदर्शन के लिए किसी गुण या क्रिया के विरुद्ध, अन्य क्रिया का वर्णन हो उसे विद्वान् लोग विरोध अलंकार कहते हैं।
यमक पाँच प्रकार का कहा गया हैः आदियमक, मध्यान्तयमक, पादाभ्यासयमक, आवलीयमक, और समस्तपादयमक।
अनुप्रास, यमक, रूपक, दीपक और उपमा-वाणी (काव्य) के ये पाँच अलंकार ही दूसरों द्वारा कहे गए हैं।
काव्य में, कवि-परंपरा द्वारा प्रयुक्त्त, श्रुतिपेशल और सार्थक शब्द ही प्रयोग करना चाहिए। पदविन्यास की चारुता अन्य सभी अलंकारों से बढ़कर है।
अलंकारहीन व्यक्तित्व और काव्य संतोषप्रद है।
अनुप्रास अनेक अर्थों वाले होने चाहिए, लेकिन उनके अक्षर भिन्न नहीं होने चाहिए, अर्थात् समान ही होने चाहिए। इस मध्यम युक्ति (मार्ग) से कवियों की वाणी रम्य बनती है।
जिसके शब्द लोकप्रसिद्ध (लोकप्रचलित) हो; पदों की संधियाँ भली प्रकार से मिली हुई हों; जो ओजस्वी, प्रसाद गुणसंपन्न तथा सहज उच्चार्य हो, वही विदग्ध कवियों का वांछित यमक है, अर्थात् विद्वान ऐसे यमक की ही प्रशंसा करते हैं।
साहित्य अपनी चेष्टा को सफल करने के लिए अलंकार, रूपक, छंद, आभास, इंगित का सहारा लेता है। दर्शन विज्ञान के समान निरलंकार होने से उसका काम नहीं चलता।
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शब्दालंकार शब्द के शोभाधायक होते हैं और अर्थालंकार अर्थ के। चूँकि शब्द और अर्थ दोनों मिलकर ही काव्य होते हैं, इसलिए हमें तो शब्दालंकार और अर्थालंकार दोनों ही इष्ट हैं।
विशेषता बताने की इच्छा से इष्ट वस्तु का निषेध-सा करना आक्षेप अलंकार कहलाता है।
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जहाँ यह निरलंकृति नहीं रहती, वहाँ गेय पदों का उत्कर्ष क्षीण हो जाता है।
नारी में जैसे श्री और लज्जा होती है, साहित्य की अनिर्वचनीयता भी वही चीज़ है। उसका अनुकरण नहीं किया जा सकता, वह अलंकार का अतिक्रमण करती है—वह अलंकार से आच्छन्न नहीं होती।
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साधु, साधारणत्व आदि गुण यहाँ भिन्न हैं, किंतु उपमेय और उपमान के परस्पर भिन्न होने पर भी वह गुणासाम्य का प्रतिपादन कराता है।
विशेष गुणासाम्य बताने की इच्छा से, विशिष्ट के साथ न्यून की भी समान कार्यकारिता प्रतिपादित करना तुल्ययोगिता कहलाता है।
किसी कारणवश लोकोत्तर अर्थ का बोध कराने वाला जो वचन है, चमत्कारिक होने के कारण उसे अतिशयोक्त्ति कहा जाता है।
जहाँ एक ही समय में दो क्रियाएँ दो वस्तुओं में संपन्न हों, किंतु उनका कथन एक ही शब्द से होता हो—वहाँ सहोक्त्ति अलंकार होता है।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere